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उत्तर प्रदेश का चुनावी एजेंडा

चुनावी आहट को देखते हुए उत्तर प्रदेश की राजनीति जिस तरह करवट बदल रही है उसके तहत प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावी अभियान की कमान अपने हाथ में लेते हुए जिस तरह राज्य का ‘चुनावी एजेंडा’ तय करने की कोशिश की है उसमें राज्य में ‘गुंडा राज बनाम कानून का शासन’  एक प्रमुख मुद्दा बन कर उभर रहा है। वास्तव में उत्तर प्रदेश की यह सबसे बड़ी समस्या भी रही है जिससे इस प्रदेश का आम नागरिक सबसे अधिक प्रभावित रहा है। प्रधानमन्त्री ने इस विषय को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टियों विशेष कर समाजवादी पार्टी की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। इस पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी यही मुद्दा मानी जाती है क्योंकि आम अवधारणा के अनुसार समाजवादी पार्टी के शासन में किसी पुलिस थाने के दरोगा की कम और स्थानीय समाजवादी नेताओं की ज्यादा चलती थी। इस मामले में हमें राज्य की राजनीतिक बनावट को देखना होगा जिसके तहत असामाजिक तत्व समझे जाने वाले लोगों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता था। इस बुराई से राज्य की राजनीति इस कदर प्रभावित हुई कि  समाज के अवांछित सामाजिक तत्वों की एक राजनीतिक पहचान अलग से बन गई औऱ बदकिस्मती से इसे समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ दिया गया। इतना तक होता तब भी गनीमत थी परन्तु इसे साम्प्रदायी चश्मे से भी देखा जाने लगा जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवों में बंट सी गई। 2017 में राज्य में भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार बनने के बाद जिस प्रकार इस सामाजिक–राजनीतिक वर्ग को निशाने पर लिया गया उससे आम लोगों में कानून के शासन के प्रति विश्वास जगा और पुलिस की प्रतिष्ठा में भी परिवर्तन आया। हालांकि योगी शासन के दौरान भी राज्य में गुंडा तत्व सक्रिय रहे और कुछ हिन्दू अतिवादी कहे जाने वाले लोगों ने कानून को अपनी तरह से व्याख्यायित करना चाहा परन्तु इसका विरोध भी कानून के दायरे में ही जमकर हुआ जैसे कि ‘सामाजिक पुलिस’ बनने के प्रयास परन्तु पारंपरिक अपराधी प्रवृत्ति के लोगों पर शासन सख्त हुआ जिसकी वजह से आम जनता में योगी शासन को बेहतर माना गया। हालांकि योगी शासन के दौरान अपराध की घटनाएं हुई मगर इनका सम्बन्ध किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा के लोगों से नहीं जोड़ा जा सका। बेशक लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या किये जाने का मामला सामने आया परन्तु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसका संज्ञान लिये जाने के बाद पूरा मामला राज्य प्रशासन के नियन्त्रण से बाहर हो गया। लोकतन्त्र में किसी भी सरकार की प्रशासन क्षमता का पैमाना आम जनता में उसके प्रति ऊपजी अवधारणा से ही लगाया जा सकता है । 2012 से 20217 तक राज्य के मुख्यमन्त्री के रूप में कार्यरत रहे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव की सरकार के बारे में जो अवधारणा बनी थी उसी के उलट योगी सरकार की अवधारणा बनने के मुद्दे पर प्रधानमन्त्री सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं । इसी मुद्दे को पिछले दिनों पश्चिमी व मध्य  उत्तर प्रदेश के चुनावी दौरे के दौरान गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने भी जमकर उछाला। असल में चुनाव का माहौल बनने के बाद राजनीतिज्ञ जमीन सूंघने लगते हैं और इसके बाद चुनावी विमर्श तय करने की कोशिश करते हैं क्योंकि चुनाव का नियम यही नियम होता है कि जो भी पार्टी अपने विरोधी को रक्षात्मक पाले में डालने मे कामयाब हो जाती है वही चुनाव जीत जाती है। अतः विभिन्न राजनीतिक दल चुनावी चौसर पर अपनी गोटियां बहुत सोच-विचार कर डालते हैं और इस प्रकार डालते हैं कि जो विमर्श वे खड़ा करने का प्रयास करें उससे जनता का सुर मिलता नजर आये। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के नेता श्री अखिलेश यादव ने अपनी नीतियों में 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त देने का वादा जनता से कर डाला। इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश में अब बिजली चोरी की घटनाएं बहुत कम हो चुकी हैं औऱ प्रत्येक नागरिक को बिजली बिल भरना पड़ता है जबकि पहले राज्य में बिजली चोरी को ही एक साहसिक कार्य माना जाता था। इसके साथ ही 2017 तक राज्य में  बिजली कटौती भी जम कर की जाती थी और औसतन 12 घंटे ही बिजली नागरिकों को मिल पाती थी। बिजली वितरण में सख्ती होने के बाद इस स्थिति में भारी परिवर्तन आया है और औसतन बिजली 22 घंटे तक नागरिकों को मिलती है। इसके लिए राज्य के बिजली मन्त्री श्री श्रीकान्त शर्मा बधाई के पात्र हैं जिन्होंने आधारभूत परिवर्तन करके आम लोगों को अधिकाधिक समय तक बिजली देने की व्यवस्था को सिरे चढ़ाया है। परन्तु आम लोगों के बिजली बिल भी बढ़े हैं जिसे श्री यादव एक चुनावी मुद्दा बनाना चाहते हैं। इसकी वजह यह भी  है कि उत्तर  प्रदेश के गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाले प्रत्येक परिवार को योगी सरकार द्वारा मुफ्त बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराया गया है जिसकी वजह इस वर्ग के लोगों द्वारा अपना मासिक बिजली बिल भरना एक कठिन कार्य होता है। परन्तु लोकतन्त्र में जो यह मुफ्त सौगात देने की परंपरा चल रही है उसका प्रभाव नकारात्मक ज्यादा होता है क्योंकि इससे गरीब तबके के लोगों में आगे तरक्की करने की भावना क्षीण होती है और वे यथा स्थिति को ही अपना मुकद्दर मानने लगते हैं और गरीब ही बने रहते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आजादी के तुरन्त  बाद  प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू व ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमन्त्री स्व. डा. हरेकृष्ण मेहताब के बीच हुई वह पत्र व्यवहार है जो 1953 में भारत स्थित अमेरिकी राजदूत चेस्टर बोल्स द्वारा ओडिशा में इस राज्य के गरीब जिलों में मुफ्त सामुदायिक सुविधाएं प्रदान करने के बारे में  हुई थी। डाॅ. मेहताब ने चेस्टर बोल्स द्वारा अमेरिकी मदद से मुफ्त सामुदायिक सुविधाएं प्रदान करने का कड़ा विरोध किया था और लिखा था कि ऐसा  करने से ओड़िया नागरिकों में आत्मविश्वास की कमी होगी और उन्हें मुफ्त मिली सुविधाओं की कीमत का कभी अन्दाजा नहीं होगा। उनके पं. नेहरू के नाम लिखे इस खत में विदेशी प्रभाव का जिक्र भी था। दूसरा लोकतन्त्र का सिद्धान्त यह भी होता है कि इसमें कुछ भी खैरात में नहीं मिलता है बल्कि नागरिकों को सत्ता जो भी देती है वह उनके अधिकार की शक्ल में ही देती है क्योंकि इस तरह बनी सरकार जनता की सरकार ही कहलाई जाती है।