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सीएए पर आपस में क्यों लड़ें

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पर भारत के आम नागरिकों का आपस में ही झगड़ना इसलिए दुखद है क्योंकि यह विषय पूरी तरह संवैधानिक समीक्षा के घेरे में है बेशक इस कानून के विरोध में पूरे देश में जगह-जगह धरने व प्रदर्शन हो रहे हैं परन्तु  कानून की ‘वैधता’ की शिनाख्त केवल भारत के सर्वोच्च न्यायालय में ही होगी और वहां उठे कानूनी दांव-पेंच ही तय करेंगे कि संसद ने इस कानून को बना कर क्या भारतीय संविधान के आधारभूत ढांचे का उल्लंघन किया है? जब तक सर्वोच्च न्यायालय इस बाबत दायर याचिकाओं की सुनवाई करके अन्तिम फैसला नहीं देता है तब तक हमें इस मुद्दे पर खेली जा रही राजनीति से दूर रहना होगा। भारत में लोकतन्त्र अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करता है और सरकार की राय से विरोध प्रकट करने का हक भी देता है मगर समर्थन और विरोध करने की सीमाएं भी तय करता है। 

ये सीमाएं हर हाल में पूरी तरह शान्त रह कर अहिंसक तरीके से अपना-अपना मत प्रकट करने की इजाजत देती हैं। अतः सीएए का समर्थन करने वालों पर भी यह जिम्मेदारी आती है कि वे बिना विरोधी पक्ष को उकसाये बिना अपने मत और विचारों का व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से इजहार करें तथा विपक्षी राय रखने वालों की भी हदबन्दी इस तरह करती हैं कि वे बिना उग्र हुए और हिंसा का रास्ता अपनाये बिना शांतिपूर्ण तरीके से धरना व प्रदर्शन करें। लोकतन्त्र प्रत्येक पक्ष को अधिकार देता है और इस तरह देता है कि दूसरे के अधिकार का हनन न हो। 

अतः देश के विभिन्न हिस्सों में जो सीएए के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं उनका सम्मान भी प्रशासन को करना होगा और जो लोग इसके समर्थन में जुलूस आदि निकाल रहे हैं उन्हें भी पर्याप्त आदर देना होगा परन्तु यह देखना भी प्रशासन का कार्य है कि परस्पर विरोधी राय रखने वाले लोग एक-दूसरे पर अपनी राय थोपने का प्रयास किसी भी तरीके से न करें। अर्थात एक-दूसरे को भड़काने या अपमानित करने का भी कोई प्रयास न करें। जो लोग कानून को अपने हितों के विरोध में मानते हैं उन्हें इस बाबत अपने विचार रखने का पूरा अधिकार देश का कानून देता है 

यही लोकतन्त्र की वह जीवात्मा होती है जो किसी भी चुनी हुई सरकार को लोगों के प्रति जवाबदेह बनाती है। सरकार केवल उन लोगों की नहीं होती जो उसकी पार्टी को वोट देते हैं बल्कि वह उन लोगों की भी होती है जो सरकार की पार्टी के मुखालिफ खड़े हुए उम्मीदवारों को वोट देते हैं। संसदीय लोकतन्त्र की यह सबसे बड़ी खूबसूरती होती है कि चुनाव में जीत कर बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी के प्रत्याशियों द्वारा मन्त्री पद की शपथ लेने के बाद ही वे देश या राज्य के हर मतदाता के मन्त्री हो जाते हैं। और उस संविधान के अनुसार शासन चलाने लगते हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक को बराबर के अधिकार होते हैं मगर दिल्ली के घौंडा-मौजपुर इलाके में जिस तरह सीएए समर्थक व विरोधियो में झड़पें हुई हैं और पत्थरबाजी तक की वारदातें अंजाम दी गई हैं, उनकी तरफदारी कोई भी राजनैतिक पार्टी किसी भी नाम पर नहीं कर सकती। 

अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोगों की हैसियत संविधान के सामने एक समान होती है। अलग धर्म होने से नागरिकता पर कोई असर नहीं पड़ता और सीएए के मुतल्लिक असली विवाद का मुद्दा भी यही है, जो सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसा भी नहीं है कि सभी राजनैतिक दलों की संसद में पारित कानूनों के बारे में राय भी एक जैसी ही हो जिस वस्तु वे सेवा कर ( जीएसटी) कानून को संविधान में संशोधन करके बनाया गया उसके बारे में  डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के समय में इस विषय पर गठित संसदीय समिति के अध्यक्ष रहे भाजपा के नेता माननीय यशवन्त सिन्हा की राय थी कि यह ‘राष्ट्र विरोधी’ काम होगा।  

अमेरिका से जब 2008 अक्टूबर में मनमोहन सिंह सरकार ने परमाणु करार किया था तो भाजपा ने लोकसभा में इसका विरोध उस समय किया था जब इस पर संसद की मुहर लगवाने के लिए इसकी दो दिवसीय विशेष बैठक जुलाई महीने में बुलाई गई थी। उस समय तो लोकसभा के पटल पर नोटों के बंडल रख कर कुछ भाजपा सांसदों ने ही मनमोहन सरकार पर उन्हें लालच देकर खरीदने तक के आरोप लगा दिये थे। इतना ही नहीं इससे पीछे जायें तो  भारत-रूस सामरिक सन्धि और भारत-पाक शिमला समझौते को देश के खिलाफ बताते हुए इनकी प्रतियां सरेआम जलाई गई थीं। हर मुद्दे पर राजनैतिक दलों की अलग-अलग अवधारणा उनके समर्थ लोगों की अवधारणा को आवाज देने के लिए ही बनती है। लोकतन्त्र का यह मिजाज राष्ट्र विरोधी नहीं बल्कि बहु विचारवादी होता है 

जिसका मुकाबला सत्ता में रहने वाला दल अपने विचार को  सर्वग्राही  बना कर करता है। लोकतन्त्र में विजय और पराजय का मानक केवल यही विचार युद्ध होता है जिसका प्रमाण हमें 2019 के चुनावों में भी देखने को मिला जब देश की जनता ने प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र जय और आत्म गौरव के विचार को भारत का विचार माना और उनके विरोध में रखे गये विचार को जनता ने सिरे से नकार दिया मगर सीएए का मामला तो पूरी तरह संविधान के सुगठित दायरे का मामला है। इसका फैसला सड़कों पर किसी हालत में नहीं हो सकता। कानून बनाना संसद का काम है, उसने संविधान के अनुसार लोकसभा व राज्यसभा दोनों में ही बहुमत साबित करके इसे बना दिया। अब इस कानून की तस्दीक करना सर्वोच्च न्यायालय का काम है।  इस पूरे मामले में झगड़ा कहां से आ गया? 

क्यों लोग आपस में मरने-मारने पर उतर आये? जाहिर है कि लोगों को आपस में लड़ाने से सियासत के फन में माहिर लोगों की बन आयेगी। इसलिए जरूरी है कि विरोध प्रदर्शनों को धरनों के अड्डों में न बदला जाये। गौर करने वाली बात यह है कि स्थायी प्रदर्शन स्थलों के आबाद होने से संविधान मे लिखे हरफों को तो नहीं बदला जा सकता और इन्हीं हरफों की बरकत से हमारे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अपना अन्तिम फैसला सुनाएंगे तो उनकी पाकीजगी को हाजिर-नाजिर मान कर क्यों न केवल विरोध की आवाज को ही सुनाया जाये। और यह काम बाखूबी हो चुका है। अलीगढ़ में जिस तरह पुलिस व प्रदर्शनकारियों में झड़प हुई उसका क्या नतीजा निकाला जा सकता है? इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि मुल्क में हर कीमत पर कौमी भाई-चारा बना रहे।