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संपादकीय

उत्तर प्रदेश की सियासत का रंग

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन में जिस तरह सूखा पड़ा हुआ है उसके जिम्मेदार खुद सियासत के वे किरदार ही हैं जिन्होंने इस प्रदेश की जनता को जाति-बिरादरी व धर्म के बीच बांट कर अपने को सियासतदां कहलाने में फख्र महसूस किया।

सबसे अफसोसनाक यह हकीकत है कि इस सूबे की सबसे ताकतवर पार्टी कांग्रेस ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने में इस तरह फनकारी दिखाई कि सियासत के सारे सिपाही खुद ही अपना घर लुटते हुए देखते रहे और बराये नाम चोर-चोर चिल्लाते रहे लेकिन अब हालात इस तरह पलटे हैं कि कांग्रेस के घर में डाका डालने वाले खुद सड़क पर फड़ लगा कर बैठ गये हैं और ऊंची- ऊंची आवाज लगा कर अपने माल की बिक्री करने को तड़प रहे हैं। 

समाजवादी पार्टी से हाल ही में भाजपा में शामिल हुए पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. चन्द्र शेखर के बेटे इसी का ताजा नमूना हैं जिस राज्य में आजादी के परवानों से लेकर लोकतन्त्र और लोकजीवन की जांनिसार शख्सियतों की फेहरिस्त का सिलसिला सियासत को नये अन्दाज और नये आदाब सिखाने का हो उसकी खस्ता हालत पर इन शख्सियतों के कदमों के निशान भी आज पहचाने नहीं जा रहे हैं। चाहे वह डा. राम मनोहर लोहिया हों या आचार्य नरेन्द्र देव अथवा चौधरी चरण सिंह या  शिब्बन लाल सक्सेना से लेकर राजनारायण और माधव कान्त त्रिपाठी, सभी ने विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस पार्टी के मजबूत से मजबूत नेता को इस तरह आड़े हाथों लिया था कि सियासत में बुलन्दियों की नई इबारत लिखी गई थी। 

कांग्रेस पार्टी के एक से एक बड़े धुरंधर और बा-बुलन्द हुक्मरानों के खिलाफ जो भी हमला विपक्ष की तरफ से उन दिनों होता था उसके पीछे सिर्फ सस्ती शोहरत पाने का इरादा नहीं होता था बल्कि लोगों को उनके वाजिब हक दिलाने का जज्बा होता था मगर मौसम ने तब पल्टी खाई जब अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन का ज्वार उठा और कांग्रेस पार्टी इसके चलते अपनी सारी जायदाद गंवा कर तमाशबीन बन गई। खुदा भला करे मरहूम नरसिम्हाराव का जिन्होंने कांग्रेस को खत्म करने की शुरूआत उत्तर प्रदेश से ही की और 1994 के राज्य विधानसभा चुनावों में कुल 425 सीटों में से तीन चौथाई सीटें बहुजन समाज पार्टी को देते हुए कहा कि ‘जाओ और गांधी की मेहनत का ईनाम पाओ।’ इस पार्टी के नेता स्व. कांशीराम ने वह करिश्मा कर दिखाया जिसे करने में बाबा साहेब अम्बेडकर भी कामयाब नहीं हो पाये थे। 

सरेआम नारा दिया गया- ‘तिलक, तराजू और तलवार-इनको मारो जूते चार।’ भरे चौराहे पर गांधी की सीख का पोस्टमार्टम होते देख सियासत ने वह रंग बदला कि समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने खुद को मौलाना के खिताब से नवाजा जाना सुनहरी मौका समझा और देखते ही देखते पूरा उत्तर प्रदेश कबीलों में बंटता चला गया जिसमंे मतदाताओं की पहचान भारतीय होने की जगह उनकी जाति और बिरादरी से होने लगी मगर वक्त कब ठहरा है और जो ठहर जाये वह वक्त नहीं बल्कि धोखा होता है इसलिए आज वे सब लोग खुद ही फड़ लगा कर अपना माल नीलाम होता देख रहे हैं जिन्होंने कल किसी का खजाना भेष बदल-बदल कर लूटा था। 

पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. चन्द्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर का समाजवादी पार्टी से भाजपा में शामिल होना इसका पहला नमूना है। अभी और भी एेसे ही मंजर जल्दी ही पेश होने वाले हैं। जो लोग इस गलतफहमी में हैं कि मौसम बदलने से पेड़ों का रंग बदल रहा है वे गलती पर हैं क्योंकि इस बार ‘जमीन’ ही बदल गई है। सियासत को इस मुर्दारी में लाने के लिए वे लोग ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने कल तक अपनी सियासत को जिन्दा रखने के लिए लोगों के दिमाग बदलने मंे अपनी भलाई समझी थी। इन्हें जाति-बिरादरी और मजहब की दीवारों में कैद करके सियासत के नगमे गुनगुनाये थे। 

दिमागी दिवालियेपन की इस राजनीति ने उत्तर प्रदेश को सिवाय कबीलों में बांटने के दूसरा काम नहीं किया है। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस कैदखाने को तोड़ कर अपना रुतबा इस तरह बुलन्द किया है कि कांग्रेस का सारा फलसफा इसका पिछलग्गू बना घूम रहा है। यह तब्दीली कोई मामूली तब्दीली नहीं है क्योंकि इसमें सभी फलसफों को पीछे रखने की कूव्वत है जिसका नाम ‘भारतवाद’ है। 

इस भारतवाद के अलग-अलग तरीके के तब्सरे हो रहे हैं और समाजवादी पार्टी के आजम खान जैसे नेता इसे मुख्तलिफ अन्दाज में पाकिस्तान के साथ जोड़ कर हिन्दोस्तान की अमानत में खलल डालने का काम कर रहे हैं। हर मुसलमान मादरेवतन का जांनिसार सिपाही है, यही वजह है कि उसने आज तक किसी मुसलमान को अपना सरपराह समझने की जगह हिन्दू को ही अपना रहनुमा माना। यह बात और है कि उसके साथ धोखा ज्यादा हुआ। 

मजहब की पहचान में उसके हिन्दोस्तानी होने की पहचान को चाक करते हुए उसे नये जमाने की रोशनी से महरूम रखने की सियासी जमातों की कोशिशों ने उसकी हदें नमाज तक तय कर डालीं और अल्लाह पाक के इल्म के फरमान से बेदखल रखा। दरअसल उत्तर प्रदेश में तंग नजर सियासी जमातों ने जो जुल्म सभी नागरिकों पर किये हैं उसकी वजह से ही सोनभद्र जिले के एक गांव में एेसा हादसा होता है कि 90 बीघा जमीन के टुकड़े पर मालिकान हक को लेकर गौंड आदिवासी समुदाय के दस लोगों की हत्या गुर्जर समुदाय का एक ग्राम प्रधान करा देता है। 

यह जमीन का मामला तो है मगर ‘जहन’ का मामला ज्यादा है क्योंकि आदिवासियों की जान की कीमत कबायली सियासत के दायरे में सिर्फ एक ‘हमला’ है, कांग्रेस की नेता श्रीमती प्रियंका गांधी सोनभद्र जाकर इन गौंड आदिवासियों से मिल आयी हैं मगर क्या कोई जमीन पर उस जहनियत को बदल पायेगा जो उत्तर प्रदेश की तासीर बन चुकी है। इसके लिए गांधी को फिर से जिन्दा करना होगा जिसने कहा था कि कानून तब अपना काम करता है जब सशक्त व्यक्ति उस पर अमल करता है। 

बड़ा आदमी वह होता है जो अपने से छोटों से बराबरी का व्यवहार करता है मगर दिक्कत तो यह है कि आज सभी सियासी पार्टियों मंे जमीन का कारोबार करने वाले प्रापर्टी डीलर ही समाजसेवक बने हुए हैं। जहां जाइये वहीं इस कारोबार में लगे लोग कस्बे से लेकर जिले तक में सियासी पार्टियों के मनसबदार बने बैठे हैं। अब कांग्रेस पार्टी के पास उत्तर प्रदेश में आशा की एक ही ​किरण ‘प्रियंका गांधी’ के रूप में बची हैं। उत्तर प्रदेश जहां से कभी पं. नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसी शख्सियतों ने देश पर राज किया। आज लोकसभा में मात्र एक सीट के साथ देश के सबसे बड़े राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। अब आखिरी आश प्रियंका से है। वर्ना उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन कांग्रेस पार्टी के लिए बंजर हो चुकी है।