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अयोध्या में राम मन्दिर का ‘सत्कार’

अयोध्या में राम जन्म भूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी हो गई है। देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने चला यह मुकदमा कई मायनों में अभूतपूर्व है। यह भारत की मिलीजुली सांझा संस्कृति की ताकत को भी पूरी दुनिया में दिखाता है और घोषणा करता है कि हजारों साल से जिस भारत में विभिन्न जातीय वर्गों के लोग सैकड़ों भाषाएं बोलते हुए एक समुच्य राष्ट्र के हिस्से के रूप में रहते आये हैं उसकी अन्तर्प्रेरणा मानवीय ‘मनुहारों’ का ही ‘चित्रहार’ रही है। 

 21वीं सदी में यदि अयोध्या मुकदमे में मुसलमानों का पक्ष एक हिन्दू वकील राजीव धवन पुरजोर तरीके से रखते हैं तो भारत की हवाओं में सदियों से बह रही इस गुरुवाणी को कोई भी धर्म ग्रन्थ या धार्मिक कृत्य अलोप नहीं कर सकता कि ‘मानस की जात सबै एको पहचानबो।’ प्रश्न राम के भारत के पर्याय होने का नहीं है बल्कि भारत के राममय होने का है। प्रश्न बाबरी मस्जिद के अस्तित्व का नहीं है बल्कि प्रश्न राम के अस्तित्व का है। प्रश्न किसी इमारत का भी नहीं है बल्कि प्रश्न उस इबारत का है जो भारत के चप्पे-चप्पे पर लिखी हुई है। यह इबारत समूचे समाज के सहअस्तित्व की है जिससे भारत का निर्माण हुआ है।

अतः तार्किक दृष्टि से देखा जाये तो अयोध्या पर चला लम्बा मुकदमा भारत की अन्तर्प्रेरणा के ही विरुद्ध था जिसमें मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है। एक प्रकार से पूरी कानूनी कवायद भारत की अन्तर्सम्बन्धी और परस्पर निर्भर आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था के पूर्णतः विरोधी थी। इसके बावजूद दो समुदायों हिन्दू और मुसलमानों ने इसे अदालत की मार्फत सुलझाने का विकल्प चुना, परन्तु इसमें ईश्वर और अल्लाह  ही दो पक्षकार बनकर खड़े हो गये। जाहिर है कि इस मुकदमे से बचा जा सकता था और भारत की छवि को आधुनिक समय में और अधिक उज्ज्वल बनाया जा सकता था परन्तु वोटों की राजनीति ने ऐसा  नहीं होने दिया। 

लोकतन्त्र वोटों की गिनती पर ही चलता है अतः जब 6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में खड़े हुए ढांचे को ढहाया गया था तो व्यक्ति की महत्ता वोटों की महत्ता के सामने गौण हो चुकी होगी। जाहिर है कि अयोध्या का सम्बन्ध भगवान राम की जीवन लीला से रहा है अतः इसकी महत्ता प्रत्येक भारतीय को इस तरह स्पन्दित करती है कि वह राम के देश का वासी है। यही अकेला कारण पर्याप्त था जो  राम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता था, परन्तु इतिहास के जिन कालखंडों से होकर भारत गुजरा है, उन पर राजनीति की बुनियाद खड़ी करके 21वीं सदी में अयोध्या के ऊपर ईश्वर और अल्लाह को आमने-सामने कर दिया गया।

इसका असर सीमित नहीं हुआ बल्कि इस तरह असीमित हुआ कि भारतीय राजनीति की इबारत ही बदलने लगी और सामाजिक सरोकार से लेकर आर्थिक मन्त्र जय श्रीराम और अल्लाह-हो-अकबर में सिमटने लगे। अतः अयोध्या मुकदमे के फैसले का असर भी राजनीति पर बहुआयामी होगा। ऐसा नहीं है कि भारत में केवल इस्लाम व हिन्दू धर्म के प्रतीकों को लेकर ही संघर्ष होते रहे हैं। बौद्ध व सनातनी हिन्दू प्रतीकों को लेकर भी भारी संघर्ष हुए हैं। आदिशंकराचार्य महाराज ने सनातन धर्म प्रतीकों की पुनर्स्थापना के लिए केरल से लेकर उत्तर व पूर्व से लेकर पश्चिम तक चार धामों की प्रतिष्ठा करके जनजागरण किया था, लेकिन धर्म को लेकर ‘दासता’ का जो भाव अंग्रेजों ने अपने दो सौ साल के शासन में भारत में जिस प्रकार करीने से पैदा किया उसकी वजह से ही 1947 में भारत का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान का निर्माण हुआ।

राष्ट्र विभाजन का यह नासूर भारतीयों को लगातार सालता रहा जिसका असर राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहा। अयोध्या विवाद के बढ़ जाने का मूल कारण यही रहा और इसी वजह से राजनीति के सुर भी बदलते गये। हालांकि इसमें और भी कई कारण रहे जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया परन्तु मुख्य कारण ‘दास भाव’ ही रहा और इसी कारण भाजपा के लालकृष्ण अडवानी व अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने इसे ‘राष्ट्रीय आन्दोलन’ कहा। अतः कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब कांग्रेस जैसी पार्टी को भी इसी विमर्श के साये में अपना वजूद ढूंढने के लिए विवश होना पड़ा और स्वयं को प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष बताने वाले दल भी यह मानने को मजबूर हुए कि बाबरी मस्जिद के इतिहास को खंगाला जा सकता है, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा अयोध्या की उस भूमि का है

जिस पर पहले बाबारी ढांचा खड़ा हुआ था और उसके तहखाने में 1949 में भगवान राम व सीता की मूर्तियां पाये जाने की खबर के बाद वहां पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई थी जिस पर विवाद होने पर वहां अदालत ने ताला लगवा दिया था। 1986 में यह ताला खोला गया और पूजा-अर्चना फिर से शुरू हुई और मन्दिर निर्माण का आन्दोलन चला।अदालत अब फैसला देगी कि यह भूमि हिन्दुओं को मन्दिर निर्माण के लिए दी जाये अथवा इसमें मुसलमानों की भागीदारी भी हो। जाहिर है इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ऐसा ही फैसला 2010 में दिया था जिसमें दो-तिहाई भूमि हिन्दुओं को और एक-तिहाई मुसलमानों को दी गई थी परन्तु इसी के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। अब भूमि दस्तावेजों के सबूतों और तर्कों का औचित्य भारत की सहधर्मी और सहअस्तित्व व परस्पर निर्भर संस्कृति में कितना हो सकता है, इस पर भी  माननीय न्यायालय को ध्यान देना होगा।

अयोध्या में राम जन्म भूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी हो गई है। देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने चला यह मुकदमा कई मायनों में अभूतपूर्व है। यह भारत की मिलीजुली सांझा संस्कृति की ताकत को भी पूरी दुनिया में दिखाता है और घोषणा करता है कि हजारों साल से जिस भारत में विभिन्न जातीय वर्गों के लोग सैकड़ों भाषाएं बोलते हुए एक समुच्य राष्ट्र के हिस्से के रूप में रहते आये हैं उसकी अन्तर्प्रेरणा मानवीय ‘मनुहारों’ का ही ‘चित्रहार’ रही है।  21वीं सदी में यदि अयोध्या मुकदमे में मुसलमानों का पक्ष एक हिन्दू वकील राजीव धवन पुरजोर तरीके से रखते हैं तो भारत की हवाओं में सदियों से बह रही इस गुरुवाणी को कोई भी धर्म ग्रन्थ या धार्मिक कृत्य अलोप नहीं कर सकता कि ‘मानस की जात सबै एको पहचानबो।’ प्रश्न राम के भारत के पर्याय होने का नहीं है बल्कि भारत के राममय होने का है। 

प्रश्न बाबरी मस्जिद के अस्तित्व का नहीं है बल्कि प्रश्न राम के अस्तित्व का है। प्रश्न किसी इमारत का भी नहीं है बल्कि प्रश्न उस इबारत का है जो भारत के चप्पे-चप्पे पर लिखी हुई है। यह इबारत समूचे समाज के सहअस्तित्व की है जिससे भारत का निर्माण हुआ है। अतः तार्किक दृष्टि से देखा जाये तो अयोध्या पर चला लम्बा मुकदमा भारत की अन्तर्प्रेरणा के ही विरुद्ध था जिसमें मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है। एक प्रकार से पूरी कानूनी कवायद भारत की अन्तर्सम्बन्धी और परस्पर निर्भर आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था के पूर्णतः विरोधी थी। इसके बावजूद दो समुदायों हिन्दू और मुसलमानों ने इसे अदालत की मार्फत सुलझाने का विकल्प चुना, परन्तु इसमें ईश्वर और अल्लाह  ही दो पक्षकार बनकर खड़े हो गये।जाहिर है कि इस मुकदमे से बचा जा सकता था और भारत की छवि को आधुनिक समय में और अधिक उज्ज्वल बनाया जा सकता था परन्तु वोटों की राजनीति ने ऐसा  नहीं होने दिया। लोकतन्त्र वोटों की गिनती पर ही चलता है 

अतः जब 6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में खड़े हुए ढांचे को ढहाया गया था तो व्यक्ति की महत्ता वोटों की महत्ता के सामने गौण हो चुकी होगी। जाहिर है कि अयोध्या का सम्बन्ध भगवान राम की जीवन लीला से रहा है अतः इसकी महत्ता प्रत्येक भारतीय को इस तरह स्पन्दित करती है कि वह राम के देश का वासी है। यही अकेला कारण पर्याप्त था जो  राम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता था, परन्तु इतिहास के जिन कालखंडों से होकर भारत गुजरा है, उन पर राजनीति की बुनियाद खड़ी करके 21वीं सदी में अयोध्या के ऊपर ईश्वर और अल्लाह को आमने-सामने कर दिया गया। 

इसका असर सीमित नहीं हुआ बल्कि इस तरह असीमित हुआ कि भारतीय राजनीति की इबारत ही बदलने लगी और सामाजिक सरोकार से लेकर आर्थिक मन्त्र जय श्रीराम और अल्लाह-हो-अकबर में सिमटने लगे। अतः अयोध्या मुकदमे के फैसले का असर भी राजनीति पर बहुआयामी होगा। एेसा नहीं है कि भारत में केवल इस्लाम व हिन्दू धर्म के प्रतीकों को लेकर ही संघर्ष होते रहे हैं। बौद्ध व सनातनी हिन्दू प्रतीकों को लेकर भी भारी संघर्ष हुए हैं। आदिशंकराचार्य महाराज ने सनातन धर्म प्रतीकों की पुनर्स्थापना के लिए केरल से लेकर उत्तर व पूर्व से लेकर पश्चिम तक चार धामों की प्रतिष्ठा करके जनजागरण किया था, लेकिन धर्म को लेकर ‘दासता’ का जो भाव अंग्रेजों ने अपने दो सौ साल के शासन में भारत में जिस प्रकार करीने से पैदा किया उसकी वजह से ही 1947 में भारत का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान का निर्माण हुआ।

राष्ट्र विभाजन का यह नासूर भारतीयों को लगातार सालता रहा जिसका असर राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहा। अयोध्या विवाद के बढ़ जाने का मूल कारण यही रहा और इसी वजह से राजनीति के सुर भी बदलते गये। हालांकि इसमें और भी कई कारण रहे जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया परन्तु मुख्य कारण ‘दास भाव’ ही रहा और इसी कारण भाजपा के लालकृष्ण अडवानी व अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने इसे ‘राष्ट्रीय आन्दोलन’ कहा। अतः कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब कांग्रेस जैसी पार्टी को भी इसी विमर्श के साये में अपना वजूद ढूंढने के लिए विवश होना पड़ा और स्वयं को प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष बताने वाले दल भी यह मानने को मजबूर हुए कि बाबरी मस्जिद के इतिहास को खंगाला जा सकता है, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा अयोध्या की उस भूमि का है 

जिस पर पहले बाबारी ढांचा खड़ा हुआ था और उसके तहखाने में 1949 में भगवान राम व सीता की मूर्तियां पाये जाने की खबर के बाद वहां पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई थी जिस पर विवाद होने पर वहां अदालत ने ताला लगवा दिया था। 1986 में यह ताला खोला गया और पूजा-अर्चना फिर से शुरू हुई और मन्दिर निर्माण का आन्दोलन चला। अदालत अब फैसला देगी कि यह भूमि हिन्दुओं को मन्दिर निर्माण के लिए दी जाये अथवा इसमें मुसलमानों की भागीदारी भी हो। जाहिर है इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एेसा ही फैसला 2010 में दिया था जिसमें दो-तिहाई भूमि हिन्दुओं को और एक-तिहाई मुसलमानों को दी गई थी परन्तु इसी के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। अब भूमि दस्तावेजों के सबूतों और तर्कों का औचित्य भारत की सहधर्मी और सहअस्तित्व व परस्पर निर्भर संस्कृति में कितना हो सकता है, इस पर भी  माननीय न्यायालय को ध्यान देना होगा।