फिर उठा चुनाव सुधार का दर्द !


minna

चुनाव प्रणाली में सुधार का विषय पिछले लगभग 40 साल से भी ज्यादा समय से विभिन्न राजनैतिक दलों के लिए अपने पापों से बचने के उपाय के रूप में जिस तरह कवच बनता जा रहा है उसे देखते हुए निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि इस बारे में कोई ठोस कार्य किये जाने की कोई मंशा नहीं है। हिन्दोस्तान का चुनावी इतिहास गवाह है कि पिछले 40 सालों के दौरान इसकी चुनाव प्रणाली लगातार धन शक्ति के चंगुल में फंसती गई है और साथ ही इसमें आपराधिक प्रवृत्तियों ने अपना स्थान बनाने में सफलता हासिल की है। चुनाव से सम्बन्धित जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में हमने कई बार संशोधन भी किये हैं, इसके बावजूद चुनाव लगातार धनबल और बाहुबल के खिलाडि़यों का खेल का मैदान बनते गये हैं। बिना शक चुनाव आयोग ने भी इस सन्दर्भ में संविधान से मिले अधिकारों का कारगर उपयोग चुनाव मैदान में करने में फुर्ती दिखाई है, इसके बावजूद पैसे की ताकत जनता की ताकत को रौंदती रही है।

हम जिस भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहते हैं उसमें एक साधनविहीन राजनीतिक प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्ति चुनाव में खड़े होने की हिम्मत पूरी तरह खो चुका है और उसे प्रत्याशी बनने के लिए धन्ना सेठों के दरवाजे पर नाक रगड़ना जरूरी हो गया है। इस प्रणाली के पनपने से चुनाव धन निवेश की एेसी मंडी बनते जा रहे हैं जिस पर मुनाफा जमकर कमाया जा सकता है। यदि सीधे शब्दों में कहा जाये तो राजनीति कमोबेश तिजारत में बदल गई, लेकिन इसके लिए यदि कोई पूरी तरह जिम्मेदार है तो वे इस देश के राजनीतिक दल हैं जिन्होंने अपनी नीतियों और सिद्धान्तों को बड़े-बड़े उद्योगपतियों व पूंजीपतियों और अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के समक्ष भी गिरवी रखने में कोई शर्म महसूस नहीं की है। बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में लगभग हर क्षेत्र में शत-प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश की छूट से भविष्य में यह समस्या और भी ज्यादा गंभीर रूप ले सकती है क्योंकि विदेशी कम्पनियां भारत की घरेलू राजनीति के आर्थिक पक्ष को अपने हक में अधिकाधिक करने के लिए अपने धन की ताकत का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आ सकतीं। हालांकि विदेशी कम्पनियों से राजनीतिक दलों द्वारा चन्दा लेने पर प्रतिबन्ध है मगर ये कम्पनियां अपनी मिल्कियत में चलने वाली अपनी भारतीय सहयोगी कम्पनियों का प्रयोग किस तरह करने में कामयाब हो सकती हैं इसका उदाहरण वेदान्ता कम्पनी की सहायक भारतीय कम्पनी है जिसने भाजपा व कांग्रेस दोनों को ही चन्दा दिया। देश की ये दोनों पार्टियां ही चुनाव आयोग के समक्ष इस मामले में अभियुक्त रूप में हैं। इस आक्षेप को धोने के प्रयास भी बहुत होशियारी के साथ शुरू हो गये हैं। संसद में पेश वित्त विधेयक में इस बारे में जो संशोधन रखा गया है उस पर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस पार्टी सहित अन्य दल क्या रुख अपनाते हैं, यह देखने वाला मंजर होगा।

चुनावी कानून में संशोधन का प्रस्ताव धन (मनी बिल) विधेयक के जरिये रख कर भाजपा ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वह राज्यसभा में अपने अल्पमत में होने की वजह से इसे बजट के साथ-साथ पारित कराने की राह पर चल पड़ी है, मगर जबर्दस्त विरोधाभास यह है कि हम खर्चा कम करने के तर्क पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की वकालत करते हैं और कहते हैं कि इससे धन की बचत होगी। यदि भारत की राजनीति में विदेशी कम्पनियों को चन्दे की मार्फत दखलन्दाजी करने की लेशमात्र भी इजाजत दी जाती है तो उसका असर इस देश की घरेलू अर्थव्यवस्था पर जिस तरह पड़ेगा उसका अन्दाजा भी हम फिलहाल नहीं कर सकते हैं। दुनिया का इतिहास गवाह है कि राजनैतिक गुलामी का रास्ता आर्थिक गुलामी ही बनाती है। अतः इतना इशारा ही उस भारत की प्रबुद्ध जनता के लिए काफी है जिसने अंग्रेजों के दाे साै साल के राज को उखाड़ फैंकने के लिए स्वदेशी आन्दोलन के रास्ते राजनीतिक आन्दोलन को जन्म दिया था मगर वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में चुनाव प्रणाली की वह शुद्धता और पवित्रता कायम रखे जाने की जरूरत है जिसका प्रावधान मौजूदा कानूनी दायरे में किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर आदेश देते हुए कहा है कि प्रत्याशी की अपनी निजी आय के साथ ही उसके परिवारजनों का आय का खुलासा भी चुनाव प्रपत्र भरते समय किया जाना चाहिए जिससे यह पता चल सके कि उसने चुने जाने के बाद राजनीतिक पद से आर्थिक लाभ उठाने का प्रयास तो नहीं किया।

बेशक यह बेहतरी के लिए कदम है मगर इसे हम सिर्फ सजावटी कदम ही कह सकते हैं क्योंकि चुनाव आयोग ने 1990 के बाद से जिस तरह चुनावी प्रत्याशियों व राजनीतिक दलों को कसा है उससे चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता और शुद्धता में इजाफा नहीं हुआ है बल्कि उल्टा प्रभाव यह हुआ है कि चुनावी प्रक्रिया में आम मतदाता की भागीदारी लगातार सीमित होती चली गई है। झंडे या प्रचार के सस्ते साधनों पर प्रतिबन्ध लगा देने से चुनावी प्रक्रिया को पवित्रता नहीं मिल सकती बल्कि यह आम आदमी द्वारा अपने सीमित साधनों के साथ इसमें सक्रिय व उत्साहपूर्ण भागीदारी से ही प्राप्त हो सकती है मगर राजनीतिक दल जिस पैमाने पर अपने प्रत्याशियों का चयन करते हैं उससे नये लोकतान्त्रिक रजवाड़े पैदा हो चुके हैं। अब हालत यह हो चुकी है कि ये रजवाड़े पार्टियां अदलते-बदलते रहते हैं। समस्या का समाधान एक साथ चुनाव कराने या प्रत्याशियों के आय साधनों की घोषणा से कभी संभव नहीं होगा बल्कि यह चुनावों को मूल रूप से इस प्रकार कम खर्चीला बनाने से होगा जिसमें धनी से धनी प्रत्याशी भी न्यूनतम धन खर्च के लिए बाध्य किया जा सके मगर जब राजनीतिक दलों ने यह सोच लिया हो कि पूरे कुएं में भांग डाल कर ही वे नशे का इलाज करेंगे तो क्या किया जा सकता है।

40 साल पहले जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन में 1974 में चुनाव सुधारों की गूंज उठी थी जिसे खुद जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने ही नींद की गोली दे दी। उसके बाद की सरकारें तो चुनावी चौपड़ में एेसी उलझीं कि उन्हें चुनावों की जारी प्रक्रिया में ही अपना विस्तार दिखाई देने लगा। बेशक दिनेश गोस्वामी समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सुधार किये परन्तु कालान्तर में उनका असर भी हल्का पड़ता चला गया। हकीकत यह है कि किसी भी राजनीतिक दल में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह चुनावों को धन्ना मठाधीशों से मुक्त करा सके। अब तो एक नया तुर्रा ‘ईवीएम’ मशीनों का भी खड़ा हो गया है। इसमें पड़े वोटों की असलियत पर ही तरह-तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं। चुनाव आयोग को तो सबसे पहले इन्हीं मशीनों की निष्पक्षता सिद्ध करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जबकि इसका हल बहुत आसान है कि मशीनों में वोट के साथ पड़ी पर्चियों (वीवीपैट) को भी गिनवा कर सारे शक दूर किये जा सकते हैं।