मोहम्मद अली जिन्ना भारत और पाकिस्तान की आजादी के एक स्वर्णिम इतिहास पर ऐसा बदनुमा दाग है जिसे कभी भी तस्वीर की शक्ल में कम से कम भारत जैसे देश में तो नहीं लगाया जाना चाहिए। सब जानते हैं कि सियासत में गड़े मुर्दे उखाड़कर उन्हें वोटों के तराजू में तौल कर इस्तेमाल किया जाता है लेकिन जब गड़े मुर्दों को जिंदा किया जाने लगता है तो विवाद उठने स्वाभाविक ही हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चंद रोज पहले पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में माने जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की उस तस्वीर को लेकर बलवा खड़ा किया गया, जो वहां के स्टूडेंट्स यूनियन के दफ्तर में 1938 से टंगी हुई है। हैरानगी तो तब हुई जब यूपी में भाजपा के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्ना की प्रशंसा में बहुत कुछ कह डाला। हालांकि इसका जबरदस्त विरोध हुआ।

यूनिवर्सिटी में तोड़फोड़ हुई, आगजनी हुई लेकिन किसी भी राज्य में जब कोई चुनाव हों या यूपी में जब हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण हो चुका हो तो ऐसे में जिन्ना का भूत बोतल से बाहर आना इसे देश में एक राजनीतिक नजरिये से अगर देखा जा रहा है तो बहस छीड़ना स्वाभाविक है। अगर आप पिछले दशक में झांकें तो भाजपा के कभी कद्दावर नेता रहे एल.के. आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर भारत-पाक आजादी के सबसे बड़े खलनायक जिन्ना की कब्र पर जाकर उनकी तारीफ में जो कसीदे गढ़े, उनकी सियासत पर ऐसा ग्रहण लगा कि वह आज तक अर्श से फर्श पर हैं।

देश के लोग विशेष रूप से भाजपा के लोग इस मामले में आज भी उनके धुर विरोधी हो चुके हैं। ऐसे में अगर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना के इतने पुराने टंगे हुए चित्र को लेकर बवाल खड़ा होता है तो समझ जाना चाहिए कि इसके पीछे सियासतदां अपना काम कर रहे हैं। देश के लोकतंत्र में इसीलिए गड़े मुर्दों को शायद संभालकर और सहेजकर रखा जाता है कि वक्त आने पर इनका सही इस्तेमाल कर लिया जाना चाहिए।

अब हम उस मुद्दे पर आते हैं जो यह सवाल खड़ा करता है कि हिन्दुस्तान को जिन्ना चाहिए या फिर शांति। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ बड़ी जल्दी-जल्दी में हुआ। अचानक एक मंत्री ने बयान दिया और बाद में उस बयान का सीएम योगी तक ने विरोध किया।

हमारा सवाल यह है कि हिन्दुस्तान जैसे शांतिप्रिय राष्ट्र में दो राष्ट्रों का बंटवारा करने वाले जिन्ना की चर्चा भी क्यों हो? एक यूनिवर्सिटी में जिन्ना का सन् 1938 में एक फोटो टांग दिया गया तो वह क्यों? देश में 1952 से लेकर आज तक यूपी में भी राज्य विधानसभा और आम चुनाव हुए, सरकारें आती रहीं और जाती रहीं तो यह फोटो इतनी देर वहां क्यों लगी रही? पहला सवाल तो कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए, पर दूसरा सवाल इस फोटो को सत्ता में रहने वाली योगी सरकार जब चाहे उखाड़कर फैंक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

बराबर विवाद खड़ा किया गया ताकि हिन्दू और मुसलमान का शोर मचे लेकिन देश के लोग इसे अलीगढ़ तक सीमित करके किसी भी दंगे की आग से खुद को दूर रखे हुए हैं। अगर जिन्ना को हम भारत-पाक के खलनायक के रूप में देखते हैं तो फिर उनका चित्र यूनिवर्सिटी में ही क्यों लगा, क्योंकि न तो वह एक टीचर थे और न ही कोई जबरदस्त स्टूडेंट। उनकी तस्वीर इतने वर्षों से आखिरकार किस स्टूडेंट्स या किस टीचर की हौंसला अफजाई कर रही थी और इतनी लंबी अवधि तक यह कैसे लगी रही,

उसकी जांच होनी चाहिए थी। या फिर भारत-पाक आजादी के उस बदनुमा दाग को धोने की कोशिश की जानी चाहिए थी जिसका नाम जिन्ना है। वह पाकिस्तान के संस्थापक हैं लेकिन मुसलमान आज भी उन्हें मसीहा नहीं मानते। हमें इससे कोई सरोकार भी नहीं लेकिन जिन्ना की हरकतें और जिस तरह से उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच खाई पैदा की उसे हम तो क्या मुसलमान कौम भी माफ नहीं करेगी। देश में सच्ची कुर्बानी तो हिन्दू महासभा के उस वीर सावरकर की रही है जिन्होंने अंडमान निकोबार जेल में रहकर भी क्रांति की अलख जगाए रखी।

हम तो इतना कहना चाहते हैं कि देश के हिन्दू और हिन्दुस्तान कभी भी जिन्ना के नाम पर सियासत स्वीकार नहीं करेगा। सियासत होनी भी नहीं चाहिए। इस सारे राजनीतिक तमाशे की तारें हिलाने वाले लोग धीरे-धीरे बेनकाब हो रहे हैं लेकिन यह भी तो सच है कि इसी भारत में कभी राम मंदिर, तो कभी सहिष्णुता और असहिष्णुता को लेकर बवाल खड़े कर दिये जाते हैं तो देश का अमन आज भी बरकरार है।

कश्मीर में पाकिस्तान की शह पर पत्थरबाज अपना काम कर रहे हैं तो भी हमारे देश के अमन और चैन का किसी ने क्या उखाड़ लिया? कहीं न कहीं नेताशाही अपना काम कर रही है। चाहे वह पत्थरबाजों को माफी देने की हो या फिर जिन्ना के नाम पर बवाल खड़े करने वालों की कोशिश हो,

बेनकाब तो सभी हो ही रहे हैं। आने वाला वक्त इस चीज का जवाब जल्दी देगा लेकिन हमारा डंके की चोट पर यह मानना है कि हिन्दुस्तान में भारत-पाक बंटवारे के सूत्रधार जिन्ना जैसे मनहूस का न कोई जिक्र हो और न कोई तस्वीर हो। भारत अमन-चैन के साथ हमेशा उन्नति की राह पर चलने वाला देश है। हम किसी के बहकावे में नहीं आ सकते। ऐसे जिन्ना-फिन्ना के शोर-शराबे हमारी हस्ती को नहीं मिटा सकते। शायद इकबाल ने ठीक ही कहा हैः
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा