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हाकी के सुल्तान को

मेरी उम्र के लोग शायद देश के हाकी के दिग्गजों के बारे में नहीं जानते क्योंकि क्रिकेट ने कई खेलों को निगल लिया है। मेरे पिता अश्विनी कुमार सम्पादक बनने से पहले क्रिकेटर रहे, इसलिए अक्सर खेलों पर चर्चा जरूर करते थे। उनकी क्रिकेट के साथ-साथ हाकी में भी काफी रुचि थी, इसलिए मेरी जिज्ञासा भी बढ़ती गई और मैं भी खेलों में भारत का इतिहास खोजता रहा। मैंने मेजर ध्यान चंद के बारे में पढ़ा और हाकी में इतिहास को जाना। मेरे पिता अश्विनी कुमार 1980 के ओलिम्पिक को कवर करने मास्को गए। वह बताते थे कि भारत का हाकी में स्वर्ण पदक जीतते देखना उनके लिए गौरव का विषय रहा। वह अक्सर इस बात का उल्लेख करते थे कि बलवीर सिंह सीनियर जैसे खिलाड़ी अब हाकी को नहीं मिल रहे। इसीलिए भारत का राष्ट्रीय खेल माने गए हाकी में हम पिछड़ गए।

सोमवार को जब हाकी के सुल्तान बलवीर सिंह सीनयर के चंडीगढ़ में निधन की खबर आई पिताश्री के शब्द कानों में गूंजने लगे। वह एक ऐसे खिलाड़ी रहे, जो जब मैदान में होते थे तो सामने वाली टीम जबरदस्त दबाव में हाेती थी।  वह उस हाकी टीम का ​हिस्सा रहे जिसने तीन आेलिम्पिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने का गौरव हासिल किया। उन्होंने उस दौर का प्रतिनिधित्व किया जब भारत में नम्बर एक खेल का नाम हाकी था। वे देश के सबसे बड़े खिलाड़ी के साथ-साथ दुनिया के बेहतरीन सेंटर फारवर्ड थे जिनका रिकॉर्ड आज तक कोई भी खिलाड़ी नहीं तोड़ पाया है। ये रिकॉर्ड 1952 ओलंपिक में गोल्ड जीत कर कायम किया था। उन्होंने फाइनल में 6 में से पांच गोल दागे थे। उनका यह रिकार्ड आज भी गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज है। देश को 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिली लेकिन बलवीर सिंह ने करीब एक वर्ष बाद 12 अगस्त, 1948 को उस समय आजादी महसूस की जब भारत ने ब्रिटेन को 4-0 से हराकर ओलंपिक गोल्ड जीता था। यह वो क्षण थे जब भारत का तिरंगा ब्रिटेन की धरती पर फहराया जिस ​ब्रिटेन ने भारत पर कई वर्षों तक राज किया था।

रिटायरमैंट के बाद भी बलवीर सिंह हाकी से अलग नहीं हुए। उन्होंने युवाओं के ​िलए बहुत काम किया। वह पंजाब स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल और डायरैक्टर ऑफ स्पोर्ट्स पंजाब के सचिव भी रहे। मेजर ध्यान चंद के बाद भारतीय हाकी में कोई महान खिलाड़ी कहलाने के हकदार हैं तो वह बलवीर सिंह ही हैं। वह आठवीं कक्षा में पढ़ते थे जब उन्होंने दादा ध्यानचंद के 1936 के बर्लिन ओलंपिक में खेलने की बात सुनी। उन दिनों भारत में दो ही चीजें मशहूर थीं एक मेजर ध्यान चंद और दूसरे गांधी जी। तभी उन्होंने ठान लिया था कि वह भी मेजर ध्यान चंद जैसे बनें और जनता के आदर्श बनेंगे। उनकी मेहनत और जज्बा रंग लाया और वे लगातार उपलब्धियां हासिल करते गए। यह वो दौर था जब कोई ज्यादा पैसा नहीं मिलता था। गरीबी का दौर भी देखा।

उनके जीवन के कई किस्से हैं लेकिन एक किस्सा काफी मशहूर हुआ था। जब बलवीर सिंंह स्वर्ण पदक जीतकर लंदन से भारत लौट रहे थे तो उनका पानी का जहाज बम्बई के पास ज्वार-भाटे में फंस गया। ओलंपिक स्टार बने बलवीर सिंह को अपने जहाज पर भी दो दिन रहना पड़ा। जब ज्वार-भाटा खत्म हुआ तो जहाज बंदरगाह पर लगा लेकिन इसी बीच बहुत से खेल प्रेमी नावों पर सवार होकर स्वर्ण पदक जीतने वालों को बधाई देने पानी के जहाज पर पहुंच गए थे। अपने दौर में स्टारडम का आनंद उठाने वाले बलवीर सिंह काफी विनम्र थे। उन्होंने हमेशा से ही युवा खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया और हर पीढ़ी को अनुभव और कौशल से लैस किया। वे मानते थे कि ओलंपिक खेलों की वजह से दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। खेलों से प्रेमभाव बढ़ता है। उनका मानना था कि ओलंपिक खेल इंसानियत काे तोहफा है, इसका संदेश अच्छा है कि स्टाप फाइटिंग स्टार्ट प्लेयिंग अफसोस भारतीय हाकी कुछ ऐसे लोगों का शिकार हो गई। भारतीय हाकी संघ गुटबाजी, सियासत और धनुलोलुपता का शिकार हो गई। 1980 के बाद हाकी हार से अभिशप्त हो गई। कई वर्षों तक राष्ट्रीय चैम्पियनशिप का आयोजन नहीं हो सका। चक दे इंडिया फिल्म से प्रेरणा जरूर मिली लेकिन हाकी को पुराने मुकाम तक पहुंचाने वाले नहीं मिले। बलवीर सिंह के ​ निधन से एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया। अब उनके प्रशंसकों को अपने हीरो के ​बिना जीना होगा। हाकी के सुल्तान को पंजाब केसरी परिवार की तरफ से श्रद्धांजलि। उम्मीद है कि आज के खिलाड़ी उनसे प्रेरणा पाकर हाकी के साथ अपनी रफ्तार, कौशल और उनके नैसर्गिक अंदाज को जीवित रखने का प्रयास करेंगे।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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