हम और हमारी ‘महान’ संसद


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भारत की महान संसद का बजट सत्र चालू भी है और बन्द भी है। जब किसी संस्था की गरिमा को धराशायी करना होता है तो उसके कामकाज को ठप्प कर दिया जाता है मगर संसद केवल कोई संस्था नहीं है बल्कि यह देश के 130 करोड़ लोगों की आवाज की प्रतिनि​िध है। यही संसद देश को सरकार देती है। बेशक यह विशिष्ट कार्य लोकसभा के ही जिम्मे है मगर राज्यसभा भी इसी सरकार के कामकाज की तसदीक भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों के समूह के रूप में इस प्रकार करती है कि प्रत्येक राज्य की अपेक्षाओं की प्रतिध्व​​​नि इस सदन में गूंजे। इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं होना चाहिए कि संसद को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी मुख्यतः प्राथमिक स्तर पर सरकार की ही होती है। इसकी वजह यह है कि संसद की मंजूरी लेकर ही सरकार अपनी नीतियों और निर्णयों को लागू कर सकती है।

यदि संसद ठप्प रहती है तो संसदीय लोकतन्त्र में इसके मायने यही निकलते हैं कि सरकारी कामकाज ठप्प हो रहा है। संसद का गठन विभिन्न राजनैतिक दलों के सदस्यों के जनप्रतिनिधि बनने से ही होता है इसलिए यह स्वाभाविक है कि इसके भीतर जो भी कामकाज होगा वह राजनैतिक आग्रहों की छाया में होगा। चूंकि सरकार भी राजनैतिक दलों के बहुमत की ताकत पर गठित होती है अतः उसका नजरिया भी राजनैतिक रूप से बढ़त प्राप्त करने का रहेगा मगर इसी विरोधाभास का नाम तो लोकतन्त्र होता है और इसी में से एेसा रास्ता निकलता है जो संसद के भीतर बहस कराकर सत्ता और विपक्ष के वजन को तोलता हुआ आगे बढ़ता है मगर यह किसी भी सूरत में लोकतन्त्र का अन्तर्द्वन्द नहीं है क्योंकि सत्ता और विपक्ष दोनों के सदस्यों को ही आम जनता चुनकर भेजती है। चाहे कोई प्रधानमन्त्री हो या एक साधारण संसद सदस्य, दोनों ही कुल जमा बराबर के मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अतः संसद के भीतर की व्यवस्था में अध्यक्ष (लोकसभा) और सभापति (राज्यसभा) के लिए सभी सदस्यों के अधिकार एक समान होते हैं। इसीलिए सदनों के नियमों के तहत इसके भीतर प्रधानमन्त्री व विपक्ष के नेता का अधिकार और सम्मान लगभग एक समान होता है। इतना ही नहीं संसद में यह भी परंपरा सदन को चलाने के लिए होती है कि सत्ता पक्ष में शामिल सदस्य इसकी कार्यवाही को रोकने या बाधित करने की एेसी कार्रवाई नहीं करेंगे जिससे अव्यवस्था का माहौल बने। यह परंपरा भी इसीलिए है कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह होती है और यह जवाबदेही विपक्ष में बैठे सांसदों की मार्फत होती है। अतः एनडीए में शामिल तेलगू देशम पार्टी का पिछले सप्ताह से लगातार दोनों ही सदनों में सभापति के आसन के निकट आकर पोस्टर लेकर नारेबाजी करना पूरी तरह विपक्ष के सदस्यों के अधिकारों को छीनने के बराबर है। उन्हें एेसे व्यवहार की इजाजत यदि दी जाती है तो इसका आक्षेप सत्ता पक्ष पर ही जाता है और परोक्ष रूप से विपक्ष द्वारा मांगे जाने वाले अन्य मसलों पर बहस को टालने का अस्त्र समझा जा सकता है परन्तु यह भी नहीं है कि एेसा पहली बार हो रहा है।

पिछली मनमोहन सरकार के दौरान भी एेसे ही नजारे हमें देखने को मिलते रहे हैं परन्तु दर्जन भर से ज्यादा दलों की मिलीजुली खिचड़ी सरकार थी। एेसी सांझा सरकारों की अपनी राजनैतिक सीमाएं होती हैं मगर मौजूदा संसद के हालात एेसे नहीं हैं कि उसकी कार्यवाही को सिर्फ इसलिए ठप्प किया जाता रहे कि सरकार विपक्षी दलों द्वारा उठाये जा रहे विषयों पर अपनी पसन्द के नियमों के तहत बहस कराना चाहती है और विपक्ष अपनी पसन्द के नियमों के तहत। एेसे मुद्दों को सुलझाने के लिए ही तो अध्यक्ष और सभापति के आसन बने हैं।

सरकार के भीतर संसदीय कार्यमन्त्री का काम तो मुख्य रूप से यही है कि वह संसदीय नियमों पर आम सहमति बनाने का काम करें। सवाल यह है कि इस दिशा में प्रयास क्यों नहीं हो रहा है ? क्या संसद में बैठे हमारे सदस्य महाराष्ट्र के किसान आन्दोलन से कुछ सीख सकते हैं ? मुफलिस और अनपढ़ कहे जाने वाले किसानों ने जिस अनुशासन के साथ अपना आन्दोलन चलाया है और देश की वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में लाखों की संख्या में पहुंचने के बावजूद वहां के नागरिकों को जरा भी असुविधा नहीं होने दी है और अपनी जायज मांगों पर महाराष्ट्र सरकार के तेवरों को ढीला किया है, उससे पूरे देश में लोकतन्त्र का डंका बजा है और सिद्ध हुआ है कि अन्ततः इस देश की राजनीति को अनपढ़ और मुफलिस कहे जाने वाले लोग ही रास्ता दिखायेंगे।

मैं शुरू से कहता आ रहा हूं कि इस देश की सबसे बड़ी खूबी यह है कि जहां राजनीतिज्ञ दिशाहीन हो जाते हैं वहां इस देश के लोग ही उन्हें राह दिखा देते हैं मगर हिमाकत तो देखिये कि भाजपा की सांसद पूनम महाजन ने इन अनुशासित किसानों को माओवादी बता डाला और मुख्यमन्त्री फड़नवीस ने आदिवासी बताया, जैसे आदिवासी होना कोई गुनाह हो! मगर ये नेता भूल गये कि इन किसानों ने मुम्बईवासी छात्रों की परीक्षा को ध्यान में रखते हुए पूरे शहर में अपना रास्ता रात्रि के एक बजे तय किया और वे निश्चित गन्तव्य तक पहुंचे। तमिलनाडु में पिछले दिनों ही आन्दोलन करने वाले एक किसान नेता को स्थानीय भाजपा नेत्री ने न केवल थप्पड़ मारा था बल्कि उसे चप्पल भी दिखाई थी।

इससे क्या हम यह सिद्ध नहीं कर रहे हैं कि केवल किसानों की चेतना से ही हमारी चेतना गुम होती जा रही है! मगर बात संसद की हो रही है अतः इसमें बैठे हुए सभी सदस्यों को यह सोचना होगा कि क्या वे महाराष्ट्र के किसानों से कुछ सीख सकते हैं ? लेकिन संसद में तो बदहवासी का आलम बिखरा हुआ है।

जिद पर जिद हावी हो रही है। डाल-डाल और पात-पात चलने का अजीब खेल हो रहा है। अगर नीरव मोदी और मेहुल चौकसी बैंकों के हजारों करोड़ रुपए लेकर भाग गए हैं तो उस पर क्या रोना, अब आगे की सोच। ले पकड़ नया विधेयक कि अब अगर एेसा होगा तो भगोड़े की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जायेगी मगर इस मुद्दे पर बात मत कर कि बैंकों में एेसा आगे नहीं होगा? और जल्दबाजी में रखे गये इस विधेयक से नागरिकों के संविधानपरक मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होगा कि सबसे पहले अपराध न्यायालय में सिद्ध होना चाहिए। इसी वजह से बीजू जनता दल के सांसद भृतहरि मेहताब ने इसका परिचय

स्तर पर ही आज लोकसभा में विरोध किया-
जिसे ‘नसीब’ हो ‘रोज-ए-स्याह’ मेरा सा,
वो शख्स दिन न कहे रात को तो क्यूंकर हो !