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मसूद अजहर की निशानदेही?

पाकिस्तान में डेरा जमाये बैठे मसूद अजहर को राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद द्वारा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने का पुरजोर स्वागत किया जाना चाहिए निश्चित तौर पर यह भारत सरकार के लम्बे प्रयासों की कूटनीतिक विजय है। मगर इस मुद्दे पर आत्मप्रशंसा में होश नहीं गंवा सकते हैं क्योंकि 1999 की सर्द रातों में हमारी ही तत्कालीन सरकार के विदेश मन्त्री ने उसे जेल से रिहा करके अपने साथ विमान में बैठा कर अफगानिस्तान के कन्धार हवाई अड्डे पर छोड़ा था। इसके बाद ही उसने पाकिस्तान पहुंचकर अपनी दहशतगर्द तंजीम ‘जैश- ए-मोहम्मद’ का गठन किया था। बेशक चीन भारत के प्रयासों पर पानी फेरते हुए उसे आतंकवादी करार करने के मार्ग में वीटो का इस्तेमाल करके बाधा खड़ी कर रहा था जिसे उसने अब वापस ले लिया है।

लेकिन दीगर सवाल यह है कि पाकिस्तान में ही कुछ दूसरे ऐसे दहशतगर्द पहले से ही मौजूद हैं जिन्हें “ग्लोबल टेरेरिस्ट’’ करार दिया जा चुका है और वे बड़े आराम से अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं। इनमें हाफिज सईद ऐसा आतंकवादी है जिसने पाकिस्तान में हुए पिछले साल के चुनावों में अपनी पार्टी तक बनाकर भाग लिया। ऐसा ही दूसरा आतंकवादी जकीउर्रहमान लखवी है जिसके खिलाफ अदालत में चले मुकदमे में जज तक छुट्टी पर चले जाते हैं। असली सवाल पाकिस्तान की उस सरकार का है जिसे वहां की फौज पर्दे के पीछे से चलाती है और दहशतगर्द तंजीमों को अपनी ‘ब्रिगेड’ के तौर पर इस्तेमाल करती है। दुनिया जानती है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर पाक आतंकवादियों ने हमला किया था तो मनमोहन सरकार के तत्कालीन विदेश मन्त्री श्री प्रणव मुखर्जी ने पाकिस्तान के समक्ष ही आतंकवादी देश घोषित होने का खतरा इस तरह खड़ा कर दिया था कि समूचे इस्लामी जगत के देशों ने ही पाकिस्तान से तौबा कराते हुए आतंकवाद को पनाह न देने की कसम ली थी।

तब प्रणवदा ने एक ऐसा कूटनीतिक दांव चला था जिसके समक्ष पाकिस्तान ने घुटनों के बल बैठकर अपने गुनाहों की माफी मांगी थी। प्रणवदा ने तब राष्ट्रसंघ में केरल मुस्लिम लीग के नेता स्व. ई. अहमद को भेजा था। वह मनमोहन सरकार में विदेश राज्यमन्त्री थे, और उन्होंने वहां जाकर कहा था कि मुम्बई हमले का साजिशकार हाफिज सईद नाम बदलकर अपनी नई दहशतगर्द तंजीम ‘जमात-उ-दावा’ बना चुका है और पाकिस्तान किसी भी तौर पर यह काम नहीं कर सकता है इसलिए ‘जमात-उ-दावा’ पर भी प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। यह धर्म निरपेक्ष भारत का पाकिस्तान में धर्म के नाम पर चलाये जा रहे आतंकवाद का जवाब था।

असल में सवाल व्यक्तियों का नहीं है बल्कि पाकिस्तान की उस नीति का है जो आतंकवाद को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग करती आ रही है। मनमोहन सरकार के जमाने से मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के प्रयास चल रहे थे जिन्हें चीन पाकिस्तान के साथ अपने सम्बन्धों के चलते रोकता चला आ रहा था किन्तु फ्रांस, ब्रिटेन व अमेरिका का दबाव बनने पर वह अकेला पड़ गया और उसने अपना अड़ंगा हटा लिया। यह भारत सरकार की मेहनत का प्रतिफल है और सरकार एक सतत प्रक्रिया होती है। अतः इस पर राजनीति की कतई गुंजाइश नहीं है लेकिन इसके साथ ही हमें अपने घर के भीतर की सुरक्षा व्यवस्था को भी देखना होगा कि किस प्रकार महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में ही माओवादियों ने महाराष्ट्र पुलिस के विशेष लड़ाकू दस्ते के 15 जवानों को शहीद कर डाला।

पुलवामा में जब हमारे 40 जवान शहीद किये गये थे तो उसमें अजहर मसूद के संगठन जैश-ए-मोहम्मद का हाथ था मगर गढ़चिरौली में जो 15 जवान शहीद हुए हैं वे तो हमारी ही सीमाओं में बैठे दहशतगर्दों का शिकार बने हैं। ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ है। गढ़चिरौली अघोषित रूप से नक्सलवादियों का इलाका है जिसमें वे पुलिस से अामना-सामना करते रहते हैं। महाराष्ट्र पुलिस ने इनसे निपटने के लिए ही विशेष पुलिस दस्ता सी-60 तक बनाया हुआ है। इसके बावजूद हमारी देश की सरकारों का काम सिर्फ शहीदों को श्रद्धांजलि देने का रह गया है। किस ताब से महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फड़नवीस कह रहे हैं कि सरकार माकूल जवाब देगी। क्या वजह है कि चाहे उड़ी हो या पठानकोट अथवा पुलवामा या गढ़चिरौली हम सिर्फ घटना हो जाने के बाद ही जागते हैं और अपनी मूंछें उमेठने लगते हैं। क्या वजह है कि पुलिस को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकार पुलिस को हेलीकाप्टर उपलब्ध नहीं करा पाती जिससे वे त्वरित कार्रवाई कर सकें। इसके लिए सरकार के पास धन की कमी आड़े आ जाती है।

क्या वजह है कि ऐसे हमलों की कोई जवाबदेही लेने को तैयार नहीं होता और राजनैतिक नेतृत्व माकूल जवाब देने का भाषण झाड़कर अपना कर्त्तव्य पूरा समझ लेता है। मुम्बई हमले के बाद तत्कालीन गृहमन्त्री श्री शिवराज पाटिल को ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमन्त्री स्व. देशमुख को भी इस्तीफा देना पड़ा था। लोकतन्त्र में राजनैतिक जवाबदेही ही प्रमुख होती है बाकी सब कुछ जुबानी जमा खर्च ही माना जाता है। सियासत का मतलब दुश्मन की हरकत का इंतजार करना नहीं बल्कि उसकी हरकतें रोकने से इस तरह होता है कि कोई भी ‘बदकारी’ करने से पहले उसकी रूह कांप जाये। यह कार्य सिर्फ कूटनीति की मार्फत ही होता है। यदि कल को नीरव मोदी या विजय माल्या भारत आ भी जाते हैं तो इससे क्या फर्क क्या पड़ेगा? जो काम उन्होंने किया है उसे करने का माहौल तो उन्हें सियासत ने ही दिया था। मुद्दा तो यह है कि माहौल को ऐसा बनाया किसने जिसकी वजह से ये हुनरमन्द आम जनता का हजारों करोड़ रुपये चम्पत करके ऐश कर रहे हैं? इसलिए असली मुद्दा यह है कि पाकिस्तान की बदनीयती में क्या फर्क आया है।