उत्तर प्रदेश की जनता ने पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में जिस भारी बहुमत से भाजपा के हाथ में सत्ता सौंपी थी उसका अर्थ निश्चित रूप से यह नहीं था कि नई सरकार राज्य में उन अपराधियों और कातिलों को कानून की जद से बाहर निकालने के लिए हुक्म पर हुक्म जारी करेगी जिन्होंने 2013 में इस राज्य को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलसा कर निरपराध लोगों की जान लेने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई थी।

उत्तर प्रदेश किसी भी सूरत में अपराधियों का ‘सजा माफ’ सूबा नहीं बन सकता। जिस राज्य की सरकार के माथे पर दर्जनों अबोध शिशुओं की गोरखपुर के अस्पताल में आक्सीजन की कमी होने से मृत्यु होने का कलंक लगा हो वहां की सरकार अगर अपराधियों की सजा माफी के लिए कानून की प्रक्रिया को रोक कर सत्ता के गुरूर में खुद को कानून समझने की गफलत में है तो उसे इस अनूठे राज्य के इतिहास और इसके लोगों के बारे में कुछ नहीं पता है।

यह सूबा उन स्व. चौधरी चरण सिंह की विरासत का पहरेदार है जिन्होंने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में हिन्दू- मुस्लिम एकता का ऐसा समीकरण गढ़ा था जिसके आगे सारे राजनीतिक समीकरण असफल हो गये थे। यह राज्य पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक की उस महान विरासत का अलम्बरदार भी है जिसमें इस राज्य के हर कस्बे और गांव में हिन्दू और मुसलमान एक ही छत के नीचे बैठकर मुल्क की राह में अपनी हस्ती को दांव पर लगाने की कसमें खाया करते थे मगर राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार जिस एजेंडे पर उत्तर प्रदेश का शासन चलाना चाहती है उससे यह सन्देश जा रहा है कि दंगों को भड़का कर राजनीतिक रोटियां सेंकना कोई अपराध नहीं है। क्या यह काफी नहीं था कि योगी सरकार ने इससे पहले 131 एेसे मुकदमे वापस लिये जो साम्प्रदायिक दंगों के सम्बन्ध में ही थे।

इनमें से 13 मुकदमें तो हत्या के अपराध के थे और इनमें वे मुकदमें भी थे जो स्वयं श्री योगी पर ही चल रहे थे। अपराधियों के राजनीतिक शरणस्थल का इससे बड़ा उदाहरण स्वतन्त्र भारत में कोई दूसरा नहीं हो सकता। क्या इस राज्य का भाग्य अब यह हो गया है कि इसका शासन अपराधी चलायेंगे?

अपराधियों का क्या कोई धर्म भी हो सकता है ? 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में एक मुस्लिम युवक की हत्या के बाद प्रतिशोध में दो हिन्दू युवकों की हत्या होने पर जिस तरह इस इलाके में साम्प्रदायिक दंगों का नंगा नाच हुआ था उससे पूरी मानवता ही शर्मसार नहीं हो गई थी बल्कि तत्कालीन समाजवादी पार्टी की राज्य सरकार की कलई भी खुल गई थी कि वह किस प्रकार राज्य की जनता को हिन्दू-​मुस्लिम में बांटकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की अभ्यस्त हो गई थी।

‘मुस्लिम साम्प्रदायिकता’ को हवा देकर ‘हिन्दू साम्प्रदायिकता’ के शोले भड़काना अगर मुलायम सिंह का ‘समाजवाद’ था और आजम खां जैसे इसके सिपहसालार थे तो निश्चित रूप से यह राजनीति का वह दुष्चक्र था जिसकी गिरफ्त में यह राज्य स्वयं को फंसा हुआ महसूस कर रहा है। क्योंकि भारत के लोकतन्त्र में राजनीति का आधार यदि हिन्दू और मुसलमान होता है तो इसमें और पाकिस्तान की राजनीति में कोई अन्तर नहीं हो सकता है।

हम इसीलिए ‘हिन्दोस्तान’ कहलाते हैं क्योकि यहां आदमी की पहचान मजहब नहीं करता बल्कि संविधान करता है। हमारा संविधान अपराधी के हिन्दू या मुसलमान होने में कोई फर्क नहीं करता मगर राज्य के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने जो नया ‘राजयोग’ शुरू किया है उसमें वह साम्प्रदायिक दंगों में अपराधी बने अपनी पार्टी के सभी धुरंधरों को कानून से छूट दिलाने की मु​िहम चलाये हुए हैं।

अब वह नफरत फैलाने वालों पर अदालतों में चल रहे मुकदमें वापस लेना चाहते हैं। इनमें दो समुदायों के बीच वैमनस्य व नफरत और घृणा फैलाने वाले वक्तव्य देने में माहिर साध्वी प्राची से लेकर बिजनौर के सांसद भरतेन्द्र सिंह के अलावा सांसद संजीव बालियान व तीन भाजपा विधायक शामिल हैं, विधायक संगीत सोम, उमेश मलिक और सुरेश राणा को यदि योगी सरकार विधानसभा में अपने मध्य पाकर गौरव का अनुभव करती है और सोचती है कि उन पर चल रहे मुकदमें कानून का बेजा इस्तेमाल है।

जिस मुख्यमन्त्री की सरकार अपने ही एक ‘बलात्कारी’ विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को राज्य के उच्च न्ययालय में संरक्षण देकर यह बयान दे कि उसके खिलाफ सबूत नहीं हैं, उससे और अपेक्षा भी क्या की जा सकती है ? बिहार में लालू जी ने मुख्यमन्त्री रहते कभी अपनी पार्टी के किसी अपराधी का मुकदमा वापस लेने की तो जुर्रत नहीं की थी। जंगल राज वह कहा जाता है जहां कानून की रूह से अपराधी बनने वालों को ‘सदाचारी’ खुद शासन बताता है।

हजारों लोगों को बेघरबार करने वाले और सैकड़ों लोगों की हत्या का कारण बनने वाले लोगों पर लागू कानून को ही अगर हटा लिया जायेगा तो एेसे राज को क्या हम ‘कानून का राज’ कहेंगे? अपराधियों के राज से छुटकारा पाने के लिए ही तो उत्तर प्रदेश की जनता ने विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत देकर स्थायी सरकार का गठन किया था मगर संविधान की कसम खाकर कुर्सी संभालने वाले लोग यदि यह कसम खाकर शासन चलाने लगें कि उनका ईमान नफरत फैलाने वालों को पनाह देने का है तो उत्तर प्रदेश में कानून का शासन क्यों होगा और किस वजह से होगा?

जब पुलिस के अफसरों को और जिलाधीशों को स्वयं सरकार यह आदेश दे कि अदालतों में मुल्जिम बनाये गये लोगों से फौजदारी की दफाएं हटाओ तो फिर पुलिस और प्रशासन क्या कानून के अनुसार चल सकेगा ? क्या ये मुकदमे किसी राजनीतिक आन्दोलन के चलते शुरू किये गये थे? मुकदमें दंगे भड़काने के जुर्म में दायर किये गये थे। दंगा क्या कोई राजनीतिक आन्दोलन होता है?