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संपादकीय

कश्मीर पर फिर उलझे सवाल !

कश्मीर समस्या को लेकर बहुत से लोग जिस तरह चुटकियों में हल होने की अपेक्षा कर रहे हैं वे वास्तविकता से आंखें मूंद कर सपनों के संसार में रहना चाहते हैं। कश्मीर को किसी राजनेता ने नहीं बल्कि इस रियासत के हुक्मरान रहे स्व. महाराजा हरिसिंह की आजादी मिलने के समय ‘स्वतन्त्र राष्ट्र’ बने रहने की महत्वाकांक्षा ने ही समस्या बनाया था। ठीक 14 अगस्त 1947 के दिन ‘मैसूर’ के महाराजा ने अपनी रियासत का विलय पाकिस्तान और भारत बने दो स्वतन्त्र राष्ट्रों में से एक भारत में किया था परन्तु महाराजा हरिसिंह ने ऐसा न करके अपनी रियासत को ‘स्वतन्त्र सत्ता’ के रूप में बनाये रखा और उसके बाद पाकिस्तान की सरकार के साथ यथास्थिति बनाये रखने वाला ‘स्टैंड स्टिल’ समझौता किया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर व पाकिस्तान के लोगों के बीच पहले से स्थापित सम्बन्ध यथावत बने रहने थे। 

महाराजा को भारत की याद तभी आयी जब पाकिस्तान की फौजों ने कबायलियों की मदद से कश्मीर घाटी पर आक्रमण कर दिया और 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने भारतीय संघ में विशेष शर्तों पर अपनी रियासत का विलय किया। अतः इस समस्या की जड़ अंग्रेजों की उस कुटिल राजनीति के तारों से जुड़ी हुई है जिसके तहत उन्होंने हिन्दोस्तान को आजाद करते समय भी इसमें मौजूद सात सौ से अधिक देशी रियासतों (पाकिस्तान समेत) के राजाओं और नवाबों को हुक्मरानी करने का अधिकार देते हुए इसे दो स्वतन्त्र देशों भारत और पाकिस्तान में बांट कर कहा कि जिस रियासत की मर्जी हो वह उस देश में शामिल हो जाये अथवा स्वतन्त्र रहे। इसमें से 576 रियासतें भारतीय इलाके में पड़ती थीं। चूंकि भारत की आजादी से पहले ही जम्मू-कश्मीर में महाराजा के शासन के खिलाफ ‘सफल लोकतान्त्रिक आन्दोलन’ चलाया गया था जिसका नेतृत्व स्व. शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के हाथ में था। अतः इस रियासत के लोगों की अपेक्षाएं शेष भारत के लोगों की अपेक्षाओं से अलग थीं और वे भारतीय उपमहाद्वीप में भौगोलिक विशेषताओं की वजह से अपना विशिष्ट रुतबा मानते थे। यह हकीकत है कि अंग्रेजी सरकार तक ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा को विशेष सम्मान दिया हुआ था। यह सब इस राज्य की विशिष्टता की वजह से ही था। 

जब ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा ‘हिन्दोस्तान की पूरी सल्तनत’ को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को 1860 में ‘बेच’ दिया गया था तो उसके बाद 1862 में अंग्रेजों की बनाई गई ‘भारतीय दंड संहिता’ लागू कर दी गई थी मगर जम्मू-कश्मीर में यह लागू नहीं हुई और वहां पर उस समय के शासक महाराजा रणवीर सिंह द्वारा निर्धारित ‘रणवीर दंड संहिता’ लागू हुई  जिसमें गाैहत्या पर प्रतिबन्ध भी शामिल था। यह दंड संहिता रियासत की हिन्दू-मुसलमान मिली-जुली रियाया की सामाजिक रवायतों को देखकर बनाई गई थी और कश्मीरी संस्कृति के उच्च मानकों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। यही वजह रही कि इस रियासत में उस दौर में अन्तरधार्मिक विवाह सामान्य बात थी। अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 1947 में मजहब के आधार पर पाकिस्तान बनने का पुरजोर विरोध इसी रियासत के लोगों ने किया था। जाहिर तौर पर यह सब ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हमें बताती है कि वर्तमान में कश्मीर की जो समस्या जिस रूप में भी है उसकी डोर ‘राजनैतिक दायरे’ से बन्धी हुई है अतः इसका हल भी इसी दायरे में निकलेगा। 

त्रासदी यह रही कि भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी कश्मीरी थे और उनके सत्ता में रहते हुए ही यह समस्या गहराती गई।  संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़ने या 35(ए) का प्रावधान करने में उनकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी बल्कि ये अनुबन्ध कश्मीर के विलय पत्र से उपजे थे जिन्हें लागू करने का जिम्मा तब भारत के गवर्नर जनरल रहे लार्ड माऊंट बेटन ने लिया था और स्वतन्त्र भारत की सरकार उनके दस्तखत से किये गये हर वादे से बन्धी हुई थी। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को ही लागू हुआ और यह गणतन्त्र बना। इस संविधान में अनुच्छेद 370 को जोड़े जाने की अनुमति संविधान सभा ने ही दी थी परन्तु 70 साल बाद भी इस अनुच्छेद को जारी रखना सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा अनुचित मानती है। इसके पीछे उसके अपने राष्ट्रवादी तर्क हैं और सबसे वाजिब तर्क यह है कि कश्मीर घाटी में जिस तरह कुछ सियासी पार्टियों ने इसे हिन्दू-मुसलमान के नजरिये से देखने की गलती है उससे पाकिस्तान को कश्मीर के विवाद को अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने में मदद मिली है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाल ही में इस्लामी देशों के संगठन (ओआईसी) के विगत 31 मई को सऊदी अरब के ‘मक्का’ शहर में सम्पन्न 14वें सम्मेलन के समापन पर जारी उस सन्देश से मिलता है जिसमें जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है और जम्मू-कश्मीर के लिए संगठन ने अपना विशेष दूत श्री यूसुफ अल्दोह को नियुक्त किया है। 

यूसुफ सऊदी अरब के ही हैं। इसका बहुत कड़ा विरोध भारत के नवनियुक्त विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर ने करते हुए इसे संगठन की अनाधिकार चेष्टा कहा है क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है और किसी बाहरी संगठन या मुल्क को इसके आन्तरिक मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं है जबकि विगत मार्च महीने में ही तत्कालीन विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने इस संगठन के सम्मेलन के आगाज में बतौर पर्यवेक्षक हिस्सा लिया था। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान कश्मीर समस्या को मजहबी आइने से पेश करने की जी तोड़ मेहनत कर रहा है। हमें इसी मोर्चे पर सबसे पहले पूरी दुनिया को आइना दिखाना है और यह काम सिर्फ ‘कश्मीरियत जिन्दाबाद’ करके ही किया जा सकता है। हाल के लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी व लोकदल ने जिस तरह जातियों के समूहों के भरोसे गठबन्धन बनाया था उससे सपा को पांच (सम्भल, रामपुर, मुरादाबाद, आजमगढ़ व मैनपुरी) सीटें ही मिलीं जबकि 2012 के विधानसभा चुनावों में यह राज्य की सत्ताधारी पार्टी बनी थी। इसका रुतबा खाक में मिलाकर आम जनता ने ही इसे ‘आइना’ दिखाया। सवाल यह है कि क्यों यादवों ने ही सपा का साथ छोड़ना उचित समझा? इस पर भाजपा को गौर करना चाहिए।

 उत्तर प्रदेश का उदाहरण कश्मीर के राजनैतिक हल की कुंजी किस तरह बने इस पर मनन होना चाहिए। राजनैतिक विकल्प समग्रता में प्रस्तुत करके ही हम पाकिस्तान की नापाक चालों का जवाब दे सकते हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव अब अमरनाथ यात्रा के बाद ही होंगे। अतः समय पर्याप्त है, आखिरकार उत्तर पूर्वी राज्यों में भी तो बदलाव आया है। यह कैसे आया है? इनमें से भी कई राज्यों में अनुच्छेद 371 लागू है जिसके प्रावधान 370 से कम नहीं हैं बल्कि कई मायनों में तो ज्यादा कड़े हैं।