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संपादकीय

अनूठा है यह स्वतन्त्रता दिवस !

आज 15 अगस्त स्वतन्त्रता दिवस है। पिछले 72 सालों से भारतवासी यह दिवस मनाते आ रहे हैं परन्तु इस बार का यह पर्व कई मायनों में अनूठा है। 15 अगस्त 1947 को 33 करोड़ से भी कम आबादी वाला यह देश अब 130 करोड़ की आबादी वाला देश बन चुका है और जमीन में होने वाली खेती से लेकर विज्ञान जगत तक में इसने अपनी अभूतपूर्व कामयाबी के झंडे गाड़े हैं। 

पूरा विश्व भारत की इस तरक्की से जिस बात के लिए हैरत खाता है वह इसकी वह लोकतान्त्रिक प्रणाली है जिसे हमारी आजादी के दीवानों ने अपनाते हुए ऐलान किया था कि स्वतन्त्र भारत में विकास का मतलब इसके प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से किसी प्रकार का समझौता नहीं होगा और उसके सम्मान को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त होगी। अतः लोकतन्त्र भारत की सबसे बड़ी ताकत के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ जिसके जरिये यहां की जनता ने अपनी मनपसन्द राजनैतिक पार्टियों को सत्ता सौंप कर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 

इसी प्रक्रिया के चलते 2019 में भारत की सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का ऐलान करते हुए कहा कि पूरा भारत एक समान अधिकारों और कर्त्तव्यों के धागे से जोड़ा जायेगा और प्रत्येक राज्य का दर्जा एक समान संवैधानिक प्रावधानों के तहत होगा। हर स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर हमे यह फिक्र खाये जाते थी कि जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में आजादी के दिन तिरंगा लहराने को लेकर न जाने कैसा वातावरण होगा और घाटी के कुछ इलाकों से कहीं पड़ौसी पाकिस्तान के गुर्गे उसके झंडे के अक्स तो नहीं दिखाने लगेंगे।

 पिछले 72 सालों से कश्मीर में खुलकर जय हिन्द के नारे लगाने वालों को भारी हिम्मत जुटानी पड़ती थी। तिरंगा लहराने के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होती थी। यह ऐसा स्वतन्त्रता दिवस आया है कि अब पूरे सूबे जम्मू-कश्मीर के किसी भी सुदूर अंचल में कोई भी नागरिक तिरंगा लहरा कर भारत विरोधियों को करारा जवाब दे सकता है। जाहिर तौर पर केन्द्र की भाजपा सरकार के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का यह कश्मीर समस्या का राजनैतिक हल ही है जिसकी मांग इसी सूबे के अलगाववादी तत्व ऊंची-ऊंची आवाज में किया करते थे।

 मोदी के एक ही फैसले ने पूरे भारत को चौंका दिया क्योंकि पिछले 72 सालों से कश्मीर समस्या को एेसे उलझा हुआ तार बना दिया गया था जिसका कोई सिरा पकड़ने पर दूसरा सिरा गायब हो जाता था। कयामत यह थी कि बंटवारे के समय जिस राज्य का विलय भारतीय संघ में दूसरी देशी रियासतों की तर्ज पर ही हुआ था उसी को लेकर भारत द्वारा अता की गई किराये की जमीन पर तामीर हुआ मुल्क पाकिस्तान पूरी दुनिया में हो-हल्ला काटता फिरता था और मानवीय अधिकारों का ढिंढोरा पीट कर भारत को बदनाम करता रहता था। उसके इस काम में भारत में ही सक्रिय कथित उदारवादी मानवाधिकारों की समर्थक तंजीमें राग भैरवी गा-गा कर भारत को बदनाम करने का काम करती थीं। 

अतः समस्या को जड़ से समाप्त करना जरूरी था और यह कभी वह अनुच्छेद 370 था जिसे अस्थायी तौर पर कश्मीर का विलय होने के बाद संविधान में जोड़ा गया था। जरा सोचिये जब कोई मकान बनता है तो उसकी विभिन्न मंजिलें चिनने के लिये अस्थायी जीने या सीढि़यां लगाई जाती हैं। मकान के पूरा हो जाने के बाद भी क्या ये सीढि़यां उसकी शोभा बढ़ा सकती हैं? जाहिर है कि मकान या भवन की इमारत तैयार हो जाने पर इसमें पुख्ता तौर बनी सी​िढ़यां ही स्थायी रहती हैं जिनसे होकर एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक आया-जाया जाता है। 

अतः गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने जब संसद में यह पूछा कि क्या संविधान के किसी ‘अस्थायी’ उपबन्ध को किस तरह ‘स्थायी’ मानकर उसके अनुरूप ही भविष्य की योजना तैयार की जा सकती है तो किसी भी पार्टी के सांसद को इसका उत्तर नहीं सूझा। किसी भी देश के विकास का मतलब केवल इसके नागरिकों का आर्थिक विकास नहीं होता बल्कि उनका सामाजिक व वैचारिक विकास भी होता है। विचारों में जब जड़ता आने लगती है तो किसी भी प्रकार का विकास असंभव हो जाता है। अतः जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के विकास के लिये ही यह जरूरी था कि 72 साल से चली आ रही जड़ता को समाप्त किया जाये और पूरे देश से अलग-थलग होकर होने के बजाय उसके साथ मिलकर एकाकार होकर आगे बढ़ा जाये। बेशक हर प्रदेश की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं।

 अतः उनका संरक्षण करना भी शासन का ही सांवैधिक कर्त्तव्य होता है और इसके लिये हमारे संविधान में बाकायदा प्रावधान किये गये हैं।  अतः यह स्वतन्त्रता दिवस हमें अपने उस कंपकंपाते अतीत से छुटकारा दिलाता है जिसमें अपने ही एक राज्य को हमने अंतर्राष्ट्रीय समस्या बनाने की भूल कर डाली थी। श्री नरेन्द्र मोदी ने अब उसे इतिहास बना डाला है और भूल का सुधार इस अंदाज में किया है कि पूरा अंतर्राष्ट्रीय जगत हमारे साथ खड़ा हुआ है। पाकिस्तान के खिलाफ तो हमने जंग के मैदान में हर बाजी जीती है मगर अपने ही मैदान में यह बाजी जीत कर हमने सियासी तौर पर साबित कर दिया है कि मुल्क पर जां निसार करने वालों के हौसलों को तोला नहीं जा सकता।

 मैं कह चुका हूं कि यह राष्ट्रवाद का मामला नहीं है बल्कि राष्ट्रभक्ति का मुद्दा है और इस पर किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता है। दरअसल सही मायनों में जम्मू-कश्मीर को तो हमने अब भारतीय संघ में समाहित किया है क्योंकि सभी देशवासियों के अधिकार एक समान हैं। पूरा संविधान पूरी तरह से सब सूबों में लागू होता है। तिरंगे में बसा हुआ केसरिया (भगवा) रंग अब कश्मीर की नुमाइंदगी मुखर होकर करता दिखाई पड़ रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है, यह चरितार्थ होता दिख रहा है। इसलिए इस बार का स्वतन्त्रता दिवस अनूठा है।