वन्दे मातरम् और सफाई कामगार !


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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान के छात्रों को सम्बोधित करते हुए विचार व्यक्त किया कि ‘वन्दे मातरम्’ कहने का अधिकार उन सफाई कामगारों को है जो इस धरती को स्वच्छ रखते हैं। यदि हम गौर से देखें तो अन्ध भौतिकता की दौड़ में समाज जिस तरह भाग रहा है उसमें सबसे मुश्किल भरा कार्य सफाई रखने का ही है जिसे हमने बड़ी सरलता के साथ एक विशेष जाति में जन्म लेने वाले लोगों के कंधों पर डाल दिया है। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है और हम इस वैज्ञानिक युग में भी मानसिक कलुषिता के शिकार बने हुए हैं। शहरों की संभ्रान्त बस्तियों से लेकर गांवों के गली–कूचों की सफाई करने वाला सफाई कामगार खुद सबसे गन्दी बस्तियों में रहता है और शारीरिक रूप से भी अस्वच्छता में रहने के ​लिए मजबूर किया जाता है। केवल वंदे मातरम् कहने से न तो उसका कोई विकास हो सकता है और न ही उसकी भौतिक स्थिति में परिवर्तन आ सकता है। सवाल उसकी स्थिति को बदलने के ​लिए खड़ा होना चाहिए था। सरकार की नीतियों में प्रादेशिक स्तर से लेकर केन्द्र स्तर तक इस तरह परिवर्तन किए जाने की जरूरत है कि सफाई के कार्य में लगे मजदूरों या कामगारों के कार्य को सम्मान मिले और उसकी कार्य शर्तें किसी भी दूसरे पेशे की शर्तों से किसी भी स्तर पर कम न हों।

इसके साथ ही इस कार्य का मशीनीकरण इस प्रकार हो कि दूसरों के घरों के कचरे को साफ करने वाले व्यक्ति के अपने जीवन में भी स्वच्छता आ सके और वित्तीय रूप से वह पूरी तरह सख्त बन सके जिससे उसकी आने वाली पीढि़यां शिक्षित होकर सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। उसे तभी वंदे मातरम् कहने में गर्व का अनुभव हो सकता है जब उसके कार्य को वंदे मातरम् का उद्घोष करने वाले दूसरे लोग हेय दृष्टि से न देखें और उसे अपने बीच का ही सम्मानित नागरिक समझें मगर मौजूदा दौर की अर्थव्यवस्था में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों का कार्य ठेके पर देने की जो कुप्रथा शुरू हुई है उसने सफाई कर्मियों के जीवन को और भी ज्यादा नारकीय बना डाला है। इससे उसकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। हालत यह है कि अभी पिछले महीने ही राजधानी दिल्ली में ही सीवर की सफाई करने वाले कम से कम छह लोगों की मृत्यु हुई। दुखद यह है कि उन्हें मुआवजा देने में भी जमकर दलाली खाई जाती है। भारत के गांवों में आज भी हालत यह है कि सफाई कर्मी का घर बस्ती से दूर कहीं सबसे गन्दगी जगह पर होता है। प्रधानमंत्री ने स्वामी विवेकानन्द द्वारा सवा सौ साल पहले अमरीका के शिकागो में दिए गए ऐतिहासिक भाषण का भी जिक्र किया मगर हकीकत यह है कि गुरु नानकदेव जी के बाद स्वामी विवेकानन्द ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने कार्य को पूजा का पर्याय बताया था और जाति-भेद भूल कर कर्म को महत्ता देने का ज्ञान दिया था।

जब कोई मजदूर किसी अमीर आदमी का आलीशान मकान ​चिनता है तो वह अपने पूरे फन और कारीगरी को उसमें उंडेल देता है जबकि उसे मालूम होता है कि मकान बन जाने के बाद सेठ उसका उसी के बनाये मकान में प्रवेश निषेध कर देगा मगर वह निष्काम भाव से यह कार्य करता है। स्वामी विवेकानंद ने इसे ही निष्काम सेवा बताया और ताकीद दी कि मकान बनाने वाले मजदूर का सेठ जीवन पर्यन्त ऋणी ही रहेगा। गुरु नानक देव जी ने भी ऐसी ही वाणी बोली। अतः हम यह कह कर सफाई कामगारों के ऋण से उऋण नहीं हो सकते कि उन्हें ही वंदे मातरम् बोलने का पहला हक है। उनके कर्ज से मुक्त होने के लिए हमें गांवों से लेकर शहरों तक उनके ससम्मान जीने के हक को प्राथमिकता पर रखना होगा। वंदे मातरम् को किसी नारे के रूप में लेना उचित किसी भी दृष्टि से भी नहीं है क्योंकि इसमें देश के लिए समर्पण का भाव छिपा हुआ है। यही भाव च्जय हिन्द में भी है। अतः वंदे मातरम् पर झगड़ा कर हम भारत की ही अवमानना करते हैं और खुद को छोटा बनाते हैं क्योंकि भारत वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धान्त को मानने वाला देश है मगर साधू –सन्तों के इस देश में भूदान आंदोलन को समतामूलक समाज से जोड़ने वाले आचार्य विनोबा भावे भी हुए।

उनका मैं गांधीवादी होने के ​लिए पूरा सम्मान करता हूं लेकिन एक शंका का हमेशा खटका लगा रहता है कि जब भारत में सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों को बर्खास्त करके इमरजैंसी लगा दी गई थी तो आचार्य विनोबा भावे ने इस दौर को ‘अनुशासन पर्व’ का नाम दिया था। उसके बाद से उन्हें च्सरकारी सन्त कहा जाने लगा था। यह स्वयं में विचारणीय विषय है कि विनोबा की सारी सम्पत्ति क्या उसी दिन कुर्क नहीं हो गई थी जिस दिन उन्होंने इमरजैंसी का समर्थन किया था और क्या उन्होंने गांधीवाद के उस मूल सिद्धांत को तब त्याग नहीं दिया था जब उन्होंने नागरिकों के मूल अधिकार बर्खास्त करने वाले निजाम को अनुशासन पर्व कहकर महिमा मंडित करने की कोशिश की थी। यह देश निश्चित रूप से उसी गांधी का ही है जिसने एक आम आदमी की गरिमा और सम्मान को सर्वोच्च रख कर भारत का संविधान समाज के दलित वर्ग के उस व्यक्ति बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर से लिखवाया था जिसे विद्यार्थी रूप में कक्षा में कथित ऊंची जाति वाले छात्रों के साथ बैठने से भी रोका गया था ! यही तो गांधी का वंदे मातरम् का उद्घोष था जो देश की दलित और मलिन बस्तियों से स्वयं बोला था !