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​राजस्थान में किसकी जीत, किसकी हार

राजस्थान में हो रहे राजनैतिक नाटक का सन्देश प्रदेश वासियों को यदि यह जाता है कि 2018 में उन्होंने जिस कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दिया था वह अपनी अन्तर्कलह के चलते सत्ता की जिम्मेदारियों से बाहर हो रही है तो उपमुख्यमन्त्री सचिन पायलट को जनता की अदालत में कसूरवार ठहराये जाने से कैसे रोका जा सकेगा।

सितम यह भी है कि पायलट प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं और 2018 का विधानसभा चुनाव भी उन्हीं की अध्यक्षता में लड़ा गया था, लोकतन्त्र की मर्यादा कहती है कि यदि उन्हें राज्य की सरकार के मुखिया अशोक गहलोत की कार्यप्रणाली से आपत्ति थी तो सरकार से इस्तीफा देकर पार्टी मंच पर उनकी जवाब तलबी करनी चाहिए थी जिसका हक कांग्रेस पार्टी के संविधान के भीतर अध्यक्ष होने के नाते पायलट के पास है मगर उन्होंने ऐसा रास्ता चुना जो उन्हीं के खिलाफ पार्टी की अनुशासनात्मक कार्रवाई की दुहाई देता है।

यह निश्चित रूप से व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की लोलुपता कही जायेगी। दूसरी तरफ अशोक गहलोत का भी यह कर्त्तव्य बनता था कि वह पार्टी मंच पर पायलट की वाजिब शिकायतों का संज्ञान लेकर अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सामने किसी प्रकार के भी संकट की हालत पैदा न होने देते मगर बतौर मुख्यमन्त्री  गहलाेत  के अधिकारों का सम्मान करना भी पायलट का संवैधानिक कर्त्तव्य था।

राजस्थान के पूरे घटनाक्रम से आम जनता को जो सन्देश गया है वह पार्टी के भविष्य के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। सन्देश यह गया है कि एक जमाने में श्री राहुल गांधी के सिपाही माने जाने वाले युवा कांग्रेसी नेता पार्टी के प्रति निष्ठावान नहीं है और वे निजी लाभ और स्वार्थ के लिए पार्टी को पैरों तले रौंद सकते हैं जैसा कि मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने किया।

लोकतन्त्र में राजनीति केवल खुद हुकूमत में बैठने का माध्यम नहीं होती बल्कि वह जनता की हुकूमत काबिज करने का जरिया होती है, राजनैतिक दल और इनके नेता मात्र जरिया होते हैं। नौबहार कांग्रेसियों या अन्य किसी पार्टी के नेताओं की समझ यह सिद्धान्त इसलिए नहीं आता है क्योंकि उन्हें सिर्फ सत्ता नजर आती है, जनता उन्हें नजर नहीं आती।

गांधी बाबा हमें सिखा कर गये कि राजनीति कभी भी अपने हित के लिए नहीं होती, जिस तरह जल में तरंग छिपी रहती है उसी प्रकार जनता के हित में नेता का वास होती है, जनता का सम्मान ही नेता का सम्मान होता है, हमारी लोकतन्त्र की पूरी व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी हुई है मगर बदलते वक्त और राजनीति के खुले बाजार की आपाधापी ने पूरी सियासी जमात को ही व्यापारियों में तब्दील कर दिया है जो हर कार्य में अपना मुनाफा देखती है।

लोकतन्त्र में कोई भी मन्त्री मालिक नहीं बल्कि जनता का नौकर होता है और राष्ट्रीय सम्पत्ति की देखरेख करने वाला (केयर टेकर) होता है जिसका पूरा हिसाब उसे जनता को हर पांच साल बाद देना पड़ता है मगर मुनाफाखोरी की राजनीति ने लोकतन्त्र को इस तरह नोचा है कि इसके रोम-रोम में रोकड़ा की गंध बस चुकी है। यही वजह है कि विधायकों की बोली चन्द रुपयों के लिए लगा कर सरकारें पलट कर जनादेश का चीरहरण कर लिया जाता है और उल्टे वाह-वाही बटोरी जाती है।

राजस्थान हमें चेता रहा है कि हम इस देश के रंग-बिरंगे लोकतन्त्र को कालिख से न पुतने दें जिसमें हरियाली तक नजर न आये। यह देश विविधताओं से परिपूर्ण है जिसका राजनीति में भी परिलक्षित होना स्वाभाविक है। हमारा संघीय ढांचा भारतीय संघ की इसी भिन्नता को संविधान से जोड़ कर किसी सितार की मानिन्द कर्ण प्रिय सुरों की बौछार करता है। विभिन्न राजनैतिक दल भी इसी वातावरण को विविध जनाकांक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में प्रेरित करते हैं।

अतः राजस्थान की धरती से यही आवाज जानी चाहिए कि जनादेश के साथ न तो किसी प्रकार का अत्याचार होगा और न ही उसका अपहरण किया जा सकेगा। समय ने यह जिम्मेदारी सचिन पायलट जैसे युवा नेता पर डाली है। इस चुनौती को पूरी हिम्मत के साथ उन्हें स्वीकार करना चाहिए और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को जनता की आकांक्षाओं के आइने में ही देखना चाहिए।

उसके साथ ही श्रीमती प्रियंका गांधी ने जो संवाद स्थापित करके उन्हें रास्ते पर लाने का प्रयास शुरू किया है उसका सद्परिणाम इस तरह आये कि सचिन पायलट को स्वयं गर्व की अनुभूति हो, जहां तक अशोक गहलोत का संबंध है तो उन्होंने फिलहाल सिद्ध कर दिया है कि राजनीति का अंक गणित उनके साथ है और 200 सदस्यीय विधानसभा में 109 विधायक उनके साथ हैं। सचिन के साथ सिर्फ 16 विधायकों का ही होना उन्हें कहीं न घर का छोड़े और न घाट का।