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राज्य और केन्द्र क्यों उलझें?

केरल विधानसभा में संशोधित नागरिकता कानून को रद्द करने की मांग का प्रस्ताव जिस तरह लगभग सर्वसम्मति (केवल भाजपा के एकमात्र विधायक ओ. राजगोपाल को छोड़ कर) से पारित किया है उससे कुछ संवैधानिक व नैतिक सवाल खड़े हो गये हैं। संवैधानिक प्रश्न यह है कि नागरिकता के बारे में कानून बनाने का अधिकार केवल देश की संसद को ही है और किसी भी राज्य की विधानसभा के पास यह अधिकार नहीं है कि वह कह सके कि कानून को वह अपने अधिकार क्षेत्र में लागू नहीं करेगी। 

इस संवैधानिक व्यवस्था को राज्य सरकार नहीं बदल सकती। दूसरा नैतिक सवाल यह है कि कोई भी राज्य केन्द्र द्वारा बनाये गये कानून से असहमत हो सकता है और इसे रद्द करने की मांग प्रस्ताव पारित करके कर सकता है। केरल में सत्ता पक्ष  वाम मोर्चा और समूचा विपक्ष लोकतान्त्रिक मोर्चा नागरिकता कानून पर एक मत के हैं और उन्होंने इसी के अनुसार सदन मे मतदान भी किया। हालांकि इससे पहले भी कई ऐसे अवसर आ चुके हैं जब किसी राज्य ने केन्द्र के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया। 

2013 में तमिलनाडु विधानसभा में श्रीलंका के तमिलों के मामले में सत्ता पक्ष में बैठी हुई अन्नाद्रमुक सरकार के प्रस्ताव का समर्थन विपक्ष में बैठी द्रमुक पार्टी ने किया था और मांग की थी कि भारत की सरकार को श्रीलंका में आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडलीय देशों के सम्मेलन का बहिष्कार करना चाहिए और तब तक श्रीलंका के खिलाफ आर्थिक प्रतिबन्ध लगा देने चाहिएं जब तक कि वहां तमिलों को सिंहली जनता के बराबर अधिकार नहीं दिये जाते हैं। यह पूरी तरह अनाधिकार चेष्टा थी क्योंकि विदेश विभाग पूर्णतः केन्द्र सरकार का विषय होता है। उस समय दिल्ली में डा. मनमोहन सिंह की सरकार थी। 

भारत की संघीय व्यवस्था में केन्द्र व राज्यों के अधिकारों का स्पष्ट बंटवारा है और कुछ अधिकार समवर्ती सूची में आते हैं। अतः नागरिकता के मुद्दे पर राज्य सरकारों का अधिकार नहीं है इसके बावजूद केरल की मार्क्सवादी पार्टी की पी. विजयन की सरकार ने प्रस्ताव पारित करके अपने राज्य की जनता का मत इस प्रस्ताव के माध्यम से व्यक्त किया है। इससे पूर्व छह सितम्बर को प. बंगाल की विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित करके मुख्यमन्त्री ममता दी ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने का काम नहीं करेगी। 

नागरिकता कानून के खिलाफ ममता दी पूरे जोर-शोर से इस कदर लगी हुई हैं कि पिछले दो सप्ताह में उन्होंने पूरे राज्य के विभिन्न इलाकों में नौ रैलियां सम्बोधित की हैं। जहां तक एनआरसी का सवाल है देश के कम से कम सात राज्यों ने इसे लागू न करने का तब ऐलान किया है जबकि केन्द्र ने इसे लागू  करने के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं किया है बेशक राष्ट्रीय पंजीकरण रजिस्टर (एनपीआर) तैयार करने का ऐलान हो चुका है। मगर केरल और प. बंगाल ने इससे भी अपना हाथ खींचने की सरेआम घोषणा कर डाली है। जाहिर है यह कार्य राज्य सरकारों की सक्रिय भागीदारी के बिना नहीं हो सकता क्योंकि उन्हीं के कर्मचारी या अर्धसरकारी कर्मचारी जनगणना करने व इसका रजिस्स्टर तैयार करने के काम पर लगाये जाते हैं। 

भारतीय गणतन्त्र के लिए यह स्थिति किसी भी मायने में ठीक नहीं मानी जा सकती। इसी महीने में गणतन्त्र दिवस ( 26 जनवरी) आने वाला है, इस दिवस का महात्म्य भारत में जनता की ऐसी सरकार काबिज होने से है जो केवल संविधान से शक्ति लेकर ही राज-काज चलाती है।  इसी संविधान के निर्देशानुसार संसद कोई भी नया कानून बनाती है  और जो कानून संविधान की रूह से नहीं बनता है उसे सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक करार दे सकता है। बेशक भारत में स्वतन्त्रता के बाद से इस मुद्दे पर बहस होती रही है कि किसी सरकार का बनाया कौन सा कानून जन-मंगलकारी और कौन सा जन-विरोधी है, परन्तु इसमें संविधान की भूमिका ही केन्द्र में रही है क्योंकि यह किसी भी कानून के मंगलकारी या अमंगलकारी होने की शर्तें तय करता है। 

राजनीतिक दलों की भूमिका तब समाप्त हो जाती है जब किसी भी कानून की परख संविधान की कसौटी पर होती है। बेशक इस संविधान में पिछले 70 सालों में अब तक सौ से अधिक संशोधन हो चुके हैं परन्तु वे सभी संविधान के आधारभूत सिद्धान्तों की शर्तों को पूरा करते हैं। जहां तक ‘एनपीआर’ या ‘एनआरसी’ का सम्बन्ध है, इनके लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं है क्योंकि नागरिकता कानून-1955 में ही इसकी व्यवस्था है। सरकार यह कार्य अधिशासी आदेश से कर सकती है जैसा कि उसने  एनपीआर के मामले में किया है मगर नागरिकता कानून ने पूरी प्रक्रिया का स्वरूप बदल डाला है जिसे लेकर विपक्षी दलों में भारी नाराजगी और गुस्सा है। 

विशेषकर मुस्लिम नागरिकों में भारी विरोध पनपा है। इसकी वजह नये नागरिक कानून में उन्हें अलग से चिन्हित करना माना जा रहा है। आलम यह है कि दिल्ली के ही शाहीन बाग इलाके में पिछले 15 दिनों से मुस्लिम महिलाएं लगातार रात-दिन इसका विरोध कर रही हैं और इसे वापस लेने की मांग कर रही हैं। जाहिर है कि मुस्लिम महिला समाज में यह कानून जागरूकता ला रहा है। तीन तलाक से अभिशप्त रहा यह वर्ग नागरिकता कानून की पड़ताल करने की स्थिति में यदि आ गया है तो निश्चित मानिये कि एक दिन यह स्वयं ही अपने में फैली पुरुष प्रधान  कुरीतियों को भी जड़ से उखाड़ कर फैंक सकता है। 

अतः लोकतन्त्र को सिर्फ एक ही आयने से नहीं देखा जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह भी निकलता है कि किसी भी देश में विशेष धर्मानुरागी सरकार (मुस्लिम देशों में इस्लामी सरकार) होने मात्र से अन्याय समाप्त नहीं होता मुस्लिम महिलाओं का आन्दोलन यही तथ्य रेखांकित करता है। भारत में ऐसे विचारों का भी सम्मान होता रहा है सन्त तुकाराम इसके सबसे बड़े प्रमाण थे जिनके लिए मन्दिर का दरवाजा ही उनके ईश्वर दर्शन के लिए घूम गया था। 

गुरु नानक देव जी ने भी यह करिश्मा किया था, किन्तु भारत का संविधान ही स्वयं में इतना सक्षमकारी और सामर्थ्यवान है कि वह जन-हित और जन विरोध के साथ वैयक्तिक गरिमा और सम्मान का संरक्षण सांस्थनिक दर्जे से लेकर व्यक्तिगत हैसियत तक करता है। यह कानून क्या बेकार में ही बना है कि संसद परिसर में केवल लोकसभा अध्यक्ष का आदेश चलेगा और सभी सरकारी संस्थान उसके मातहत काम करेंगे। अतः किसी राज्य को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की क्यों जरूरत हो जबकि उसका ऐसा कार्य संविधान के खिलाफ ही माना जायेगा।