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एक अपराधी के एनकाउंटर पर बवाल क्यों?

कुख्यात अपराधी विकास दुबे का पुलिस हिरासत में एनकाउंटर के दौरान मारे जाने पर जितना सियासी बवाल मचा हुआ है उससे आम लोग काफी हैरान हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विकास दुबे और उसके गुर्गों ने खुलेआम फायरिंग करके 8 पुलिस कर्मियों का नरसंहार कर दिया था तब किसी ने इतना शोर नहीं मचाया था। विकास दुबे की मौत शहीद पुलिसकर्मियों के परिजनों के लिए कुछ संतोष की बात हो सकती है लेकिन क्या एक मां-बाप अपने बेटे, एक पत्नी अपने सुहाग के उजड़ जाने का गम उम्र भर दूर कर पाएंगे। उनकी आंखों में उम्र भर आंसू रहेंगे। एक अपराधी के मारे जाने पर जैसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उससे तो साफ है कि केवल राजनीतिक रोटियां ही सेकी जा रही हैं। जहां तक एनकाउंटर का सवाल है उसे लेकर कई प्रकार के संदेह जन्म ले चुके हैं। हालांकि इस मुठभेड़ की ​भी विवेचना होगी। जांच के जो निष्कर्ष निकलेंगे वो भी सबके सामने होंगे लेकिन एक गैंगस्टर की मौत पर सियासी तूफान खड़ा करना कहां तक उचित है। ये पूरा मामला राजनीति और नौकरशाही से लेकर पुलिस के भीतर तक उसके अन्तरंग सम्बन्धों का होना था। अभी दुबे को जब मध्य प्रदेश पुलिस ने उज्जैन में गिरफ्तार किया तो उसी दिन रात्रिकाल सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसमें उसके एनकाउंटर में मारे जाने का खतरा बताया गया था, जो हर शातिर अपराधी करता है।

दरअसल पिछले 20 वर्षों में जिस तरह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अन्य दलों के बीच जात-बिरादरी वाद और सम्प्रदायवाद की सियासती बिसात के चलते सत्ता का अदल-बदल इन्हीं पार्टियों के बीच होता रहा है, उसने पुलिस को एक राजनैतिक अंग बना डाला है जो सत्ता में काबिज पार्टी के अनुरूप अपना चरित्र बदल देती है। मगर सबसे बड़ी शर्म की बात यह है कि इस राजनीति ने पुलिस का भी अपराधीकरण कर डाला है जिसका सबूत मृत विकास दुबे था। सप्ताह भर पहले ही दुबे की दबंगई इस कदर सामने आयी कि उसने आठ पुलिस वालों को ही अपने गांव में निशाना बना डाला। जाहिर है कि दुबे के हौंसले बिना राजनीतिक व पुलिस संरक्षण के इतने नहीं बढ़ सकते थे। जब सत्ता पर काबिज होने के लिए सियासतदां अपराधियों का सहारा लेकर समाज में अपना वोट बैंक तैयार करते हैं तो परिणाम यही होता है, और अपराधियों की छवि किसी ‘राबिनहुड’ की बन जाती है। दुबे की मौत ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं। दुबे ने मध्य प्रदेश के शहर उज्जैन में जाकर पुलिस के सामने वस्तुतः आत्मसमर्पण किया। इसकी वजह साफ थी कि उत्तर प्रदेश की पुलिस दुबे से जुड़े उसके अन्य सहयोगियों का जिस तरह एनकाउंटर कर रही थी उससे दुबे बचना चाहता था।

पुलिस का काम अपराधी को कानून के सामने पेश करने का होता है, सजा देना कानून का काम होता है। पुलिस एक एेसा अनुशासित संगठन होता है जो संविधान की शपथ लेकर अपने कार्य को अंजाम देता है और कानून-व्यवस्था को बनाये रखने का काम करता है, पुलिस हिरासत में यदि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट ही ऐसी घटना की जांच कानूनन कर सकते हैं। परन्तु एनकाउंटर को ‘नियम’ बना देने से पुलिस स्वयं अपनी वह विश्वसनीयता खो देती है जो उसके कानून का रखवाला होने से बावस्ता होती है, मगर सीधे पुलिस को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पिछले बीस साल से उत्तर प्रदेश में पुलिस का पूरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है जिसकी शुरूआत समाजवादी पार्टी के शासन में हुई और अपराधियों व पुलिस की साठगांठ की नींव पड़ी।

 समाजवादी पार्टी ने अपने शासन में पुलिस थानों को अपनी पार्टी के दफ्तरों में बदलने तक की कसर नहीं छोड़ी जिसका अनुसरण बाद में सत्ता पर बैठने वाली दूसरी पार्टियों ने भी बेशर्मी के साथ करना शुरू किया। लोकतन्त्र में जब पुलिस का राजनीतिकरण होता है तो अपने साथ वह इतने अपरा​िधयों को जन्म देता है कि पूरी राजनीति का ही अपराधीकरण हो जाता है। अतः यह बेवजह नहीं है कि हत्या की राजनीति शुरू हो जाती है मगर इससे पूरी राजनीति की ही हत्या हो जाती है। उत्तर प्रदेश में आज यही हो रहा है नौकरशाही इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपना हित साधती है और राजनैतिक आकाओं को खुश रखने के काम में लग जाती है जिसका समाज पर इस तरह प्रभाव पड़ता है कि वह अपराधियों का ही राजनीति में स्वागत करने लगता है। परन्तु दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश की राजनीति के अपराधीकरण की शुरुआत 1982 में इस राज्य के मुख्यमन्त्री रहे स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने की जब उन्होंने पुलिस एनकाउंटर में घोषित जातिगत अपराधियों को मारने की नीति बना जाली दुर्भाग्य से यही व्यक्ति 11 महीने के लिए देश का प्रधानमन्त्री भी 1989 में बन गया। क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने अपने मुख्यमन्त्रित्वकाल में सबसे सरल रास्ता पुलिस को ही कानपकड़ी भेड़ बना कर ढूंढ निकाला। इसके बाद से ही इस राज्य की राजनीति अपराधियों के कब्जे में जाने लगी और राजनीतिज्ञों व अपराधियों का अपवित्र गठजोड़ तैयार होने लगा जिसका लाभ दूसरी सत्तारूढ़ पार्टियों ने भी उठाना शुरू कर दिया। चुनावी मौकों पर अपराधी तत्व ही जाति, बिरादरी व सम्प्रदाय के झगड़े फैला कर इनकी मदद करते थे। विकास दुबे को अपने पापों व अपराधों की सजा तो मिलनी ही थी क्योंकि उसने हत्या से लेकर कई गंभीर अपराध किये थे मगर यह सजा उसे कानून के सामने आने के बाद मिलती और इस दौरान उन कारणों का भी पता चलता कि वह शातिर अपराधी क्यों बना? मगर उत्तर प्रदेश को तो राजनीति ने ही पिछले बीस सालों में ‘अपराध प्रदेश’ बना डाला  और वह भी इस कदर कि अपराधी सरेआम पुलिस वालों का ही कत्ल कर देने की जुर्रत करता है। यह जुर्रत उसे राजनीति ने ही दी।