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ईद पर मजदूरों का हिस्सा?

आज मीठी ईद है मगर कोरोना वायरस की वजह से यह फीकी ही रहेगी क्योंकि ईदगाहें खाली रहेंगी मगर दिलों के जज्बे से ईद को मीठी बनाये जाने में भारतीय पीछे रहने वाले नहीं हैं क्योंकि यह त्यौहार गले मिलने से ज्यादा दिलों के मिलने का होता है। भारत ऐसा बेमिसाल देश है जिसमें गरीब हिन्दू सैकड़ों वर्षों से ईद के दिन अपनी दीवाली मनाते आ रहे हैं। भारतीय समाज का यह अनूठापन किसी और देश में देखने को नहीं मिल सकता। इसकी वजह यह है कि गरीब हिन्दू दस्तकारों से लेकर छोटे दुकानदारों और रोजमर्रा का तफरीह व मनोरंजन का सामान बेचने वाले कारीगरों की इस दिन बिक्री कई गुना अधिक होती है। जिससे उनकी आमदनी में भी कई गुना मुनाफा होता है क्योंकि इस दिन देश के 90 प्रति​शत से अधिक मुस्लिम नागरिक स्वयं उपभोक्ता बन कर खरीदारी करते हैं। हर शहर की प्रसिद्ध ईदगाहों के बाहर छोटे-मोटे बाजार लग जाते हैं जिनमें 90 प्रतिशत दुकानदार हिन्दू कारीगर होते हैं। अतः गरीब तबके के हिन्दू दस्तकारों व खोमचा लगाने वालों को साल भर इस त्यौहार का इन्तजार रहता है। इसी प्रकार हिन्दुओं के त्यौहार दीपावली का इन्तजार मुसलमान समाज के गरीब दस्तकार और फनकार बेसब्री से करते हैं।

 बेशक महानगरों का माहौल थोड़ा बदला हुआ मिल सकता है मगर हिन्दोस्तान के कस्बों और गांवों में वातावरण हिन्दू-मुस्लिम मेलजोल से ईद और दीवाली मनाने का ही रहता है लेकिन कोरोना की वजह से इस बार की ईद गले मिल कर नहीं मनाई जायेगी और ईदगाहों  की रौनकों की  रंगत से यह महरूम रहेगी। इसीलिए जरूरी है कि ईद गले की बजाय दिल मिला कर मनाई जाये और कसम उठायी जाये कि पूरे मुल्क में हिन्दू-मुिस्लम एकता और भाईचारे पर कोई आंच नहीं आयेगी। 

दरअसल में ईद का त्यौहार पूरे एक महीने तक चलने वाले रमजान महीने के अन्त में मनाया जाता है और इस महीने में गरीबों व जरूरतमन्दों को जकात दी जाती है। इस्लाम में इस परिपाटी को जिस तरह कानूनी जामा पहनाया गया है और जकात के नियम व सिद्धान्त तय किये गये हैं उससे इस धर्म के प्रखर समाजवादी होने का सबूत मिलता है और  प्रेरणा देता है कि समाज में गैर बराबरी समाप्त करना एक धार्मिक कृत्य है। यह विचार नर-नारायण की सेवा  के हिन्दू संस्कृति के विचार जैसा ही है, परन्तु लाॅकडाऊन के चलते भारत में जिस तरह करोड़ों मजदूरों को कष्ट उठाने पड़ रहे हैं उससे नर के नारायण स्वरूप को हैरानी हो सकती है।

 महात्मा गांधी ने जब दरिद्र नारायण की सेवा का भाव जागृत करने का अभियान चलाया था तो उनका मन्तव्य यही था कि मजदूरों और दबे-पिछड़ों को स्वतन्त्र भारत में वही सम्मान और सुरक्षा प्राप्त होगी जो किसी सम्पन्न और साधन सम्पन्न व्यक्ति को। आजाद हिन्दोस्तान में इसकी सरकार इन्हीं गरीबों और सदियों से दुत्कारे गये लोगों के एक वोट की ताकत से हुकूमत पर काबिज होगी और फिर जनता की सरकार कहलायेगी। इस सरकार का ध्येय लोकल्याण होगा अर्थात् गरीबों की सत्ता में बराबर की भागीदारी।

 सवाल यह है कि पिछले 72 सालों में क्या हम यह कार्य कर पाये हैं? हमारी चुनाव प्रणाली ही ऐसी बन चुकी है कि गरीबों का प्रतिनिधित्व भी कोई धनाढ्य व्यक्ति ही करेगा अथवा उसके समर्थन से ही चुनाव में खड़ा होने की हिम्मत कर सकेगा क्योंकि चुनाव में लाखों-करोड़ों रुपया खर्च होता है। अतः जो भी सरकार होगी वह परोक्ष रूप से धनाढ्य वर्ग की ही होगी। इस व्यवस्था को तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक कि चुनाव प्रणाली को न बदला जाये। वर्तमान चुनाव प्रणाली ने गरीब मतदाताओं को भिखारी बनाने में किसी तरह की कसर नहीं छोड़ी है। चुनावी मौकों पर जाति-बिरादरी से लेकर विभिन्न वस्तुएं बांटने का जो नया तरीका इजाद हुआ है उसने लोकतन्त्र को लोभतन्त्र में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

 मीठी ईद से पहले महीने भर रोजे या उपवास रख कर प्रत्येक मुस्लिम नागरिक अपनी ‘रूह’ की शुद्धि करता है और गरीबी के उस दर्द को महसूस करता है जो भूखा रहने से होता है, उसके बाद अपनी सम्पत्ति का एक सुनिश्चित भाग ‘जकात’ में देता है और तब समझता है कि उसे ‘सबाब’ मिलेगा, परन्तु हमने तो लाॅकडाऊन में भी यह सबाब कमाने की कोशिश नहीं की और कमजोर व गरीब मजदूरों को खुले आसमान के नीचे पैदल चलने को ही मजबूर कर दिया और उन्हें सुविधाएं देने की सुध आयी भी तो तब जब सुनसान सड़कों पर ही उनकी वाहन दुर्घटनाओं में मृत्यु होने लगी! हम अभी भी लड़ रहे हैं कि मजदूरों का वाजिब हिस्सा क्या होना चाहिए! या मेरे मौला रहम।