लगभग 15 वर्ष पूर्व अमर शहीद लाला जगत नारायण जी की अधूरी इच्छा को पूरा करने हेतु और समाज की जरूरत समझते हुए अमर शहीद रोमेश चन्द्र जी के नाम पर वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की शुरूआत केवल 7 बुजुर्गों के साथ अपने आफिस से की थी। सबने कहा कि किरण बच्चों के लिए काम करो, लड़कियों के लिए काम करो पुण्य का कार्य होगा, खुशियां मिलेंगी। इन बूढ़ाें का तुम क्या करोगी। घर में एक बूढ़ा नहीं सम्भाला जाता, इतने बूढ़ाें का कैसे करोगी। साथ ही यह जल्दी चले जायेंगे, ​तुम्हें निराशा होगी और आने वाले समय में तुम्हारे काम को, मेहनत को बताने वाला कोई नहीं होगा।

तो मेरा एक ही जवाब था कि एक तो लाला जी की इच्छा थी, दूसरा मैं सामाजिक कार्य करते हुए जब लोगों से मिलती हूं तो यही जाना कि बच्चे और लड़कियां यहां तक कि मंद बुद्धि के बच्चों के लिए तो बहुत से लोग काम करते हैं। बुजुर्गों के लिए कोई काम नहीं करता और इस समय इस काम की बहुत जरूरत है। जगह-जगह वृद्ध आश्रम खुल रहे हैं जो नहीं खुलने चाहिएं, बुजुर्गों को अपने घर में ही रहना है। हमारा देश श्रीराम और श्रवण का देश है और हमारी संस्कृति यही कहती है- बुजुर्ग कदमों की धूल नहीं माथे की शान हैं। और मैंने यह क्लब अश्विनी जी की सहायता से, क्योंकि हर काम शुरू करने के लिए आ​​िर्थक मदद चाहिए होती है तो उन्होंने मुझे पूरा सहयोग दिया।

वैसे भी हम अमेरिका गये थे तो एक ओल्ड होम देखने का मौका मिला, तब हमें बताया गया कि यहां लोग अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहे हैं। तब ​अश्विनी जी ने बड़ी अर्थ भरी नजरों से मेरी तरफ देखा था कि मुझे मालूम है तुम यह नहीं चाहती, इसलिये यह काम तुम्हारे चैलेंज होगा। वाकई यह बहुत बड़ा चैलेंज है क्योंकि इसमें तीन तरह के बुजुर्गों के लिए काम हो रहा है। जरूरतमंद बुजुर्ग जिनको हर महीने की 6 तारीख को आर्थिक सहायता दी जाती है।

दूसरा, मिडिल और अपर मिडिल क्लास के बुजुर्गों, जिनके लिए देशभर में 23 रीक्रिएशन सैंटर खुले हुए हैं, वे मर्यादा में रहकर गतिविधियां करते हैं, धार्मिक, सामाजिक प्रोग्राम किये जाते हैं, डाक्टर, डाइटिशियन , कानून और कई विषयाें पर चर्चा और लैक्चर होते हैं। काम बहुत तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि इस उम्र में लोगों को अकेलापन, डिप्रेशन बहुत ही होता है। इतने सालों में मैंने यही जाना कि बुजुर्गों की मदद के लिए बहुत कम लोग आगे आते हैं क्योंकि सबको लगता है कि इन्होंने तो अपनी जिन्दगी बिता ली अ​ब इनकी सहायता या इनकी बीमारी या मनोरंजन के लिए क्यों दें। तब हमने अखबार द्वारा ‘एक मिशन एक सेवा’ फंड खोला जिसमें चाहे कोई 100 रुपये दे या 1 लाख या 1 हजार या 5 हजार, सबके नाम छपते हैं।

राशि अनुसार फोटो छपती है और 80 जी के तहत उनको रसीद भी दी जाती है और ​आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों द्वारा दुनिया में पहली बार आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अडोप्शन की प्रथा चलाई कि इन बुजुर्गों को घर नहीं ले जाना, इनकी दवाई और खाने का खर्चा दो ताकि बुजुर्ग अपने घरों में अपने बच्चों के साथ रह सकें। यह 500 रुपए से शुरू हुआ था। अब 1000, 2000, 3000 प्रति बुजुर्ग प्र​ित महीना है जिससे मेरी बहुत सी मित्र आगे आईं। इतनी रकम हम झट से पिज्जा -बर्गर में खर्च कर देते हैं तो किसी बुजुर्ग की सहायता हो जाए तो कितना अच्छा। जब से मैंने शुरू किया है प्रतिभा आडवाणी हर महीने 3000 और साधना जैन हर महीने 1000 रुपए भेजती हैं। डी.पी. पप्पू, स्नेह लता, सन्तोष स्याल, के.सी. अरोड़ा-गुड़गांव, श्री एन. सूरी सैनिक फार्म, सोमनाथ मेहता, किरण मेहता, मेहरा साड़ीज, वीरा सिंह, अश्विनी तलवार, विक्रमजीत ​सिंह साहनी, महेन्द्र खुराना फरीदाबाद, नरूला पेंट्स भी हैं और सबसे बड़ी खूबी है कि कभी याद नहीं कराना पड़ता। ऐसे बहुत से हैं जिन्होंने बुजुर्ग अडोप्ट किये हुए हैं परन्तु जरूरत ज्यादा है काम ज्यादा है।

ऐसे में एक रिक्शा वाला हर महीने 20 रुपये देकर जाता है और राजस्थान के चूरू से 365 रुपये साल के, इनका भी उतना ही म​हत्व है जितना लाखों वालों का। यह भावना है, सम्मान है, संस्कार है ऐसे लोगों के प्रति। सबसे बड़े बुजुर्गों के ​िलए मसीहा बने श्री मनोज सिंघल जी और उनकी माता जी जिन्होंने 25 बुजुर्ग एडोप्ट किये और हर महीने 50 हजार का चैक पहुंचता है और बुजुर्गों के आशीर्वाद से मनोज जी आज कहां से कहां पहुंच गये हैं। वे अपनी मां के आदर्श बेटे तो हैं ही कई बुजुर्गों के भी बन गये। यही नहीं पिछले 2 महीने पहले प्रसिद्ध उद्योगपति और समाजसेवी राजेन्द्र चड्ढा जी ने जब अपनी आंखों से काम देखा, बुजुर्गों की सहायता देखी, जरूरत देखी तो उन्होंने सहायतार्थ 20 लाख का चैक दिया।

मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ 5 लाख का चैक आया तो वह भी हमारे बुजुर्गों लिए काम आया। इसलिए मैं ऐसे लोगों का शुक्रिया करती हूं कि उन्होंने हमारे काम को समझा। ऐसे ही एक बार ​िवक्रमजीत साहनी और ज्योति सूरी भी 5 लाख के चैक भेज चुके हैं। कहने का भाव है ​िक यह एक ऐसा कार्य है जो पंजाब केसरी और अन्य दानी लोगों की सहायता से आगे बढ़ रहा है। अभी मैं चौपाल के माध्यम से जरूरतमंद लड़कियों के लिए काम भी करती हूं, जो जरूरतमंद महिलाओं को स्वावलम्बी बनाता है बहुत ही नेक काम है उसके लिए लोगों का अधिक दिल होता है, बुजुर्गों के लिए कम, ​दोनों काम मेरे दिल के नजदीक हैं परन्तु लोगों का नज़रिया भी मेरे सामने रहता है। िफर भी काम चल रहा है। अभी पिछले सप्ताह मुझे छत्तीसगढ़ के गवर्नर श्री बलराम जी दास टंडन का दो लाख का चैक आया तो मुझे बहुत खुशी हुई कि एक बुजुर्ग गवर्नर जो लालाजी और रोमेश जी के मित्र थे, उन्होंने मेरे काम की सार्थकता जानते हुए दिल से सहायता भेजी।

कहने का भाव है कि अभी भी दुनिया में बहुत से लोग हैं जो बुजुर्गों का आदर-सम्मान करते हैं, उनकी सेवा के लिए तत्पर हैं और हमें कोई छोटी राशि भेजे या बड़ी, काम करने काे प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि यह काम वाकई ही मु​श्किल है। अभी यह टीम वर्क है, इसमें हर शाखा की मुखिया का निःस्वार्थ योगदान है, उन्हें कोई पेमैंट नहीं दी जाती, वे अपना समय देकर दिलोजान से सेवा करती हैं, आशीर्वाद लेती हैं। जो भी इस यज्ञ में आहूति तन (समय देकर), मन (भाव से) व धन (आर्थिक रूप से) डाल रहे हैं उनका शुक्रिया करती हूं कि इस काम से बुजुर्गों को खुशियां मिल रही हैं। वे अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं और अच्छे घरों के बुजुर्ग हैं जो हीरो-हीरोइनों की तरह आगे बढ़ रहे हैं, °ç€¢ÅU», ​सिंगिंग, डांस में भाग लेते हैं।

बहुत से तीर्थ स्थानाें की यात्रा होती है, यहां तक की दो साल पहले दुबई 102 बुजुर्ग गए थे, वहां वाणिज्यिक दूतावास में प्रोग्राम करने में सुषमा जी ने मदद की। जिस समय सुषमा जी का बहुत बड़ा आपरेशन हो रहा था ठीक उसी समय दुबई में बुजुर्ग बड़े आत्मविश्वास से प्रोग्राम दे रहे थे आैर सुषमा जी को आशीर्वाद दे रहे थे। इस बार इतने ही बुजुर्ग सिंगापुर जा रहे हैं (ये वे बुजुर्ग हैं जो अपना खर्चा वहन कर सकते हैं) इसमें भी सुषमा जी हमारी मदद कर रही हैं। ​​सिंगापुर के एम्बेसेडर जावेद जी हमारा सहयोग कर रहे हैं, सबके सहयोग से काम आगे बढ़ रहा है। बुजुर्गों के चेहरे की खुशियां, उनके आशीर्वादों काे उठे हाथ मेरे लिए, हम सब से लिए नियामत है।
आओ चलें उनके साथ जिन्होंने हमें चलना सिखाया।