आजाद लोकतान्त्रिक भारत में यदि एक राज्य में आए दूसरे राज्य के लोगों के खिलाफ हिंसा और घृणा फैलाने का कुछ लोग काम करते हैं तो निश्चित रूप से यह पूरी तरह राष्ट्र विरोधी कार्य कहा जएगा और पूरी तरह गैर-संवैधानिक करार दिया जाएगा। सबसे पहले यह समझा जाना जरूरी है कि अपराधी का धर्म या समुदाय कोई भी हो सकता है परन्तु अपराध का न तो कोई धर्म होता है और न सम्प्रदाय। अतः अपराधी को किसी क्षेत्र, मजहब या सम्प्रदाय के चश्मे से देखना पूरी तरह कानून के शासन को नकारना है। गुजरात के साबरकांठा में एक अबोध बालिका के साथ बलात्कार की घटना पर जिस तरह इस राज्य में काम करने वाले उत्तर प्रदेश, बिहार या राजस्थान अथवा मध्यप्रदेश के कामगारों के खिलाफ हिंसा गुजराती और गैर-गुजराती के नाम पर हो रही है उससे प्रत्येक भारतवासी की समग्र भारतीयता को गहरी ठेस लगी है और वह अपनी क्षेत्रीय पहचान के खोल में सिमटने के लिए मजबूर हो सकता है।

यह स्थिति भारत की उस पहचान को धुंधला करती है जिसे संविधान में राज्यों का संघ (यूनियन आफ इंडिया) कहा गया है। दरअसल भारत तभी बनता है जब विभिन्न राज्य इसमें एकाकार होकर राष्ट्रीयता की सम्पूर्णता प्राप्त करते हैं और हर भारतीय की यह पहली पहचान होती है चाहे उसका धर्म, क्षेत्र या सम्प्रदाय कोई भी हो। बिना शक भारत के हर राज्य की विशेषता अलग हो सकती है और उसमें रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक पहचान भी अलग हो सकती है मगर उन्हें भारतीय होने के बोध का तार कस कर बांधे रखता है। यही बोध तो इस देश के लोगों की सबसे बड़ी ताकत है जो विविधता में एकता का मार्ग प्रशस्त करती है। गुजरात तो भारत के अस्तित्व में केन्द्रीय भूमिका राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की महामानववादी दृष्टि के चलते निभाता रहा है।

इसलिए नहीं कि बापू का जन्म इस राज्य में हुआ था बल्कि इसलिए कि उन्होंने हर प्रान्त के नागरिक में स्वतन्त्र भारतीय बनने की ललक पैदा की थी परन्तु गांधी के समय में ही हमने आपस में लड़ने का भयंकर नतीजा देश का बंटवारा देखा था। अतः गुजरात में अन्य राज्यों के लोगों के प्रति जो ताकतें नफरत फैलाना चाहती हैं उनकी मानसिकता में ज्यादा अन्तर नहीं हो सकता। इसीलिए इस प्रकार का कार्य राष्ट्र विरोधी कारनामों की श्रेणी में डाला जाना चाहिए क्योंकि भारत जैसे विविधता से भरे देश का विकास प्रत्येक राज्य के आपसी सहयोग से ही संभव हुआ है और आगे भी केवल यही रास्ता रहेगा। बिहार के लोगों का योगदान भारत के लगभग प्रत्येक राज्य के आधारभूत औद्योगिक व वाणिज्यिक विकास में रहता आया है। इसी प्रकार से पंजाब के लोगों का योगदान भी प्रत्येक राज्य की आर्थिक प्रगति में रहा है। कमाल तो यह है कि खुद पंजाब के कुटीर उद्योगों से लेकर कृषि क्षेत्र तक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का मुख्य योगदान है और गुजरात के व्यापारी समुदाय का योगदान अन्य राज्यों में व्यापार को गति देने में रहा है। इस मिलेजुले भारत की असली ताकत तो इसके लोग ही हैं जो एक-दूसरे राज्य में जाकर अपनी क्षमता और प्रतिभा के बूते पर राष्ट्र का विकास करते हैं। भारत की विविधता यह शुरू से ही रही है कि इसकी क्षेत्रीय असमानता को दूर करने में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

स्थानीय सम्पदा और स्रोतों के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लोग भारतीयता के भाव से इसमें सहयोग करते रहे हैं परन्तु सबसे दुखद यह है कि साबरकांठा की एक आपराधिक घटना को क्षेत्रीय घृणा का रूप देने की राजनीति शुरू हो गई है किन्तु इसमें सबसे ज्यादा नुकसान गुजरात का ही होगा और उसकी आर्थिक गतिविधियों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इस तथ्य से गुजरात की जनता नावाकिफ नहीं हो सकती क्योंकि इस राज्य के उद्यमी केवल भारत के विभिन्न राज्यों में ही अपनी विशिष्ट पहचान नहीं रखते हैं बल्कि विदेशों तक में उनकी अच्छी साख है। एेसी घृणा आम गुजराती से ही उसकी आर्थिक ताकत छीनने का कारण बन सकती है। गुजरात की आर्थिक ताकत का आकर्षण रहा है कि यहां स्वतन्त्रता से पहले से ही स्थापित कपड़ा उद्योग ने अन्य राज्यों के लोगों को अपनी तरफ खींचा।

स्वतन्त्रता के बाद यह राज्य लगातार औद्योगिक व वाणिज्यिक गतिविधियों में तरक्की करता रहा है और अन्य राज्यों के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता रहा परन्तु आजाद भारत में ही एेसे भी दल हैं जिन्होंने एक क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र के लोगों के खिलाफ भड़का कर अपनी राजनीतिक दुकानें जमाईं और खुद मालामाल हो गए। सबसे पहले यह कार्य मुम्बई में शुरू हुआ जिसमें शिवसेना ने दक्षिण भारतीय नागरिकों के खिलाफ अभियान चलाया था। उसके बाद यही काम भाषा व क्षेत्रीयता के नाम पर उत्तर भारतीयों के साथ शुरू हुआ लेकिन एेसी प्रवृत्तियां तभी सिर उठाती हैं जब स्वयं राजनीति भारतीयता को दांव पर लगा कर निजी स्वार्थों को पूरा करने के रास्ते पर चल पड़ती है लेकिन अन्त में लोग ही होते हैं जो राजनीति को सही रास्ते पर लाते हैं और सोचते हैं कि हम आखिरकार लड़ क्यों रहे हैं और किससे लड़ रहे हैं ? इसकी असली वजह यह है कि भारत की विविध क्षेत्रीय आर्थिक व भौगोलिक व मानवीय क्षमताएं एक-दूसरे राज्य की प्रगति में सहायक बनती रही हैं।