शास्त्र की रक्षा के लिए शस्त्र


लगातार राष्ट्र के स्वाभिमान पर हमला हो रहा है
राष्ट्र की अस्मिता पर प्रहार हो रहा है
राष्ट्र के शौर्य को चुनौती दी जा रही है
इन चुनौतियों को स्वीकार कर ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाना चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय सेना हर चुनौती का जवाब दे रही है। जवान शहादतें देकर भी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं लेकिन परिस्थितियां पहले से कहीं अधिक जटिल हो चुकी हैं। सीमा पार बैठे दुश्मन आतंकी हमले करवा रहे हैं। चीन तनाव बढ़ाने पर आमादा है। चीन और भारत के बीच बढ़ते तनाव के चलते कुछ विशेषज्ञ क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बताने लगे हैं। उनका कहना अस्वाभाविक भी नहीं है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसने हमेशा भारत के साथ छल किया है। उसने हमारे मन्दिरों पर हमले करवाए, हमारे सैनिक प्रतिष्ठानों पर हमले करवाए, हमारे सैनिकों के शवों के साथ बर्बरता की, वह हमारे सैनिकों पर घात लगाकर हमला करने से भी नहीं चूकता। ऐसी स्थिति में दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए भारत को हर समय तैयार रहना ही होगा। आज युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। हम छद्म युद्ध को लगातार झेलते आ रहे हैं, षड्ïयंत्र जारी है। ऐसी स्थिति में सेना हर प्रौद्योगिकी से लैस हो। शास्त्र की रक्षा के लिए शस्त्र जरूरी होते हैं।
जहां शस्त्र बल नहीं,
वहां शास्त्र पछताते और रोते हैं
ऋषियों को भी तप में सिद्धि तभी मिलती है,
जब पहरे में स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं।
देश की सेनाओं विशेष तौर पर थल सेना के जवानों को पेश आने वाली साजो-सामान की कमी जैसी समस्याओं की चर्चा अक्सर राष्ट्रीय धरातल पर होती रहती है। कभी हथियारों और गोला बारूद की कमी तो कभी बुलेटप्रूफ जैकेटों और जूतों की कमी की चर्चा देश सुनता रहा है। कांग्रेस शासन में तो हथियार और गोला बारूद की कमी से देश के राजनीतिक ढांचे और प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर किस्म के सवालिया निशान उठते रहे हैं। रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के चलते कांग्रेस शासन में रक्षा मंत्री रहे ए.के. एंटनी ने तो बड़े रक्षा सौदे रद्द कर दिए थे और नई खरीद का साहस भी नहीं दिखाया था।

नि:संदेह सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के दावे प्रत्येक सरकार करती रही है परन्तु यह मर्ज कभी भी समूल खत्म नहीं होता। एक अंग की मरहम-पट्टïी की जाती है तो दूसरे अंग का घाव पक जाता है तो चार नई जरूरतें मुंह बाये सामने आ खड़ी होती हैं। नौसेना और वायुसेना की जरूरतें अलग हैं। मिसाइलों के क्षेत्र में हम पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुके हैं, देश में विमानवाहक पोत के निर्माण में भी उपलब्धि हासिल हो चुकी है। नौसेना के आणविक पनडुब्बी और विमानवाहक पोत के निर्माण ने सबको हैरान कर दिया था। सैन्य शक्ति के विस्तार को गति तो मिली लेकिन हम हथियार और गोला बारूद मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो सके। भारत के पहले बारूद कारखाने की स्थापना 1787 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पश्चिम बंगाल के इछापुर में की थी। इसके बाद गन केरिएज इकाई की स्थापना कोलकाता के निकट कोसीपुर में 1801 में की गई। 1902 में इछापुर की फैक्टरी को राइफल फैक्टरी में बदला गया। प्रथम विश्व युद्ध में इन कारखानों में बने हथियारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वतंत्र भारत के 70 वर्ष पूरे होने को हैं लेकिन देश में विश्वसनीय देसी सैन्य उत्पादन आधार की स्थापना नहीं हो सकी। राइफल से लेकर रिवाल्वर तक और छोटे हथियारों का आयात किया जाता है।

परिस्थितियों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रक्षा उत्पादन के द्वार निजी क्षेत्र के लिए खोले हैं लेकिन अभी उत्साहवर्धक परिणाम सामने आने बाकी हैं। अभी हमने बहुत लम्बा रास्ता तय करना है। मैदानी युद्ध में सैनिकों को चाहिए राइफलें, तोपें, टैंक और गोला बारूद। भारत ने सीमा पर दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सेना को फ्रीहैण्ड दे रखा है। पाक द्वारा बार-बार संघर्षविराम का उल्लंघन किया जा रहा है और रोजाना भारतीय सेना की तोपें बारूद उगल रही हैं। स्थिति को देखते हुए केन्द्र सरकार ने अब भारतीय सेना को 40 हजार करोड़ के हथियार, गोला-बारूद और अन्य जरूरी उपकरण खरीदने की छूट दे दी है। यह सरकार का अच्छा कदम है क्योंकि बड़े सौदों में अक्सर लम्बा समय लगता है। कारगिल युद्ध के दौरान तनाव बहुत बढ़ चुका था। भारत को मिसाइल रोधी मिसाइलों की तत्काल जरूरत थी। संकट की घड़ी में इस्राइल ने भारत को बराक मिसाइलों की आपूर्ति की थी।

आज भारत की थलसेना, वायुसेना और नौसेना बराक मिसाइलों से लैस हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपनी रक्षापंक्ति को इस्राइल की तरह मजबूत बनाना है। मुस्लिम राष्ट्रों से घिरा इस्राइल, जिसकी जनसंख्या बहुत कम है, की ओर कोई आंख उठाने की हिम्मत भी नहीं करता। इस्राइल से दोस्ती भारत के हित में है। खतरनाक आतंकी संगठन आईएस ने मुस्लिम देशों को तो तबाह कर दिया लेकिन उसने इस्राइल की कभी बात नहीं की। भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की ओर ठोस कदम बढ़ाने होंगे। नरेन्द्र मोदी सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति से इस दिशा में आगे बढ़ रही है। भारत युद्धपोत तैयार कर चुका है तो कोई कारण नहीं हम बंदूकें, गोला-बारूद, टोरपीडो और अन्य उपकरणों का निर्माण न कर पाएं। सरकारी स्वामित्व वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और निजी क्षेत्र को सहभागिता दिखानी होगी।