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झटका देने लगी बेलगाम महंगाई

प्याज के दाम जिस तरह डबल सेंचुरी की तरफ बढ़ रहे हैं वह आम जनता के लिए चिंता का विषय है। प्याज ही नहीं इसके साथ-साथ अन्य खाद्य पदार्थों के भाव भी बढ़ने लगे हैं। इससे स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि महंगाई फिर से बड़ा झटका देने को तैयार है। प्याज के लाल होते दामों से केन्द्र सरकार पहले से ही घिरी हुई है। ऐसे लगता है कि सरकार बेबस हो चुकी है। कभी प्याज हमें रुलाता है तो कभी टमाटर हमें डराता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्याज की कीमत बढ़ने का मुख्य कारण बेमौसमी वर्षा से फसल को नुक्सान होना है। देश के प्रमुख प्याज उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में प्याज की अधिकांश फसल नष्ट हो गई है। 

पहले तो सरकार कहती रही कि उसके पास प्याज का काफी स्टॉक है लेकिन बाद में कहा गया कि प्याज का आधा स्टाक तो गोदामों में पड़ा सड़ रहा है। सड़क से संसद तक प्याज पर महंगाई का मुद्दा जोर पकड़ चुका है। यद्यपि प्याज की बढ़ती कीमतों को लेकर केन्द्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री राम विलास पासवान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है। यह शिकायत बिहार के मुजफ्फरपुर में चीफ जुडीशियल मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में दर्ज कराई गई है जिस पर 12 दिसम्बर काे सुनवाई होगी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्याज की बढ़ती कीमतों को लेकर मंत्री महोदय ने जनता को गुमराह किया है और धोखा दिया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि पासवान उपभोक्ता मामलों, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद प्याज की कीमतों की जांच करने में नाकाम रहे हैं। 

उन्होंने बयानों से लोगों को गुमराह किया है जिससे प्याज की जमाखोरी हो गई। यद्यपि सरकार ने प्याज आयात करने का फैसला किया है और प्याज की खेप नए वर्ष में 20 जनवरी तक आ जाएगी तब तक राहत के कोई आसार नहीं हैं। शिकायत पर अदालत क्या दृष्टिकोण रखती है यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन प्रथम दृष्टि से शिकायतकर्ता की पीड़ा सही प्रतीत होती है ​कि मंत्री महोदय अपना दायित्व निभाने में विफल रहे हैं, जिन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि स्टाक में कितना प्याज पड़ा है। अगर प्याज गोदामों में पड़ा-पड़ा नष्ट हुआ तो उसकी ​जवाबदेही किस पर है। खैर प्याज पर सियासत तो होती रही है और आगे भी होती रहेगी। 

जिस तरह से रोजमर्रा की अन्य वस्तुओं के दाम बढ़ने लगे हैं उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बीते कुछ वर्षों से आर्थिक चकाचौंध के दावों के बीच आम लोगों के सामने यह हालात क्यों पैदा हुए कि बाजार उनकी पहुंच से दूर होने लगा है। खासतौर पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में जिस तेजी के साथ बढ़ौतरी हो रही है उसका सीधा असर आम घरों की थाली पर पड़ा है। जब लोगों के सामने खाने-पीने की वस्तुएं खरीदने की चुनौती है तो वे बाजार से दूसरी चीजें खरीदने की सोच भी कैसे सकते हैं। रिजर्व बैंक ने भी महंगाई बढ़ने का अनुमान जता दिया है। 

खुदरा महंगाई की दर चार फीसदी तक पहुंच सकती​ है लेकिन इस अनुमान को पार करते हुए आंकड़ा 4.62 तक पहुंच चुका है। सब्जियों, चावल, दालों आदि की कीमतों में बढ़ौतरी हो रही है। वास्तव में बाजार में ​िजस वस्तु की मांग कम होती है तो उसकी कीमत भी घटती है। यह सवाल तो उठ ही रहा है कि क्या अनिवार्य खरीदारी करने वाले खाद्य पदार्थों के मामले में व्यवस्थागत मोर्चे पर अनदेखी की जा रही है। 

सब्जियों की कीमतों में बढ़ौतरी का कारण तो फसलों का नष्ट होना या बाजार में देरी से आना माना जा सकता है लेकिन अन्य खाद्य वस्तुओं के बाजार में पहुंचने से लेकर थोक बिक्री और फिर खुदरा बिक्री के मामले में कीमतों की निगरानी के लिए किसी तंत्र ने काम ही नहीं किया। पैट्रोल-डीजल की कीमत कहां तक पहुंच गई है, इसे लेकर कोई सोच ही नहीं रहा। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से वस्तुओं की ढुलाई भी महंगी हो जाती है। केवल फसलों के तैयार होने में देरी बता कर लीपापोती की जा रही है। एक तरफ जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुएं आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं, दूसरी तरफ औद्योगिक उत्पादन में गिरावट गम्भीर चिंता का विषय बनी हुई है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आमदनी नहीं बढ़ी इसलिए मांग में कमी आ गई है। अगर यही प्रवृत्ति बनी रही तोे देश की अर्थव्यवस्था का पांच ट्रिलियन के आंकड़े तक पहुंच सकना बहुत मुश्किल होगा। रिजर्व बैंक ने जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 6.1 से घटाकर 5 फीसदी कर ​दिया है। रिजर्व बैंक का अनुमान आर्थिक मोर्चे पर एक बड़ा झटका है। आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि बाजार का मूड फिर बदलेगा। देश के काेर सैक्टर के 8 उद्योगों की हालत कोई ज्यादा अच्छी नहीं। सरकार को आर्थिक मोर्चे पर और बाजार की निगरानी के लिए कोई ठोस फैसले लेने होंगे अन्यथा ‘महंगाई डायन खाये जात है’ गाना फिर लोगों के होठों पर होगा।