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जब सुप्रीम कोर्ट में हारी सुप्रीम कोर्ट

सूचना का अधिकार यानी राईट टू इन्फरमेशन कानून 2005 में भारत में लागू किया गया था। आरटीआई के तहत आवेदन देने के बाद जवाब पाने के लिए एक माह का वक्त निर्धारित है। आरटीआई कानून में बड़ी ताकत है। ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी सूचना के अधिकार के दायरे में आता है। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी एक सार्वजनिक प्राधिकरण है। 

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के सैक्रेटरी जनरल और केन्द्रीय सार्वजनिक सूचना अधिकारी की अपील खारिज कर दी। यह बड़ा रोचक मुकद्दमा था। सुप्रीम कोर्ट ही सुप्रीम कोर्ट की याचिका पर सुनवाई कर रहा था लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट ही सुप्रीम कोर्ट में हारा और न्याय जीत गया। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि संवैधानिक लोकतंत्र में जज कानून से ऊपर नहीं हो सकते। संवैधानिक पद पर होने के चलते जज भी नियम कायदों से बंधे होते हैं। जवाबदेही को पारदर्शिता से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 

दूसरी ओर संविधान पीठ ने आगाह किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का हनन भी नहीं होना चाहिए, आरटीआई कानून का इस्तेमाल निगरानी रखने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। निजता का अधिकार भी एक महत्वपूर्ण पहलु है और मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय से जानकारी देने के बारे में निर्णय लेते समय इसमें और पारदर्शिता के बीच संतुलन कायम करना होगा। इस पूरे मामले की शुरूआत तब हुई जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल ने सीजेआई आफिस को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए याचिका दायर की थी। न्यायिक व्यवस्था के दो हिस्से हैं- एक न्यायपालिका और दूसरा प्रशासन। 

न्यायपालिका पहले भी आरटीआई के दायरे में नहीं थी। अब प्रशासनिक अमला आरटीआई के दायरे में होगा। अदालत में ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ और सही लोगों की नियुक्ति के ​लिए जानकारियां देने के संबंध में यह एक अच्छा फैसला है। सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों की प्रक्रिया पर पहले आवरण रहता था। इस संंबंध में चंद लोगों को ही पता होता था। सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों को लेकर तबादले जैसे कई मुद्दे हैं जिनमें पारदर्शिता की जरूरत थी। अब सीजेआई आफिस कॉलेजियम की सभी जानकारियां वेबसाइट पर डालेगा। इस मामले में एक और पहलु भी जुड़ा हुआ है। आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे ने आरटीआई के तहत यह पूछा था ​कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट को दिया है या नहीं। 

सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने यह जानकारी देने से इंकार कर दिया था। पहले सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर हाईकोर्ट गई, वहां भी वह हारी, फिर सुप्रीम कोर्ट खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरटीआई शर्तों के साथ कोई भी जानकारी मांग सकता है लेकिन अगर इससे किसी की निजता का हनन होता है तो सीआईसी को तीसरे पक्ष से पूछना होगा। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि निजता ही सब कुछ नहीं है, निजता में भी अगर जनहित है तो संतुलन बनाना होगा। शासन तंत्र में पारदर्शिता कायम करने को लेकर गोपनीयता के नाम पर छिपाई गई जानकारियां सामने आती रही हैं लेकिन कुछ ऐसे मामले भी हैं जब सूचना और निजता के सिद्धांत के बीच टकराव की स्थिति बनती रही है। 

निजता के दायरे को अगर एक तरफ रखकर सोचें तो न्यायाधीश के तबादलों, पदोन्नतियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता की अपेक्षा की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता के समानांतर निजता के अधिकार को भी एक महत्वपूर्ण चीज माना है। यह फैसला सत्य और भविष्य प्रदान करने वाला है। स्थानीय स्तर पर आरटीआई का दुरुपयोग भी हो रहा है। चंद लोग इसका इस्तेमाल अफसरों, राजनीतिज्ञों और पुलिस वालों को धमकाने के लिए करते रहते हैं, फिर उनसे सांठगांठ कर लेते हैं, इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।

आधा तुम खा लो-आधा हम खा लें।

मिलजुल कर जमाने में गुजारा कर लें।

आरटीआई का इस्तेमाल व्यापक जनहित में ही किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से धुंध काफी हद तक छंट गई है।