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संपादकीय

वाइको और देशद्रोह कानून

चेन्नई की अदालत ने एम.डी.एम.के. प्रमुख वाइको को 2009 राजद्रोह मामले में दोषी करार देते हुये एक वर्ष की सजा और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। तमिलनाडु में पुलिस ने 2009 में धारा 124ए और 153 के तहत मामला दर्ज किया था। साथ ही 21 अक्तूबर को उनके भाषण के लिये एम.डी.एम.के. नेता के खिलाफ विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने के लिये मामला दर्ज किया गया था। वाइको तमिलनाडु की राजनीति में कई वर्षों से सक्रिय हैं और मारुमलाची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के संस्थापक और महासचिव हैं। यद्यपि बाद में चेन्नई की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई सजा पर उनके वकील की याचिका पर एक महीने के लिये रोक लगा दी गई लेकिन सवाल राजद्रोह कानून को लेकर उठ रहे हैं। वाइको पर चेन्नई में एक पुस्तक लांच के दौरान देश विरोधी भाषण देने का आरोप है। 

वाइको ने श्रीलंकाई गृह युद्ध पर भाषण देते हुये आतंकी संगठन लिबरेशन टाईगर्स आफ तमिल ईलम (लिट्टे) का समर्थन किया था। विशेष अदालत द्वारा सजा सुनाये जाने के बाद ऐसा लग रहा था कि वह राज्यसभा चुनाव के लिये नामांकन नहीं भर सकेंगे। बहरहाल विशेषज्ञों का कहना है कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में विधायिकाओं के सदस्यों को अयोग्य घोषित करने वाली सूची में देशद्रोह का उल्लेख नहीं है, लिहाजा वह चुनाव लड़ सकेंगे। उक्त कानून में उन सदस्यों पर चुनाव लड़ने पर 6 वर्ष की पाबन्दी है जिनको दो साल की सजा हुई है और अयोग्य घोषित हुये हैं। 6 वर्ष की पाबन्दी उनकी सजा पूरी होने के बाद से प्रभावी होती है। द्रमुक ने राज्यसभा के लिये वाइको को टिकट दिया है। वाइको एक उग्र वक्ता और पाठक भी है। 

उन्हें तमिल और अंग्रेजी क्षेत्रों में उनके व्याख्यात्मक कौशल के लिये भी जाना जाता है। समाचार प​त्रों में नियमित निबन्धों और स्तंभों के अलावा उन्होंने 50 से अधिक किताबें लिखी हैं। एक तरफ अदालत उन्हें देशद्रोही करार देती है तो दूसरी तरफ वह उच्च सदन में पहुंचने को तैयार हैं। यह लोकतन्त्र की कितनी बड़ी विडम्बना है। चुनावों से पहले कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देशद्रोह कानून की धारा खत्म करने का वादा किया था। हालांकि भाजपा का कहना था कि देशद्रोह कानून को खत्म नहीं किया जायेगा। उसने देशद्रोह कानून का विरोध करने वालों को टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करार दिया था। आईपीसी की धारा 124ए के तहत लिखित या मौखिक शब्दों, चिन्हों, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर नफरत फैलाने या असंतोष जाहिर करने पर देशद्रोह का केस दर्ज किया जा सकता है। दोषी को तीन साल से उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। 

वर्ष 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने भी देशद्रोह की इसी तरह की परिभाषा पर हामी भरी थी। कुछ खास धाराओं के लागू होने पर गुट बनाकर आपस में बात करना भी आपको सरकार के विरोध में खड़ा कर सकता है और आप संदिग्ध माने जा सकते हैं। वैसे तो यह कानून अंग्रेजों के शासनकाल से लागू है। यह कानून इसलिये लागू किया गया था ताकि हकूमत के खिलाफ जाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सके। स्वतन्त्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने इसी कानून के तहत जेलों में डाला था। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान इस कानून की परिभाषा में बदलाव किया गया। आजादी के बाद इस कानून को लेकर नजरिया काफी बदला है। इस मामले में बिहार के केदारनाथ सिंह का केस काफी अहम रहा। 1962 में बिहार सरकार ने इन पर देशद्रोही भाषण देने के मामले में केस दर्ज किया था। 

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उसने कहा था कि देशद्रोह के मामलों में ऐसे भाषणों पर तभी सजा हो सकती है जहां इससे किसी भी तरह की हिंसा हो या असंतोष बढ़े। आज भारत ही नहीं दुनियाभर के लोग बोलते हैं जिनमें छात्र बहुत ज्यादा हैं। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के भाषण और वीडियो सामने आ रहे हैं। कई राजनीतिज्ञ भी अपनी हदें पार कर रहे हैं। भारत में विनायक सेन, लेखिका अरुंधति राय, हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी, कार्टुनिस्ट असीम द्विवेदी, पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और जेएनयू छात्रों आदि पर देशद्रोह कानून के तहत मुकदमे दर्ज किये गये हैं। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि एक तरफ तो संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी है तो दूसरी तरफ आजादी छीनने वाला कानून। इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकारें इस कानून का दुरुपयोग करती रही हैं और अपने राजनीतिक विरोधियों पर इसी कानून का इस्तेमाल करती रही हैं।

2003 में सर्वोच्च न्यायालय ने नजीर  खान बनाम दिल्ली सरकार के मामले में स्पष्ट कर दिया था कि राजनैतिक विचारधाराएं और सिद्धांत रखना एवं उनका प्रचार करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। मेरा मानना है कि सवाल देशद्रोह कानून खत्म करने का नहीं बल्कि उसका दुरुपयोग बंद होना चाहिये। आखिर ऐसी नारेबाजी क्यों हो जिसमें सीधे-सीधे भारत का नाम लेकर उसकी अखंडता पर चोट की जाती हो। वैसे तो देश की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि कोई विकृत नारे इसे हिला नहीं सकते। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की भी हदें तय होनी ही चाहिये।