BREAKING NEWS

SC में अयोध्या मामले की सुनवाई, हिंदू पक्ष के वकील ने रामलला को बताया नाबालिग◾सुप्रीम कोर्ट ने चिदंबरम की याचिका पर तत्काल सुनवाई से किया इनकार ◾PM मोदी ने जाम्बिया के राष्ट्रपति से की बातचीत, खनन और कारोबारी सहयोग पर दिया जोर ◾राहुल का केंद्र पर वार, कहा-चिदंबरम के चरित्रहनन के लिए एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही मोदी सरकार◾चिदंबरम के बचाव में प्रियंका, बोली-केंद्र की असफलताओं को उजागर करने की भुगत रहे है सजा◾उत्तर प्रदेश : योगी कैबिनेट का हुआ विस्तार, 23 मंत्रियो ने ली शपथ ◾कश्मीर मामले पर ट्रंप ने फिर की मध्यस्थता की पेशकश, कहा- PM मोदी से करूंगा बात◾INX मीडिया : चिदंबरम की बढ़ी मुश्किलें, ईडी ने जारी किया लुकआउट नोटिस ◾मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के निधन पर PM मोदी ने किया शोक व्यक्त ◾भारतीय सेना ने लिया अभिनंदन का बदला, गिरफ्तार करने वाले पाक कमांडो को किया ढेर◾चिदंबरम के लिए कयामत की रात, जेल या बेल पर फैसला सुबह ◾पंजाब, हरियाणा में बनी हुई है बाढ़ की स्थिति◾अयोध्या मामला : हिंदू निकाय ने न्यायालय से कहा: 12 वीं सदी में मंदिर के अस्तित्व का उल्लेख ◾INX मीडिया घोटाला : सीबीआई और ED ने चिदंबरम पर कसा शिकंजा , घर पर लगाया नोटिस, तलाशी अभियान अब भी जारी...◾PM मोदी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को फोन कर लंदन में भारतीयों पर हुए हमले का उठाया मुद्दा ◾असम में NRC भारत का आंतरिक मामला : जयशंकर ◾गडकरी और जावड़ेकर ने एम्स जाकर जेटली की सेहत की जानकारी ली ◾अनुच्छेद 370 हटने के बाद बारामूला में पहली मुठभेड़ ◾आम आदमी पार्टी के विधायक संदीप कुमार अयोग्य घोषित◾कश्मीर मुद्दे पर रक्षा मंत्री की US रक्षा मंत्री से बात , राजनाथ बोले - ये हमारा अंदरूनी मसला◾

संपादकीय

चुनावी राजनैतिक विमर्श कहां है?

निःसन्देह मौजूदा लोकसभा के चुनाव कोई साधारण चुनाव नहीं हैं क्योंकि इनमें जिस तरह लोकतान्त्रिक मर्यादाओं को तार-तार करके देश के लगभग सभी संवैधानिक संस्थानों को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है उससे संविधान द्वारा भारत में जनता के राज की स्थापना के विचार को गहरा धक्का लग सकता है। चुनावी समय में सत्ता और विपक्ष को एक बराबरी पर तोलने का अधिकार संविधान ने चुनाव आयोग को इस प्रकार दिया है कि निर्दलीय खड़े हुए उम्मीदवार को भी लगे कि उसके साथ बराबरी का व्यवहार हो रहा है। परन्तु जो वातावरण इन चुनावों में बना है उसे देखकर केवल यही कहा जा सकता है कि राजनैतिक दलों ने एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें करने में चुनावी दौर में न्यायालयों को भी नहीं छोड़ा है और वे इसी आधार पर मतदाताओं का ध्यान मूल मुद्दों से हटाते हुए अपनी विजय सुनिश्चित करना चाहते हैं।

सबसे बड़े अफसोस की बात यह है कि इन चुनावों में कोई भी राजनैतिक दल कोई ऐसा राजनैतिक विमर्श लोगों में तैराने में असफल रहा है जिसके आधार पर देश की भविष्य की राजनीति तय हो सके। कहने को भाजपा व कांग्रेस ने अपने-अपने घोषणापत्र जारी कर दिये हैं, मगर इन पर बात करने को कोई भी पार्टी तैयार नहीं है और वह ऐसे मुद्दों पर आपस में उलझ रहे हैं जिनका आम जनता से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। कोई यह बोलने को तैयार नहीं है कि भारत के 65 प्रतिशत युवाओं के लिए भविष्य का भारत कैसा होगा? कोई यह बोलने को तैयार नहीं है कि गरीब आदमी की आमदनी बढ़ाने के लिए कौन से उपाय किये जायेंगे? कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि जब शेयर बाजार रोज कुलांचे भर रहा है तो भारत की 80 प्रतिशत जनता के पास जो भी रुपया है उसकी क्रय शक्ति में वृद्धि क्यों नहीं हो रही है?

यह मुद्दा न जाने कहां गायब हो चुका है कि जब अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल के भावों में गिरावट के बावजूद भारत में पैट्रोल व डीजल के भाव आसमान छू रहे थे तो अब कच्चे तेल के भावों में तेजी की शुरूआत होने के बाद घरेलू बाजार मंे इसकी क्या हालत होगी? कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि जब निजी क्षेत्र की टेलीकाम कम्पनियों का मुनाफा छलांग लगा रहा है तो सरकारी क्षेत्र की बीएसएनएल जैसी कम्पनी कंगाली की हालत में कैसे आ चुकी है जिसने मोबाइल फोन के ‘सिम’ की शुरूआत की थी और जिसके पास ‘4-जी स्पैक्ट्रम’ के सारे अधिकार थे? कोई यह बोलने को तैयार ही नहीं हो रहा है कि फौज में भर्ती होने के लिए युवकों के लिए प्रशिक्षित पाठ्यक्रम चलाने के बारे में क्या पहल हुई है?

कोई बताने को तैयार ही नहीं है कि आतंकवादियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए मारे गये जवानों के परिवारों की हालत क्या है? क्या कोई यह बता सकता है कि प्रशिक्षित शिक्षकों की भरमार वाले इस देश से कितने शिक्षक पिछले पांच सालों में विदेशों में गये हैं? क्या हम यह आंकड़ा रख सकते हैं कि ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की कुल पूंजीवत्ता में कितने प्रतिशत गिरावट आयी है? मगर हम रोज देखते हैं कि शेयर बाजार कभी 38 हजार और कभी 39 हजार सूचकांक को पार कर जाता है और निजी कम्पनियों की पूंजीवत्ता में उछाला आता है जिसके विपरीत देश में प्रशिक्षित लोगों का रोजगार लगातार कम होता जा रहा है ? क्या कभी सोचा गया है कि किसानों की आय न बढ़ने की मूल वजह क्या है ? यह कहना पूरी तरह गलत है कि इस देश में धन की कमी है। भारत कभी भी गरीब मुल्क नहीं रहा। यदि एेसा होता तो अंग्रेज इसे दो सौ साल तक अपना गुलाम बनाकर नहीं रखते।

यह भारत की कूवत ही थी कि इसने आजादी के बाद के केवल 25 वर्षों में ही खुद को ‘परमाणु शक्ति’ घोषित करने के साथ ही सैनिक रूप से भी एशिया का शक्तिशाली देश होने का ऐलान 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके कर दिया था और आबादी के 30 करोड़ से बढ़कर 78 करोड़ हो जाने के बावजूद 65 प्रतिशत से अधिक लोगों को मध्यम आय वर्ग में खड़ा कर दिया था। यह ताकत भारत के लोगों की ही थी जो उन्होंने समय-समय पर अपने एक वोट के अधिकार का प्रयोग करके पाई थी। मगर आज हम ऐसी उलझन में फंसते जा रहे हैं जिसमें राजनैतिक दलों को ही पता नहीं है कि वे किस दिशा में जाना चाहते हैं और इस देश को किस तरफ ले जाना चाहते हैं। चुनावी प्रचार के दौरान जिस भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले के साथ हो रहा है उससे यही आभास होता है कि राष्ट्रीय चुनाव नहीं हो रहे हैं बल्कि जायदाद पाने के लिए जंग हो रही है जिसमें अपराधियों से लेकर खिलाड़ी और फिल्मी कलाकार सब अपना जोर लगा रहे हैं और मतदाता सोच रहा है कि क्या गजब ‘सर्कस’ आया है जिसमें कभी कोई नेता भगवान को घसीट लेता है तो कभी किसी फिल्म को।

मनोरंजन के सारे इंतजाम राजनैतिक दलों ने मुहैया कराने की सोच रखी है और हांक लगा रखी है कि देश मजबूत हो रहा है। यकीन मानिये जब ऐसा माहौल होता है तो मतदाता ही खुद खड़े होकर गांधी बाबा द्वारा बताई गई उस सीख को जमीन पर उतारता है कि ‘स्वतन्त्रता खतरे में है पूरी शक्ति के साथ इसकी रक्षा करो’ यह उक्ति आजाद भारत में भी इसीलिए मौजूद बनाये रखी गई थी जिससे लोग हमेशा अपनी ताकत को कम करके न आंके।