शराब के विरोध में खड़ी हर महिला के साथ हूं…

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छोटे होते से गाने सुनते आ रही हूं कि शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए… वाकई ही अश्विनी जी ने सांसद होने के नाते जो गांव गोद लिया उसमें अधिकतर लोग शराब में डूबे हैं और महिलाएं काम करती हैं और मैंने ईनाम रखा था कि जो शराब छोड़ देगा उसे 10 हजार रुपए मैं अपनी तरफ से दूंगी। मानो आज ढाई साल हो गए, एक भी व्यक्ति ईनाम नहीं ले सका, चाहे हमारा गांव देश के पहले पांच बैस्ट गांवों में से है। मेरी सासू मां अक्सर कहती हैं कि किसी का घर खराब करना हो तो उन्हें शराब की बोतल गिफ्ट में भेज दो यानी बुरी लत (आदत) लगा दो।

अंग्रेज हमारे देश को कई बुरी आदतें दे गए। एक चाय और एक शराब। वह तो चाय एक कप फ्रैश होने के लिए और ड्रिंक भी एक या दो पैग शानो-शौकत और रिलैक्स करने के लिए पीते हैं परन्तु हमारे देश में चाय गड़वी (लोटा) भरकर (जिनमें से मैं भी हूं, चाय बहुत पीती हूं) और ड्रिंक तो हमारे भारतीयों में (जिनके घर में चलती है) पटियाला पैग वगैरहा शुरू हो गए।

सबसे बुरी बात है जो सस्ती देसी शराब बनती है घरों में गांवों में जो असर भी बहुत करती है और कइयों की जान भी ले लेती है। गरीब घरों में जो पैसा घर में बच्चों के खाने के लिए होना चाहिए वही आदमी शराब पर खर्च कर देता है। मेरे पास बहुत से केस आते हैं, जिसमें पति-पत्नी, मां-बेटे, पिता-पुत्र की लड़ाई शराब के कारण होती है।

हम अक्सर कहते हैं महिला देवी है पर समय आने पर दुर्गा का रूप धारण कर सकती है। आज चारों तरफ से महिलाएं शराब ठेकों के विरोध में प्रदर्शन कर रही हैं। मैं हर उस महिला के साथ हूं जो इसके विरोध में खड़ी है। यही नहीं अगर मुझे मालूम पड़ जाए कि यह किसने सबसे पहले बनाई और पिलाई थी उसे कब्र से, नरक से, शमशान घाट से ढूंढकर सरे बाजार में दुबारा से जान से ही मार दूं। मेरी एक मित्र ने जब मेरे यह विचार सुने तो उसने कहा- अरे यह तो रिलैक्सेशन और सुख-दु:ख को मनाने के लिए बनी है। कसूर तो उनका है जो हद पार कर जाते हैं और अगर इसे पूरी तरह से बंद किया गया तो लोग दूसरे रास्ते अपनाएंगे जैसे ड्रग्स वगैरहा जो अभी तक पंजाब और कई राज्यों में भी प्रवेश कर रही है।

इस बात में भी वजन लगा कि कोई भी चीज तब तक नहीं रुक सकती जब तक आप दिल से नहीं इसे मानकर रोकते, परन्तु यह भी ठीक है ‘भय बिन न होय प्रीति’ अर्थात डर भी जरूरी है इसलिए जगह-जगह पर ठेके और अवैध शराब बंद होनी ही चाहिए। अगर बिके भी तो जानलेवा वाली न बिके और आधार कार्ड या लाइसैंस पर मिले। एक महीने में एक बोतल से ज्यादा न हो ताकि थोड़ी-थोड़ी पियें और जगह-जगह नुक्कड़ नाटक और फिल्म इसके नुक्सान के बारे में दिखाई जानी चाहिएं और गरीब लोगों के लिए एंटरटेनमैंट सैंटर खुलने चाहिएं जहां जाकर वह खुशियां पाएं और अपने गमों को भूलें, क्योंकि गरीब जब दु:खी होता है तब पीता है या बुरी आदत में पीता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी नेशनल हाईवे के आसपास शराब के ठेके हटाने के आदेश दिए हैं और उस पर काम शुरू हो चुका है। ड्राइवर लोगों में शराब पीकर अपने सफर को आसान बनाने के चक्कर में हजारों दुर्घटनाएं हुई हैं। इसका सुप्रीम कोर्ट ने गम्भीर नोटिस लिया है।

कई बार शराब के बढ़ते सेवन को बड़े लोगों के यहां पार्टी में स्टेट्स सिम्बल की तरह प्रस्तुत किया जाता है तो इससे हमारा यूथ विशेष कर लड़कियां भी प्रभावित हो रही हैं।

हमारा मानना है कि शराब कोई स्टेट्स सिम्बल नहीं है, यह कोई कल्चर भी नहीं है। जब यह हमारे स्वास्थ्य को बिगाड़ रही है तो इसका खात्मा भी होना चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शराब को मानव जीवन और उसके मानसिक और चारित्रिक विकास का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था। लेकिन दुख इस बात का है कि इसी गांधी के देश में शुगल के नाम पर कभी गम या कभी खुशी के नाम पर बोतलें खोल दी जाती हैं। शराब का सेवन हर दृष्टि में बंद होना चाहिए।

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