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संपादकीय

अराजकता का जिम्मेदार कौन?

लोकतंत्र में भीड़तंत्र की अनुमति नहीं दी जा सकती। मॉब​लिंचिंग पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त टिप्पणी की थी। अदालत की टिप्पणी पर अमल करना राज्य सरकारों का दायित्व है लेकिन सरकारों और प्रशासन के नाकाम होने पर ही भीड़तंत्र लोकतंत्र पर हावी हो चुका है। स्थिति बहुत ही चिन्ताजनक है। जिस देश में भीड़ बार-बार हिंसक होने लगे वहां विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है। बुलंदशहर में भीड़ के बवाल के बीच एक पुलिस इंस्पैक्टर और एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह दिल दहला देने वाला हत्याकांड गोहत्या की अफवाह के बाद हुआ। अराजकता अपने चरम पर पहुंच गई थी। पुलिस ने भी कुछ नहीं देखा कि अगर लोग गोहत्या का विरोध कर रहे थे तो उनके पास बन्दूक या पिस्तौल जैसे हथियार क्यों थे।

सरकार की संवेदनहीनता देखिये कि बुलंदशहर हिंसा पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्चस्तरीय बैठक तो की लेकिन जो प्रैस नोट जारी हुआ उसमें गोकशी के खिलाफ सख्ती का जिक्र तो है लेकिन कहीं भी गोहत्या के नाम पर हिंसा पर लगाम लगाने या गोरक्षकों के रूप में हिंसा करने वालों पर अंकुश लगाने का स्पष्ट जिक्र नहीं किया गया। अंतिम लाइन में यह जरूर लिखा गया है-‘‘उन्होंने (मुख्यमंत्री) यह भी निर्देश दिए हैं कि अभियान चलाकर माहौल खराब करने वाले तत्वों को बेनकाब कर इस प्रकार की साजिश रचने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई की जाए। प्रैस नोट में हिंसा में मारे गए पुलिस इंस्पैक्टर सुबोध कुमार का भी अलग से कोई उल्लेख नहीं है।

योगी सरकार पहले ही गाय के नाम पर हो रहे बवाल के संदर्भ में आलोचना झेल रही है। 2018 में गाय के नाम पर 11 बवाल हो चुके हैं और इनमें अखलाक समेत 4 लोगों की मौत हो चुकी है। आलोचना से घिरे मुख्यमंत्री से सुबोध कुमार सिंह के परिजनों ने लखऊ में जाकर मुलाकात की। आरोपियों की धरपकड़ जारी है। घटना का मुख्य आरोपी योगेश राज बजरंग दल का नेता बताया जाता है। अब तो पुलिस की कारगुजारी को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। गोकशी मामले में सात मुस्लिमों के नाम एफआईआर में दर्ज किए गए। इनमें से दो नाबालिग निकले आैर बाकी के 5 घटना के दिन गांव में मौजूद ही नहीं थे। सरकार और पुलिस की तरफ से भी जनता के बीच सही संदेश नहीं गया। इसी बीच बुलंदशहर ​हिंसा का मुख्य आरोपी योगेश राज और एक अन्य आरोपी का वीडियो वायरल हुआ जिसमें दोनों खुद को बेकसूर बता रहे थे। आरोपी कह रहे हैं कि उन्हें इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे उनका लम्बा आपराधिक रिकार्ड रहा हो। योगेश राज का कहना है कि जिस हिंसा में इंस्पैक्टर की मौत हुई उस वक्त वह वहां मौजूद ही नहीं था। पूर्व की घटनाओं की तरह मुख्य आरोपी के समर्थन में स्थानीय सांसद आैर हिन्दू संगठनों के नेता भी उतर आए हैं आैर गोकशी रोकने के लिए कड़े कानून का समर्थन करने पर उसकी सराहना कर रहे हैं।

मुख्य आरोपी का महिमा मंडन किया जा रहा है। पुलिस द्वारा गोकशी और बुलंदशहर हिंसा के मामले में दर्ज की गई प्राथमिकियों में भी विरोधाभास है। क्या ऐसा करके पुलिस मुख्य आरोपियों को बचाना चाहती है? क्या यह हिंसा को वैधानिकता की छत्रछाया में लाना चाहती है? अगर ऐसा है तो यह प्रवृत्ति देश और समाज के लिए काफी घातक है। यदि किसी व्यक्ति या समूह ने कानून के खिलाफ आचरण किया है और गोवंश का वध किया है तो उसे कानून के माध्यम से दं​िडत कराया जा सकता है। इसके लिए कानून को हाथ में लेने की वजह समझ से परे है। अगर भीड़ बेकाबू होने का डर था तो अतिरिक्त पुलिस बल क्यों नहीं मंगाया गया। कितनी असहाय हो चुकी थी पुलिस ​कि अपने इंस्पैक्टर को भी भीड़ से नहीं बचा पाई।

भारत जैसे सभ्य, सुसंस्कृत समाज में ऐसी हिंसक गतिविधियों को कोई स्वीकृति प्राप्त नहीं है। हर अपराध के लिए कानून है और कानून के मुताबिक अपराधी को सजा दी जाती है। अगर भीड़तंत्र की हिंसा को पनपने दिया गया तो जिसके हाथ में लाठी होगी, उसकी भैंस होगी। फिर तो छोटी-छोटी बातों पर बेकाबू हिंसक भीड़ अपने प्रतिद्वंद्वियों या दुश्मनों पर इसी तरह हिंसक हमले करने लगेगी अगर पुलिस व कानून व्यवस्था तमाशबीन बनकर देखते रहेंगे। एेसी हिंसा को राजनीतिक स्तर पर, सामाजिक स्तर पर और सामूहिक इच्छा शक्ति से रोकने के प्रयास होने चाहिएं अन्यथा हालात ब्लूचिस्तान जैसे हो जाएंगे जहां केवल बन्दूक का राज चलता है। इससे लोकतंत्र और सामाजिक जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा। राजनीतिक दल अगर अपना स्वार्थ भूल कर समाज हित में ऐसी हिंसा को रोकें तो यह नासूर कैंसर बनने से पहले रुक सकता है।

योगी सरकार और पुलिस को ऐसे संवेदनशील मामलों से सबक लेना चाहिए और जाति, धर्म और राजनीति से ऊपर उठकर दोषियों के खिलाफ तुरंत विधि सम्मत कार्रवाई करनी चाहिए। बुलंदशहर हिंसा की जांच इस पहलू से भी की जानी चाहिए कि मारे गए इंस्पैक्टर ने दादरी में गोमांस रखने के शक में भीड़ द्वारा मार डाले गए अखलाक के मामले में शुरूआती जांच की थी। क्या भीड़ के हाथों हुई इस हत्या की जड़ में कोई सुनियोजित साजिश तो नहीं? समाज को स्वयं चाहिए कि सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने की कोशिश कर रहे उपद्रवियों को करारा जवाब दे। मारे गए इंस्पैक्टर के परिवार को मुआवजा, सरकारी नौकरी यह सब जख्मों पर मरहम के समान है। उस विधवा से पूछिये जिसके आंसू उम्र भर नहीं थमेंगे। आज हर कोई पूछ रहा है-अराजकता क्यों है भाई, इस अराजकता के लिए जिम्मेदार कौन है?