मैं जब भी डाक्टरों को देखती हूं, मिलती हूं, एक ही लाइन दिमाग में घूमती है -‘तुझमें रब दिखता है यारां मैं क्या करूं’ क्योंकि जिन्दगी में ऐसे बहुत से मोड़ आए जब ऐसे रब (ईश्वर) के सिवाय कुछ और नजर नहीं आता था। चाहे जब मेरी मां कैंसर से जूझ रही थी या अपनी डिलीवरी के समय या पिता की मृत्यु, सासू मां की ​बीमारी के समय, चाची सास की बीमारी, अपने वरिष्ठ नागरिकों के लिए, इन्हीं रबाें का आगे आकर निःस्वार्थ सहायता करना चाहे वो डा. त्रेहन, डा. के.के. अग्रवाल, डा. रणधीर सूद, डा. यश गुलाटी, डा. उमेर, डा. कोहली, डा. हर्ष महाजन, डा. राणा, डा. यादव, डा. माला, डा. विनय और 24 घंटे सेवा में तत्पर डा. भागड़ा दम्पति और डा. झिंगन या हमारे बुजुर्गों को मीठी गोलियां देने वाला डा. कपिल या मेरे बड़े भाई, मेरे गुरु, मेरे मित्र, मेरे पिता समान प्रसिद्ध होम्योपैथिक डा. चन्द्र त्रिखा जो लेखक और कवि भी हैं आैर मेरे मार्गदर्शक भी हैं।

मेरा मायका डाक्टरों से भरा हुआ है। उसमें सभी मिक्स हैं ऐलोपैथिक, होम्योपैथिक यहां तक कि आयुर्वेदिक । मेरे दादा जी पण्डित मूल चन्द जी प्रसिद्ध वैद्य थे। मेरे पिता जी का सपना था मुझे भी डाक्टर बनाने का। मैंने प्री-मैडिकल ज्वाइन करके छोड़ दिया क्योंकि मुझे कैमिस्ट्री याद नहीं होती थी, रट्टा नहीं लगता था। मेरे पिता जी का बहुत दिल टूटा था। फिर भी उनका सपना पूरा करने के लिए मैं डाक्टर तो बन गई यानी एमबीबीएस वाली नहीं मुन्नाभाई ताकि लोगों का दर्द दूर कर सकूं, प्यार से उनके दुःखों को कम करूं। वाकई में डाक्टरी पेशा एक नोबल पेशा है। प्रोफैशन कोई भी हो सब अपनी जगह बहुत महत्वपूर्ण आैर नोबल होते हैं परन्तु डाक्टर तो मरीजों के लिए भगवान से कम नहीं होते आैर हम सबको जन्म से लेकर मरण तक डाक्टरों की जरूरत पड़ती है। डाक्टर चाहे ऐलोपैथी या होम्योपैथी या आयुवेर्दिक का हो मगर वो अपने प्रोफैशन में कामयाब है तो क्या बात है और अपने पेशे के साथ वो मरीजों से प्यार आैर पेशंस से काम करे क्योंकि दवाई की जगह उनका प्यार, सहानुभूति भी बहुत काम करती है।

तीनों आयुवेर्दिक, होम्योपैथिक, ऐलोपेथिक डाक्टर मेरी नजर में बहुत अच्छे हैं। मुझे तीनों का बहुत अच्छा तजुर्बा है। एक बार मुझे बहुत एलर्जी हो गई थी तो 2 साल तक इलाज करके कोई आराम नहीं आ रहा था तो मेरे ताया जी डा. गुरदयाल त्रिखा ने अबोहर से मुझे आयुर्वेदिक दवाई लाकर दी सर्पगन्धा टिकड़ी प्रवाल पिष्टी और उसके बाद मैंने कभी मुड़कर नहीं देखा। यही नहीं मैं बड़े बेटे आदित्य के बाद कनसीव नहीं कर रही थी तो उन्होंने मुझे कई मुरब्बे और सोने-चांदी के वर्क और छोटी इलायची का मिश्रण दिया और मेरे जुड़वां बेटे हुए और डा. पण्डित गणपत राय ​ त्रिखा और उनके बेटे डा. चन्द्र त्रिखा, डा. ओम ​त्रिखा ने मीठी पुड़िया खिलाकर कई बीमारियों को दूर किया और वह होम्योपेथी डा. में हमारे खानदान की 7वीं पीढ़ी है। हमारे खानदान में महाराजा रणजीत सिंह के समय वैद्य थे। डा. गुलाटी ने मेरे पैर की दर्द को कैसे फुर्र किया, डा. सोनी पा​नीपत ने कैसे मेरी आंखों काे चुनावों के समय ठीक किया। जब दर्द से खुल नहीं रही थी डा. महेन्द्र हरजाई और उनकी पत्नी डा. आरती हरजाई, जो प्यार के मसीहा हैं।

क्योंकि मेरा नाता तीनों तरह के डाक्टरों से है तो मुझे डाक्टरों के हर तरह के संगठनों में बुलाया जाता है और मैं तीनों के यहां जाती हूं क्योंकि मैं इनमें रब देखती हूं। पिछले दिनों मुझे आईएमए के डाक्टरों ने पानीपत बुलाया जहां नेशनल (प्रेसीडेंट) अध्यक्ष डा. रवि भी आए। मंच पर मैंने डा. अग्रवाल का गुस्सा भी देखा। बाद में मैंने मंच पर बैठे सभी डाक्टरों से उनके तेवरों का राज जाना तो मालूम पड़ा एनएमसी पर सभी डाक्टर गर्म हैं और उनके मुताबिक यह बिल नहीं आना चाहिए क्योंकि इस बिल के पास होते ही एमसीआई अर्थात मैडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया खत्म हो जाएगी। उसकी जगह एनएमसी अर्थात नेशनल मैडिकल कमीशन ले लेगी, जो कि मैडिकल शिक्षा से जुड़ी नीतियां बनाएगी। उनके अनुसार आईएमए के 4 लाख से ज्यादा लोग हैं जिनसे चर्चा भी नहीं की गई।

दूसरा इसी नए बिल का क्लाज 49 कहता है कि एक ऐसा ​ब्रिज कोर्स लाया जाए जिसमें आयुर्वेद, होम्योपैथी के डाक्टर भी ऐलोपैथी का इलाज कर सकें। मुझे वहां सभी सम्मानित डाक्टर, जो सारे हरियाणा से थे, उत्तर प्रदेश से, ऑल इं​डिया से थे आैर पानीपत के सभी डाक्टर थे उन सबकी पीड़ा महसूस की। अगर देखा जाये तो मैडिकल सेवा और स्टडी सबसे अलग आैर मानवता को समर्पित है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार अपना दायित्व निभाए आैर अगर कोई खाई पैदा हो रही हो तो उसे खत्म करे या बिल को मोडिफाई करे, चेंज करे, बेहतर करे जिससे सब खुश होकर काम कर सकें। बहरहाल सबकी स्टडी चाहे वो होम्योपैथी, आयुर्वेदिक या ऐलोपैथी से जुड़ी हो, सबका सम्मान बरकरार रहना चाहिए। इसी में सरकार आैर मैडिकल शिक्षा के साथ-साथ मैडिकल सेवा एवं मानवता का सम्मान है।

मेरा मानना है कि ऐलोपैथी, आयुर्वेद आैर होम्योपैथी का सबका अपना-अपना वजूद रहना चाहिए। सबमें समानता-असमानता वाली बात नहीं होनी चाहिए। लिहाजा सरकार को बीच का रास्ता बनाकर इस मामले को सुलझाना चाहिए जैसे सरकार आयुष भारत स्कीम लाई है कि हर परिवार को 5 लाख कुछ बीमारियों के लिए मिले अगर यह सफल हो जाती है तो दुनिया की सबसे बड़ी हैल्थ योजना होगी आैर लोगों को लाभ होगा और मेरे हिसाब से 2022 तक जीडीपी का भी 3 प्रतिशत तक तो बढ़ेगा (जो डाक्टरों के हिसाब से बिल्कुल नहीं डिक्रीज हो रहा है)।

सो इस समय मेरी स्वास्थ्य मंत्रालय से हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि डाक्टरों की सुनो, बीच का रास्ता ​बड़े-बड़े डाक्टरों को बिठाकर तय किया जाए। इनकी 25 मार्च को महापंचायत है तो उसी महापंचायत के बाद इनको बुलाकर निर्णय करना चाहिए आैर डाक्टरों से प्रार्थना है कि महापंचायत तक तो ठीक है, मीटिंग्स करो पर कभी भी हड़ताल की न सोचना। आप पर कई लोगों की जिन्दगियां निर्भर कर रही होती हैं। बड़ी इमरजेंसी होती है (मुझे मालूम है अन्दर-अन्दर से आप लोगों की मदद तब भी करते हो) सो हमेशा ध्यान रखना ‘तुझमें रब बसता है यारां मैं क्या करूं।’