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संपादकीय

कौन है अल्पसंख्यक?

भारत में अल्पसंख्यक कौन है? यह प्रश्न बार-बार उठता रहा है लेकिन अफसोस यह देश अभी तक परिभाषा में ही उलझा हुआ है। अल्पसंख्यक की मौजूदा परिभाषा पर सवाल उठते रहे हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को निर्देश दिया है कि वह तीन माह में अल्पसंख्यक की ​परिभाषा और पहचान तय करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश एक याचिका पर दिया। इसकी परिभाषा को लेकर 2017 में भी अल्पसंख्यक आयोग को ज्ञापन सौंपा गया था लेकिन उसने इसका कोई संज्ञान ही नहीं लिया और कोई जवाब नहीं दिया। याचिका में मांग की गई है कि नेशनल कमीशन फॉर माइनोरिटी एक्ट की धारा 2 (सी) को रद्द किया जाए, यह मनमानी और अतार्किक है।

केन्द्र की 23 अक्बूर 1993 की वह अधिसूचना रद्द की जाए जिसमें पांच समुदायों-मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है। याचिका में मांग की गई है कि अल्पसंख्यक की परिभाषा और अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा-निर्देश तय हों ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सिर्फ उन्हीं अल्पसंख्यकों को संविधान के अनुच्छेद 29.30 में अधिकार और संरक्षण मिलेगा जो वास्तव में धार्मिक और भाषायी, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली न हों, जो संख्या में बहुत कम हों। 2011 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक 8 राज्यों-लक्षद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल, मणिपुर आैर पंजाब में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं लेकिन उनके अल्पसंख्यक के अधिकार बहुसंख्यकों को मिल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर जम्मू-कश्मीर में 68 फीसदी जनसंख्या मुसलमानों की है। अतः जनसंख्या के आधार पर मुसलमान किसी भी तरह से अल्पसंख्यक नहीं हैं।

अल्पसंख्यक समुदाय को परिभाषित नहीं करने की वजह से जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यकों को मिलने वाला हर लाभ मुस्लिमों को मिल रहा है जबकि जो समुदाय असल में अल्पसंख्यक हैं, वह सुविधाओं से वंचित हैं। इसी तरह लक्षद्वीप में भी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं जबकि असम, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में भी उनकी जनसंख्या काफी है लेकिन वे अल्पसंख्यक दर्जे का लाभ उठा रहे हैं। मिजोरम, मेघालय, नगालैंड में ईसाई बहुसंख्यक हैं ​जबकि अन्य राज्यों में भी उनकी जनसंख्या ठीक है। कानून के मुताबिक अल्पसंख्यक वह समुदाय है जिसे केन्द्र सरकार अधिसूचित करे। किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की विधि का काम संसद ही करती है। जहां तक अल्पसंख्यकों की बात है तो इनमें भाषायी और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। किसी भी समूह को भाषायी अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार राज्य को है। यह दर्जा उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए दिया जाता है।

अल्पसंख्यकों से भेदभाव, उनकी सुरक्षा, देश की धर्मनिरपेक्ष परम्परा को बनाए रखने और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए ही 12 जनवरी, 1978 को अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की गई थी। भारत में मुस्लिम, सिख, बौद्ध, ईसाई, पारसी और जैन समुदाय को अल्पसंख्यक के तौर पर अधिसूचित किया गया है हालांकि केन्द्र के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की तर्ज पर राज्यों में भी अल्पसंख्यक आयोग की शुरूआत हुई लेकिन कई राज्यों में अल्पसंख्यक आयोग की कारगुजारी शून्य है। 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार देश में मुस्लिमों की कुल जनसंख्या 17 करोड़, 22 लाख है जो कि कुल आबादी का 14.2 फीसद है। 2001 की जनगणना में यह आबादी 13.4 फीसद थी। मुसलमानों की आबादी में अनुपातिक तौर पर .8 फीसदी की बढ़ौतरी हुई, दूसरी ओर हिन्दू समुदाय कुल जनसंख्या का 79.8 फीसद है जो कि 2001 में 80.5 फीसद था।

यानी कुल जनसंख्या में हिन्दुओं की हिस्सेदारी कम हुई। ईसाई समुदाय की स्थिति में भी कोई कमी नहीं आई जबकि सिख समुदाय की हिस्सेदारी में .2 फीसद की कमी आई। देश की जनसंख्या 17.7 फीसद की दर से बढ़ी जबकि मुस्लिममों की आबादी की वृद्धि दर 24.6 फीसद रही। उत्तर प्रदेश के 21 जिले ऐसे हैं जहां मुस्लिमों की हिस्सेदारी 20 फीसद से अधिक है। 6 जिले ऐसे हैं जहां मुस्लिम समुदाय हिन्दू समुदाय के बराबर अथवा ज्यादा है। बड़ा सवाल यह उठता है कि राज्यों में अल्पसंख्यक तय करने का मानदंड क्या है? जिन राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, उन्हें लाभ क्यों नहीं मिल रहा।

संविधान सभा के सदस्य तजम्मुल हुसैन ने एक बार कहा था कि हम अल्पसंख्यक नहीं हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यहां तक कहा था कि इस शब्द को डिक्शनरी से हटा देना चाहिए। अब भारत में कोई अल्पसंख्यक वर्ग नहीं रह गया। उनकी भाषा की जमकर सराहना हुई थी लेकिन आज तक हम अल्पसंख्यक की सटीक परिभाषा तैयार नहीं कर पाए। इस मसले का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत राज्यों का संघ है और भारत एक है। एक तरफ हम भारत की एकता और अखंडता की बात करते हैं दूसरी तरफ हम राज्यों की बात करते हैं। आज राज्यों में अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने की बात की जा रही है तो कल जिलावार परिभाषा तय करने की बात की जाएगी। कोई नीति राष्ट्रीय स्तर पर ही लागू होनी चाहिए। आज अगर जनसंख्या के असंतुलन पर चिन्ता व्यक्त की जा रही है तो उसके अनेक पहलुओं को भी समझने की जरूरत है। इस मसले का समाधान शीघ्र निकालने की जरूरत है। देखना होगा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अायोग क्या परिभाषा गढ़ता है।