विकास की यह कौन सी दिशा ?


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आजादी के बाद भारत ने जो दिशा पकड़ी वह एेसे समावेशी विकास की थी जिसमें राज्य अपनी जिम्मेदारी पर गरीब से गरीब व्यक्ति को आर्थिक स्तर पर ऊपर उठने की गारंटी देता था। इसके लिए शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में उसकी भागीदारी तय करने के लिए सार्वजनिक स्तर पर निवेश करके सरकार ने यह तय करने की कोशिश की कि गरीब से गरीब आदमी का बच्चा भी अपने व्यक्तित्व का विकास करके अपने भाग्य का विधाता इस प्रकार बन सके कि समाज के धनी वर्ग के बच्चों की योग्यता धन से न मापी जा सके। इसे नेहरू की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का नाम दिया गया जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से देश के विकास की आधारशिला रखी गई।

नेहरू जी का सौभाग्य यह था कि उनके साथ काम करने वाले लोग पूरी तरह राष्ट्र के प्रति समर्पित थे और भारत की मिट्टी की तासीर से इस तरह वाकिफ थे कि उन्हें गांवों में रहने वाले साधारण व्यक्ति के जीवन के कष्टकारी माहौल का अच्छी तरह पता था। यही वजह रही कि भारत के गांवों और कस्बों से गरीबों के मेधावी छात्र आगे निकलते रहे और अपनी प्रतिभा के बूते पर आईएएस से लेकर डाक्टर व वैज्ञानिक तक बनते रहे। राज्य ने एेसे मेधावी छात्रों की देखरेख के लिए व्यापक सहायता तन्त्र खड़ा किया जिससे उन्हें आर्थिक मदद भी आवश्यकतानुरूप सुलभ होती रहे। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों को पवित्र कार्य का दर्जा इस प्रकार प्राप्त हुआ जैसे वह पुण्य बटोरने का साधन हो। ये दोनों ही व्यवसाय मानवीयता के भाव से ओत-प्रोत रहे परन्तु 1991 से हमने जिस बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाना शुरू किया उसने विकास की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया और 1992 में भारत के लोगों को पहली बार लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त के दिन सुनने को मिला कि विदेशी निवेश हमारे सर्वांगीण विकास के लिए बहुत जरूरी है। तब लोगों को लगा था कि लालकिले से तत्कालीन प्रधानमन्त्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने जो आह्वान किया है वह भारत में विदेशी निवेश के आने से रोजगार बढ़ा देगा, गरीबी को दूर करेगा और सार्वजनिक क्षेत्र की जो कम्पनियां घाटे में चल रही हैं वे निजी भागीदारी से मुनाफा कमाने वाली मशीनों में तब्दील हो जायेंगी।

किसी भी मेधावी छात्र को शिक्षा पाने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी, जो योग्य होगा उसे किसी भी शिक्षा संस्थान मंे आसानी से प्रवेश मिल जायेगा मगर इस बदलाव के ठीक 27 साल बाद हम जिस मुकाम पर आकर खड़े हुए हैं उसमें सरकारी कार्यालयों से लेकर विभिन्न संस्थानों में ठेके पर काम कराने की बाढ़ आ चुकी है। इसमें कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा और भविष्य की गारंटी को समाप्त कर दिया गया है। शिक्षा का बाजारीकरण हो गया है और धन की ताकत पर उच्च गुणवत्ता की प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पर धनी वर्ग के बच्चों का जन्म सिद्ध अधिकार जैसा हो गया है। बाजारमूलक अर्थव्यवस्था का यह सिद्धान्त कि प्रतियोगिता मूलक व्यवस्था में जो सबसे ज्यादा स्वस्थ या योग्य होगा वही टिक पायेगा, जंगल के कानून की तरह इस प्रकार फैला है कि पूरा मध्यम व लघु दर्जे का उद्योग लगभग चौपट होने के कगार पर पहुंच गया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने उत्पादों की पहुंच छोटे कस्बों से लेकर गांवों तक के बाजार में इस तरह बना ली है कि घरेलू उद्योग उनके सामने टिक ही नहीं पा रहा है। यह सिद्धान्त बन गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के जो संस्थान प्रतियोगिता में नहीं टिक पा रहे हैं उन्हें सरकार द्वारा चलाने का क्या औचित्य है अतः इनका निजीकरण किया जाना वक्त की मांग है। इसकी वजह इनकी उत्पादकता महंगी होनी बतायी जाती है और उत्पादन लागत को कम किये जाने हेतु निजीकरण का रास्ता बताया जाता है। वस्तुतः यह राज्य द्वारा अपने आर्थिक अधिकारों को छोड़ देने का एेसा रास्ता है जिससे वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से बचने का विकल्प खोज सके। यदि हम रेलवे विभाग को ही लें तो इसमें लाखों की तादाद में नौकरियां खाली पड़ी हुई हैं और सरकार इन्हें भरने से इसलिए घबरा रही है कि उस पर आर्थिक दबाव बढे़गा।

रेलवे को एक मुनाफा कमाने वाली कम्पनी के रूप में देखने का यह दोषपूर्ण नजरिया है। इसी प्रकार सरकारी प्रिंटिंग प्रेसों को बन्द करने का फैसला प्रतिगामी ही कहा जायेगा क्योंकि सरकार एेसा करके अपनी निर्भरता निजी क्षेत्र पर बढ़ायेगी। निजी क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है और यह मुनाफा सरकारी विश्वसनीयता को तरजीह नहीं देता। लोकतन्त्र में सबसे महत्वपूर्ण सरकारी विश्वसनीयता होती है क्योंकि इसी के माध्यम से सरकार का इकबाल लोगों में चमकता है मगर भारत का दुर्भाग्य है कि जब से आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ है तभी से इस देश की राजनीति ने पचास साल पीछे घूमना शुरू किया और तब से अब तक राजनीति की वही उलटी दिशा चल रही है। यह उलटी दिशा विध्वंस की वह राजनीति है जो सामाजिक सद्भाव को तार-तार करके विकास के मुद्दे को नजरों से ओझल करने की क्षमता रखती है। यह वह राजनीति है जो सामूहिक विकास को नकार कर वर्ग या सम्प्रदायगत लाभों को विकास का पर्याय मानती है और राष्ट्रीय पहचान पर इस संकीर्ण पहचान को गालिब करती है। एेसे समय मंे लोग अपने आर्थिक हितों से बेपरवाह हो जाते हैं। अतः यही वह काल है जिसमें भारत को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपना अखाड़ा बनाया और इसके बाजारों को दुहा और शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक पर केवल अमीरों का अधिकार कर डाला। कहने को हमने शिक्षा का अधिकार मूल अधिकारों में शामिल कर डाला मगर इसके माध्यम से हमने गरीबों के बच्चों को प्रतिभाहीन बनाने का तन्त्र ही बुन डाला। सितम यह है कि ये मुद्दे राष्ट्रीय चर्चा से अलग पड़े हुए हैं ?