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जम्मू-कश्मीर क्यों अलग-थलग?

अगली लोकसभा के लिए चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा होते ही सभी राजनैतिक दलों ने इसमें विजय प्राप्त करने के लिए अपनी कमर कसने की शुरूआत भी कर दी है परन्तु हर चुनाव की यह शर्त होती है कि वह भारत को आगे ले जाये। मतदान की जो रूपरेखा मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुनील अरोड़ा ने 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में लोकसभा की 543 सीटों और चार राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों पर चुनावों की घोषणा करते हुए प्रस्तुत की है, उससे यह स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग पूरी निष्पक्षता के साथ इस प्रक्रिया को अंजाम देगा परन्तु जिस प्रकार सात चरणों में चुनाव प्रचार अलग-अलग दिन समाप्त हो जाने के बावजूद इलैक्ट्रानिक मीडिया का प्रयोग अगले चरण के चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया जाता है उसका कोई कारगर उपाय नहीं निकाला गया है।

वास्तव में इलैक्ट्रानिक मीडिया आचार संहिता लागू होने के बावजूद विभिन्न राजनैतिक दलों को ‘परोक्ष’ प्रचार सुलभ करा देता है। इस बारे में कोई एेसा रास्ता निकालने की सख्त जरूरत है जिससे मतदान से पहले चुनाव प्रचार बन्द होने के 48 घंटों के समय का राजनैतिक दल कान घुमा कर प्रयोग न कर सकें। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य में आयोग लोकसभा चुनाव तो करा रहा है मगर भंग विधानसभा के चुनाव कराने से उसने सुरक्षा का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिये हैं। जिस राज्य में लोकसभा चुनाव चालू परिस्थितियों में हो सकते हैं तो उनमें विधानसभा चुनाव क्यों नहीं हो सकते?

इसके साथ ही ओडिशा व आन्ध्र प्रदेश समेत चार राज्यों में विधानसभा चुनाव भी आयोग उन्हीं दिनों में करायेगा जिन दिनों विभिन्न चरणों में इस क्षेत्र के लोकसभा चुनाव होंगे तो फिर जम्मू-कश्मीर को इस फार्मूले से बाहर क्यों किया गया। सवाल यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों को अपनी मनपसन्द चुनी हुई सरकार को पाने से रोकने से आतंकवादियों और अलगाववादियों के हौंसले बुलन्द नहीं होंगे और इस राज्य की पाकिस्तान परस्त ताकतों को हम पर हंसने का अवसर नहीं मिलेगा? यह विरोधाभास नहीं ताे आैर क्या कहा जायेगा कि कुछ समय पहले इसी राज्य में पंचायत व स्थानीय निकाय चुनाव कराकर राज्यपाल ने अपनी पीठ थपथपाई थी। जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अटूट अंग होने की एक अनिवार्य शर्त यह भी है कि यहां के लोगों को भी अपनी मनपसन्द की राज्य सरकार को पाने का हक हमारे संवैधानिक छाते के नीचे उसी प्रकार दिया गया है जिस प्रकार भारत के किसी अन्य राज्य को।

यहां राजनैतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर ही हम पाकिस्तान समर्थकों की कमर तोड़ सकते हैं और एेसे तत्वों को आम कश्मीरियों की निगाह में उनका दुश्मन साबित कर सकते हैं मगर दूसरी तरफ प्रसन्नता की बात यह भी है कि श्री अरोड़ा आचार संहिता के उल्लंघन पर इस बार काफी सख्त नजर आये और उन्होंने एक बार फिर से दोहरा दिया कि सेना के शौर्य के प्रतीकों का चुनावी इस्तेमाल किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। अब यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि देश में बाकायदा बाजाब्ता तौर पर सरकार है मगर अब उसके हाथ में सरकार के वे अधिकार नहीं हैं जिनकी बदौलत वह अपने राजनैतिक दल के हितों को साधने की कोई कोशिश कर सके मगर यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हमारे लोकतन्त्र का रंग-रूप भी बदला है जिसे निश्चित रूप से राजनैतिक दलों ने ही बदला है। बहुत से एेसेे मसले न्यायालयों में पड़े हुए हैं जिनका सीधा सम्बन्ध चुनावी माहौल को अदलने-बदलने में हो सकता है।

अतः चुनाव आयोग को इस मोर्चे पर भी सावधान होकर काम करना पड़ेगा और सबसे ज्यादा ध्यान सोशल मीडिया पर होने वाले अफवाही प्रचार या दुष्प्रचार पर देना पड़ेगा परन्तु चुनावों में सबसे बड़ी जिम्मेदारी अन्ततः मतदाताओं पर ही जाती है क्योंकि वे ही इस मुल्क के भाग्य विधाता हैं। हालांकि कुल 90 करोड़ मतदाताओं में 65 प्रतिशत संख्या युवा मतदाताओं की ही होगी मगर इन्हें ही सबसे ज्यादा समझदारी से काम लेना होगा और खोखली भावनाओं को काबू मंे रखकर दिमाग से काम लेते हुए इस देश का आगे का रास्ता बनाना होगा। यह रास्ता भारत की सुख-समृद्धि के अलावा कोई दूसरा नहीं हो सकता और यह केवल राष्ट्रीय समस्याओं को केन्द्र में रखकर विचारधारा के प्रति समर्पण से ही तय हो सकता है।

चुनाव आयोग केवल मतदाताओं को अपने हक का बिना किसी खौफ या लालच के मत देने का वातावरण बना सकता है परन्तु राजनैतिक दल इस वातावरण में अपने स्वार्थ का जहर इस तरह घोल देते हैं कि मतदाता उसके प्रभाव में आकर राष्ट्रीय समस्याओं से निगाह हटा लेते हैं किन्तु दूसरी तरफ यह भी सत्य है कि ये मतदाता ही हर चुनाव मंे भूले-भटके राजनीतिज्ञों को सही राह दिखाते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह चुनावी अवसरों पर समाज में जाति या धर्म के नाम पर नफरत और घृणा फैलाने के प्रयास राजनीतिज्ञों द्वारा किये जाते रहे हैं उन पर भी इस बार चुनाव आयोग ने कड़ी निगाह रखने की घोषणा की है। यह निगाह ऐसी नजर बननी चाहिए जिससे सत्ता या विपक्ष का कोई भी नेता अपने दल की विचारधारा से न भटक सके।

इसके बावजूद चुनावी मुद्दे हर पार्टी के अपने होंगे मगर देखना केवल यह होगा कि कोई भी मुद्दा भारतीय संविधान मंे उल्लिखित भारत और इसके लोगों की व्याख्या से अलग न हो। यह भी प्रसन्नता की बात है कि चुनाव आयोग ने इस बार प्रत्येक प्रत्याशी के लिये अपना आपराधिक रिकार्ड बताना जरूरी बना दिया और स्थानीय मीडिया में इसका तीन बार प्रचार करना भी आवश्यक कर दिया है। इसे गलत पाये जाने पर उसकी उम्मीदवारी भी रद्द हो सकती है। उम्मीद करनी चाहिए कि इससे चुनाव में प्रत्याशियों का चयन करते समय राजनैतिक दलों को कुछ लाज आयेगी।