जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं,
उनके आगे दुनिया शीश झुकाती है।
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई,
वो मशाल की तरह उठाई जाती है।
कलम की ताकत बंदूक या राजनीति के उत्पीड़नात्मक रवैये से कहीं ज्यादा है। खबरों और सम्पादकीय की पंक्तियां किसी की जान नहीं लेतीं फिर भी कलम के सिपा​ि​हयों की जान ले ली जाती है। यह सही है कि किसी की अभिव्यक्ति पर आपकी असहमति हो, आप उसे मानने या न मानने के लिये भी स्वतंत्र हैं लेकिन ​विरोधी स्वरों को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाता है। बंदूक चलाने वाले नहीं जानते कि कलम का सिपाही किसी मजहब-जाति का नहीं बल्कि समाज का व्यक्ति होता है, कलम चलाने वाले पहले ही निश्चय कर लेते हैं कि अब से पूरा समाज, पूरा देश ही उनका परिवार है। देश की एकता और अखंडता की खातिर वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। चाहे इसके लिये उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े। ऐसा ही मेरे पूजनीय पिता श्री रमेश चन्द्र जी ने किया। 12 मई 1984 को राष्ट्र विरोधी आतंकी ताकतों ने उन्हें अपनी गोलियों का निशाना बना डाला।

हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कुछ ऐसे विषम क्षण आते हैं जब वह वक्त के आगे स्वयं को असहाय पाता है और नियति के आगे सिर झुका देता है। मैंने भी नियति के आगे ​िसर झुका कर कलम थाम ली थी। ऐसा करना मेरे लिये जरूरी इसलिये भी था, अगर मैं कलम नहीं थामता तो शायद पंजाब से लोगों का पलायन शुरू हो जाता। एक-एक दृश्य आज आंखों के सामने काैंधता है। आतंकवाद का वह दौर, सीमा पार की साजिशें, विफल होता प्रशासन, बिकती प्रतिबद्धतायें आैर लगातार मिलती धमकियों के बीच मेरे पिताजी ने शहादत का मार्ग चुन लिया था। परम पूज्य पितामह लाला जगत नारायण जी पूर्व में ही आतंकवाद का दंश झेल शहीद हो चुके ​थे। मेरे पिताजी को कुछ रिश्तेदारों ने समझाया, मित्रों ने सलाह दी, कुछ प्रशासनिक निर्देश भी मिले परन्तु एक ही जिद जीवन पर्यंत उनका शृंगार बनी रही- मैं सत्यपथ का पथिक हूं, आगे जो मेरा प्रारब्ध, मुझे स्वीकार।

आज भी मैं अपने पिताजी की दो अनमोल वस्तुओं को देखता हूं, एक उनकी कलम और दूसरी उनकी डायरी। न जाने क्यों मेरे दिल में ये भाव भी उठ रहे हैं कि मेरे पूज्य पिताजी आजीवन अकेले ही झंझावातों से क्यों जूझते रहे? विषम से विषम परिस्थितियों में भी उचित सुरक्षा कवच की मांग क्यों नहीं की। उनकी डायरी के पन्ने पलटता हूं तो एक पृष्ठ पर राम चरित मानस की पंक्तियां तो दूसरे पृष्ठ पर गुरबाणी की पंक्तियां। तीसरे पृष्ठ पर गीता का श्लोक। आज भी जब मैं खुद को अकेला महसूस करता हूं तो पिताजी की डायरी को खोल लेता हूं और पढ़ता हूं-
मेरे राम राय-तू संता का संत तेरे
तेरे सेवक को बो किछु नािहं, जम नहीं आवे नेड़े।
सफेद कुर्ता-पायजामा, पांव में साधारण चप्पल, सादा जीवन आैर चेहरे पर हर समय खेलती मुस्कराहट व ताजे फूलों की तरह खिला चेहरा उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। उनकी कलम में एक रवानगी थी आैर पुख्ता विचार- सत्य और केवल सत्य, किसी के न पक्ष में और न किसी के ​िवरोध में, सिद्धांतों से हटकर कोई विरोध न वैर भाव था। ऐसा नहीं है कि प्रैस का गला घोटने का प्रयास केवल आतंकवादियों ने किया, यह काम तो समय-समय पर सत्ता भी करती रही है। लोग कहते हैं कि पत्रकारिता मर रही है लेकिन मेरा मानना है कि जब पत्रकारिता मरने लगी, रमेश जी जैसे सम्पादक की शहादत ने उसे फिर से जिंदा कर दिया। कभी पत्रकारों को कोई बाहुबली नेता मार डालता है, कभी खनन माफिया पत्रकारों की हत्या कर देता है, कभी कोई घोटालेबाज पत्रकार की जान ले लेता है। सवाल यह भी है ​िक पत्रकारों की शहादत ने ही पत्रकारिता को जीवित रखा हुआ है अन्यथा दरबारी पत्रकारिता कब का वर्चस्व स्थापित कर लेती। भारत को पत्रक​ारिता के लिहाज से बेहद खतरनाक बताया जा रहा है। यदि आतंकी और हत्यारे सोचते हैं कि बंदूकों से अपनी विरोधी आवाजों का शांत कर देंगे ताे यह उनकी भूल है। रमेश जी की शहादत लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी। आज पिताजी के महाप्रयाण को 34 वर्ष बीत गये। मैं अपना कर्त्तव्य कितना निभा पाया, इस पर निर्णय लेने का अ​िधकार मुझे नहीं। इसका अधिकार पाठकों को है। हां, इस बात का स्वाभिमान अवश्य है कि परिवार ने दो बहुमूल्य जीवन देश के लिये होम कर दिये परन्तु कभी असत्य का दामन क्षणमात्र भी नहीं ​थामा। मेरा लेखन ही उनकाे सच्ची श्रद्धांजलि है। परिस्थितियां कुछ भी हों, मेरी कलम चलती रहेगी क्योंकि यह मेरे लिये एक मशाल की तरह है।