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तालिबानी जहनियत का जहर

भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में किसी भी तौर पर ‘इस्लामी जेहादी’ मानसिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। सर्व प्रथम यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत का संविधान ‘व्यक्तिगत’ तौर ही धर्म या मजहब की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इसका अर्थ यही है कि कोई भी नागरिक अपने निजी जीवन का निर्वहन अपनी इच्छा के अनुसार अपने धर्म के मुताबिक उस सीमा तक कर सकता है जहां तक उसके इस आचरण से सार्वजनिक व्यवस्था (पब्लिक आर्डर) को कोई खतरा या नुकसान पैदा न हो। इसके साथ ही प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता भी प्राप्त है परन्तु यह भी उसी हद तक प्राप्त है कि इसमें किसी भी प्रकार की हिंसा पैदा करने वाले विचार का प्रतिपादन न होता हो। तदनुरूप भारत की दंड विधान संहिता में यह प्रावधान है कि मजहब के आधार पर किन्हीं भी दो समुदायों के बीच वैमनस्य या दुश्मनी फैलाने वाले कृत्य को राष्ट्रीय एकता को ध्वस्त करने के खाने में रख कर माकूल कानूनी कार्रवाई की जाये। इसी मुद्दे पर आज भारत को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है और संविधान के प्रावधानों के अनुसार मजहबी हिदायतों की समीक्षा करने की आवश्यकता है क्योंकि किसी भी धर्म की रवायतें या रीतियां अथवा आख्यान संविधान के दायरे से बाहर नहीं जा सकते। परन्तु स्वतन्त्र भारत में जिस तरह मुस्लिम समाज की पृथक पहचान को बरकरार रखते हुए उन्हें अपने धार्मिक कानून ‘शरीया’ का पालन करने की आंशिक छूट दी गई उससे इस समाज के लोगों को इसके धार्मिक उपदेशकों ‘मुल्ला-मौलवियों’ ने आज के वैज्ञानिक युग में जीने के बजाय सातवीं सदी के दौर में जीने के लिए प्रेरित किया जिसकी वजह से हमने राजस्थान के उदयपुर शहर में वह वीभत्स और दिल दहलाने वाला नजारा देखा जिसमें दो मुस्लिम युवकों ने मासूम कन्हैया लाल साहू का गला सिर्फ इसलिए रेत दिया कि उसने भाजपा की प्रवक्ता रहीं ‘नूपुर शर्मा’ के समर्थन  कोई ‘ट्वीट’ किया था। यही वह ‘जहरीली जहनियत’ है जो मुस्लिम समाज की रगों में मुल्ला-मौलवी जुम्मे की सामूहिक नमाज के नाम पर भरते आ रहे हैं। इसी विषैली मानसिकता का लाभ उठा कर 1947 में मुहम्मद अली जिन्ना ने भारत के दो टुकड़े कराने में सफलता प्राप्त की थी। यही वजह है कि आज भी भारत के मुसलमानों के जहन में यह भरा जाता है कि हिन्दोस्तान पर आक्रमण करने वाले दुर्दान्त लुटेरे तैमूर लंग से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक उनके नायक हैं। यही वह मानसिकता है जो क्रूर मुगल शासक औरंगजेब को ‘रहमतुल्लाह’ से नवाजती है। मगर दुखद यह है कि आजादी के बाद सिर्फ मजहब के नाम पर पाकिस्तान बन जाने के बावजूद हमने मुसलमानों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने के बजाये उन्हें मजहबी चारदीवारी में ही बांधे रखने के उपाय राष्ट्रीय एकता की कीमत पर सिर्फ उनके वोट हथियाने की गरज से किये। यह काम इस हकीकत के बावजूद किया गया कि 1947 में पूरे पंजाब से लेकर उत्तर-पश्चिम प्रान्त तक में इन क्षेत्रों से समस्त हिन्दू- सिखों का पलायन कराया गया और उनकी वहशियाना तरीके से हत्याएं की गईं। जबकि दूसरे तरफ हिन्दोस्तान में ही रहने वाले मुसलमान नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की गई। एेसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि हिन्दू संस्कृति का आधार ही मानवतावाद है (हालांकि जन्मगत वर्ण या जाति व्यवस्था की कुरीति इसमें बाद में जुड़ गई)। मगर इसके बावजूद भारतवासी हिन्दुओं ने कभी भी मजहब के आधार पर किसी समाज या नागरिक के प्रति विषवमन नहीं किया। इसका प्रमाण यह है कि हर हिन्दू या सनातनी पूजा या अनुष्ठान के बाद यही उवाच किया जाता है कि ‘धर्म की विजय हो, अधर्म का नाश हो- प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो’। इसमें भी धर्म का मतलब मजहब या पूजा पद्धति से नहीं है बल्कि ‘मानवीय कर्तव्य’ से है क्योंकि हिन्दुओं में तो हजारों देवी-देवता हैं जिनकी पूजा-अर्चना की विधियां भी हजारों किस्म की हैं। 

‘विविधता में एकता’ के सिद्धान्त का उद्गम स्रोत भी यही है। परन्तु इन विविधता को बनाये रखने के लिए मुस्लिम ‘तुष्टीकरण’ की कोई जरूरत नहीं थी। मगर आजादी के आन्दोलन से लेकर स्वतन्त्र भारत में इसी नीति पर चला गया और मुसलमानों का एक वोट बैंक की तरह उपयोग सिर्फ सत्ता पर काबिज होने के लिए किया गया। मुस्लिम तुष्टीकरण की विवेचना यदि अभी तक किसी राजनेता ने वैज्ञानिक दृष्टि से की है तो वह भीमराव अम्बेडकर ने की है और आजादी से पूर्व लिखी अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान अथवा भारत का बंटवारा’ में इसकी परतें उधेड़ डाली हैं। 

उदयपुर में जिस तरह निरपराध कन्हैयालाल की हत्या करने के बाद हत्याकांड का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रचारित किया गया वह और कुछ नहीं बल्कि शत-प्रतिशत ‘तालिबानी पैशाचिक’ तरीका है। क्या हिन्दोस्तान में हम एेसे नागों को दूध पिलाने का काम करते रहेंगे जिनके दिलों में इंसानियत की जगह हैवानियत बसती हो। मगर असल सवाल फिर से उसी जहरीली मानसिकता का है जो आम मुसलमान को तालिबान बनने के लिए उकसाती है। तालिबानी अन्दाज में कन्हैया लाल का किया गया कत्ल हमें आगाह कर रहा है कि भारत में ऐसे  लोग घुसे बैठे हैं जो इस मुल्क के ‘सीरिया’ बनने के ख्वाब देख रहे हैं। कन्हैयालाल के कत्ल का मामला अब ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’ ने अपने हाथ में ले लिया है अतः उदयपुर मामले की पड़ताल अब आतंकवादी नजरिये से की जानी चाहिए और उन नागों को बिलों से बाहर निकाला जाना चाहिए जो भारत को इस्लामी जेहाद का अड्डा बना देना चाहते हैं और इसके लोगों को आपस में लड़ा कर राष्ट्रीय विकास को अवरुद्ध कर देना चाहते हैं।