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एक चुनावी एजेंडे का सवाल?

लोकसभा चुनावों का मतदान शुरू होने में केवल 30 दिन बाकी रहने के बावजूद राजनैतिक वातावरण में केवल पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ बालाकोट में भारतीय वायुसेना के छोड़े गये निशानों पर जारी बहस के दौरान गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में कांग्रेस पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक करके देशवासियों को वह राजनैतिक एजेंडा देने का प्रयास किया है जिसे केन्द्र में रखकर आम मतदाता अपना वोट देकर आये। वास्तव में भारत में सेना का शौर्य अथवा पाकिस्तान की कारस्तानियां कभी भी चुनावी मुद्दा इसलिए नहीं बन सकते क्योंकि ये राजनैतिक विषय नहीं हैं। इस मामले में भारत का प्रत्येक राजनैतिक दल राष्ट्रवादी है क्योंकि सीमाओं की सुरक्षा किसी भी पार्टी की सरकार की वह पहली प्राथमिकता है जिसकी बागडोर भारत के संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति से बन्धी हुई है।

केन्द्र की हर सरकार राष्ट्रपति की अपनी सरकार होती है और वह उस सेना के सुप्रीम कमांडर होते हैं जो सरहदों की हिफाजत पूरी मजबूती से करती है। अतः इस मुद्दे पर हम राजनीति किस नुक्ते से कर सकते हैं? जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो हम किस दर्जा अपना कद छोटा करके देखने की गलती कर रहे हैं? जिस पाकिस्तान को हमारे राजनैतिक नेतृत्व की दूरदर्शिता ने अपनी फौज के शौर्य के बूते पर दो टुकड़ों में बांटकर 1971 में फेंक दिया हो, उसके खिलाफ बालाकोट जैसी कार्रवाई तो बस एक झांकी की तरह ही हो सकती है। हमें बांग्लादेश के उदय के बाद स्व. इंदिरा गांधी का यह कथन हमेशा याद रखना चाहिए कि भारतीय उपमहाद्वीप में एक नया सूरज उगा है। यह सूरज एेसी रोशनी बिखेरने वाला था जिसने पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को बदलकर रख दिया था।

कद्दावर राजनीतिज्ञ की यही पहचान थी जिसका लोहा पूरी दुनिया ने बिना किसी पैरवी या दलील के खुद कबूल किया था मगर इतिहास की यह महान घटना कभी भी भारत में कोई चुनावी मुद्दा नहीं बनी। इसकी वजह यही थी कि भारत की उस सेना ने अपना धर्म निभाते हुए दुश्मन के दांत खट्टे किये थे जो भारत की थी। अतः अहमदाबाद में अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अवसर पर आयोजित एक महती जनसभा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पुलवामा हमले के साजिशकर्ता जैश-ए-मोहम्मद तंजीम के सरपराह अजहर मसूद की रिहाई का मामला उठाया और कहा कि भारत की जेल से छुड़ाकर बाइज्जत तरीके से हवाई जहाज में बिठाकर कन्धार तक ले जाने वालों में आज की सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी थे जो उस समय खुफिया विभाग के आला अफसर थे मगर हकीकत यह है कि उस समय की वाजपेयी सरकार के विदेश मन्त्री श्रीमान जसवन्त सिंह स्वयं अजहर मसूद व अन्य आतंकवादियों को लेकर एक ही विमान में कन्धार तक गये थे।

खैर यह बीती बात है और हमें आज के भारत की बात करनी चाहिए और उन मुद्दों की तरफ लौटना चाहिए जिनका वास्ता हम भारतवासियों से है क्योंकि लोकसभा चुनावों में हमें अपनी मनपसन्द की नई सरकार बनानी है। जाहिर है नई सरकार इस मुद्दे पर तो नहीं बनने जा रही है कि हमने पाकिस्तान को कैसा सबक सिखाया या हमारी सेनाओं ने कैसा शौर्य प्रदर्शन किया अथवा राहुल गांधी के मुंह से अजहर मसूद के लिए जी निकल पड़ा या रविशंकर प्रसाद के मुंह से हफिज सईद के लिए हफिज जी निकल गया था या दिग्विजय सिंह के मुंह से ओसामा बिन लादेन के लिए ओसामा जी निकल गया था बल्कि इस मुद्दे पर रायशुमारी हो सकती है कि किस पार्टी ने आतंकवाद पर काबू करने के लिए कौन सी नीति अपनाई और उसकी नीतियों का जम्मू-कश्मीर के लोगों पर क्या असर पड़ा अथवा इस राज्य के हालात में क्या बदलाव आये? चुनावों का राजनैतिक विमर्श यह क्यों न बने कि पिछले 4-5 साल में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा कैसे बढ़ गई है?

इस पर बहस क्यों न हो और सवाल क्यों न पूछे जायें कि उच्च शिक्षा को तो छोडि़ये सामान्य स्तरीय शिक्षा के ही लगातार बेइंतहा खर्चीले हो जाने का जिम्मा एक सामान्य नागरिक किस प्रकार उठा सकता है? रेलवे में एक-सवा लाख नौकरियां निकली भी हैं तो चुनावी मौसम में इस तरह की नियुक्तियां करने की जिम्मेदारी अगली सरकार के कन्धे पर होगी। लोकतन्त्र में असली राजनीति यही होती है जिसे लोग तब अनदेखा नहीं कर सकते जबकि राष्ट्रीय सम्पत्ति पर चुनीन्दा धन्नासेठ अपना विशेषाधिकार समझने लगते हैं और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की हैसियत में आ जाते हैं।

इस व्यवस्था में सरकार की नीतियां जमीन पर खड़े साधारण नागरिक की हैसियत में बदलाव लाने के लिए इस तरह बनती हैं कि आसमान पर बैठे धन्नासेठों को उनमें शिरकत करके अपने राष्ट्रभक्त होने का प्रमाणपत्र देना पड़े मगर केवल यह देखना जरूरी होता है कि गरीबों के लिए बनी योजनाओं का धन किसी भी तौर पर धन्नासेठों की जेब में न पहुंच सके जिसे घुमाकर वे राजनैतिक दलों को ही अपनी जेब में रखने की कसरत न कर सकें। लोकतन्त्र इसी वजह से सत्ता के विकेन्द्रीकरण की वकालत करता है जिससे पूंजीगत स्रोतों पर किसी का भी एकाधिकार न हो सके क्योंकि भ्रष्टाचार के पनपने का मुख्य कारण सत्ता का केन्द्रीकरण ही होता है जो आसानी से पर्दे में छिपाया भी जा सकता है। अतः चुनावों का राजनैतिक एजेंडा तो अब उभरना ही चाहिए जिससे आम लोगों की चुनावी प्रक्रिया में शिरकत बढे़ और उन्हें भी लगे कि चुनाव उन्हीं के लिए हो रहे हैं।