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संपादकीय

नल से जल सभी को लेकिन...

नीति आयोग की हाल ही में हुई बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि उनकी सरकार का लक्ष्य 2024 तक 82 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल से पेयजल आपूर्ति का है। अभी देश के 18 प्रतिशत ग्रामीण घरों में ही नल से जल की आपूर्ति होती है। मोदी सरकार की दूसरी पारी में इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये गंगा संरक्षण और पेयजल एवं स्वच्छता मन्त्रालय को मिलाकर जल शक्ति मन्त्रालय बना दिया है और इस मन्त्रालय की कमान गजेन्द्र सिंह शेखावत को सौंपी है। 

जल शक्ति मन्त्रालय देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी नदियों को जोड़ने के अटल बिहारी वाजपेयी के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा  ताकि पेयजल की समस्या का समाधान हो सके। ग्रामीण इलाकों में नल से जल पहुंचाने का काम चुनौतीपूर्ण है। यह योजना बताती है कि आजादी के 72 वर्षों बाद भी हम सभी को पेयजल उपलब्ध नहीं करा पाये हैं। महानगरों और बड़े शहरों में तो नल से जल उपलब्ध है लेकिन पेयजल के मामले में हम मानकों का पालन नहीं कर पा रहे। स्थानीय निकाय समुचित मात्रा में पानी की आपूर्ति नहीं कर पा रहा, अगर कर पा रहा है तो वह भी दूषित होता है। दूसरी ओर देश में अभूतपूर्व जल संकट गहराता जा रहा है। 

देश में सूखे का संकट हर साल बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में देश में 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सूखे की चपेट में है। सूखे से ज्यादा प्रभावित राज्यों में तेलंगाना, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक शामिल हैं। राजधानी दिल्ली और मुंबई में भी  पानी का संकट गंभीर बना हुआ है। जल संकट को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों से आ रही खबरें विचलित कर देने वाली हैं। महाराष्ट्र के औरंगाबाद के गांवों की महिलाओं को पानी की एक बाल्टी लेने के लिये टैंकर के पीछे भागना पड़ता है। 

तमिलनाडु के त्रिची इलाके में पानी को लेकर हुए झगड़े में पानी का टैंकर चलाने वाले युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। राजस्थान के अलवर जिले के दो गांवों के लोगों में पानी को लेकर खूनी संघर्ष हुआ। मध्य प्रदेश में तो जल स्रोतों पर पुलिस की पहरेदारी लगा दी गई है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों का बुरा हाल है तो कर्नाटक की स्थिति बहुत भयानक है। गुजरात के सीमांत क्षेत्रों में पानी के टैंकर के लिये भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। 

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर जल संरक्षण के लिये कदम नहीं उठाये गये तो 2030 तक देश में सबको पीने का पानी मिल पाना संभव नहीं होगा। केन्द्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के 91 जलाशयों में सिर्फ 20 फीसदी पानी बचा है। पश्चिम और दक्षिण के जलाशयों में पानी तो पिछले दस वर्षों के औसत से भी नीचे चला गया है। चिंता की बात तो यह है कि मानसून की रफ्तार धीमी है। इस बार सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान है।

अब सवाल यह है कि इस संकट का सामना कैसे किया जाये। समस्या यह है कि 

खेत प्लाट हो गये

प्लाट से मकान हो गये

मकान से दुकान हो गये

हम फिर भी पर्यावरण की बातें करते हैं।

अंधाधुंध और अनियोजित विकास के चलते भूमिगत जल का लगातार दोहन कर रहे हैं। तालाब और पोखर कहीं नजर नहीं आते। बढ़ते औद्योगिकीकरण ने पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया। जल संकट से निपटने का उपाय एक ही है, वह है जल संरक्षण। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में ग्राम प्रधानों को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि वह वर्षा की एक-एक बूंद को बचायें। पर्यावरण संरक्षण और जल संकट से बचने के लिये जल भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है।

सूखे की स्थिति में कुछ बेमिसाल उदाहरण भी हमें ​िमले हैं। 

तमिलनाडु के सूखाग्रस्त 24 जिलों में से एक वेल्लोर में 20 हजार महिलाओं ने एकजुट होकर मर चुकी नागनाधी नदी को पुनर्जीवित कर दिया। पिछले चार वर्षों में महिलाओं ने श्रमदान कर 3500 रिचार्ज कुएं बना डाले। छत्तीसगढ़ में जल संकट से परेशान ग्रामीणों ने नदी में गड्ढा खोद कर पानी निकाला। कोरिया के खडगवां में ग्राम पंचायत जडहरी में रहने वाले लोग पानी के लिये नदी में भटक रहे थे वहीं एक चट्टान के पास पानी मिला तो गड्ढा खोदकर पानी निकाला। समाज में ऐसी कई मिसालें मिल जाती हैं जिसमें जल भागीदारी से बड़े से बड़े संकट हल होते दिखाई देते हैं। 

बढ़ती जनसंख्या के चलते पर्यावरण दबाव में है। अगर हम इस समय नहीं जागे तो हालात केपटाउन जैसे हो जायेंगे। बेहतरी इसी में है कि सरकार के साथ जनता की भागीदारी बढ़ाई जाये।  जल संरक्षण की एक ठोस नीति बनाई जाये। इसमें स्कूली बच्चों से लेकर कालेज के छात्र-छात्राओं की मदद ली जाये। तालाबों का संरक्षण किया जाये। जल स्रोतों का पुनरुद्वार किया जाये। लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वह नलों को खुला न छोड़ें। भूमिगत जल का ज्यादा दोहन नहीं करें। हमें जल की एक-एक बूंद बचाने का संकल्प लेना होगा। घर-घर तक नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य तभी पूरा होगा यदि जल होगा। जल बिना सब सून। यदि जल होगा ही नहीं तो लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।