भारत-इस्राइल संबंधों पर साफगोई

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इस्राइल दुनिया के सबसे छोटे और नए राष्ट्रों में से एक है, जो चारों तरफ से दुश्मन देशों से घिरा हुआ है। दुश्मन देश भी ऐसे जो इस्राइल को किसी न किसी तरीके से खत्म कर देना चाहते हैं लेकिन फिर भी इस्राइल से पड़ोसी और उसके शत्रु देश भी घबराते हैं। इस्राइल सदा अपने दुश्मनों के घर में घुस कर उन्हें मार डालता है या फिर मारने की ताक में रहता है। ऐसा सम्भव हुआ इस्राइल के स्वाभिमानी एवं देशभक्त लोगों की वजह से। इस्राइल पर एक बार 7 देशों ने हमला कर दिया था तथा इस युद्ध में उसने अकेले ही उन सातों मुस्लिम देशों को एक साथ हराया था और जिस क्षेत्र को वह लोग विवादित बता रहे थे, वह भी इस्राइल ने हथिया लिया था। उसके बारे में विचित्र तथ्य है कि उसने आज तक अपने किसी भी दुश्मन को जीवित नहीं छोड़ा। उस पर हमला करने वाले सभी दुश्मनों की मृत्यु निश्चित है। उसकी एक साधारण सी नीति है कि अगर किसी भी राष्ट्र या किसी संगठन ने हमारे देश के एक नागरिक को मारा तो हम उसे दुनिया के किसी भी हिस्से में ढूंढ कर मारेंगे और हमारे एक नागरिक के बदले 50 नागरिक मारे जाएंगे। 1972 में जर्मनी के म्यूनिख ओलिम्पिक खेलों में फिलीस्तीन के मुस्लिम आतंकवादियों ने 12 इस्राइली खिलाडिय़ों को मार डाला था, तब तत्कालीन इस्राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने इस घटना की न तो निंदा की और न ही कोई शांति का वक्तव्य दिया, बल्कि उन्होंने सारे मृत खिलाडिय़ों के परिजनों को फोन करके कहा कि हम इसका बदला लेंगे तथा इसके बाद उन्होंने अपनी खुफिया एजैंसी मोसाद को केवल इतना ही कहा कि दुनिया के किसी देश, किसी हिस्से में कोई भी आतंकवादी हो जो इस घटना में शामिल है, उसे किसी भी तरह मार डालो। हुआ भी ऐेसा ही। उसकी आक्रामकता का अंदाजा उस वक्त पूरी दुनिया को हो गया था जब उसने जून में इराक का सोले परमाणु संयंत्र तबाह कर दिया था।
इस्राइल की जनसंख्या 90 लाख के बराबर है यानी हमारी राजधानी की जनसंख्या से कहीं कम। चार इस्राइल मिल जाएं तो भी उत्तर प्रदेश की जनसंख्या का मुकाबला नहीं कर सकते। इस्राइल एकमात्र यहूदी देश है और एकमात्र ऐसा देश है जहां के प्रत्येक नागरिक को सैन्य ट्रेनिंग अनिवार्य है या इसके प्रत्येक नागरिक को कुछ समय के लिए सेना में काम करना अनिवार्य है, चाहे वह देश का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। इसी तरह महिलाओं को भी सैन्य ट्रेनिंग लेना अनिवार्य है। वास्तविक रूप से महिला शक्ति की अहमियत इस्राइल में मानी जाती है।
मैं लगातार कई वर्षों से लिख रहा हूं कि भारत को इस्राइल से सीखने की जरूरत है, भारत को उसके स्वाभिमान से सीखने की जरूरत है। उसके जैसा साहस हमें खुद पैदा करना होगा क्योंकि साहस हमें भीख में नहीं मिलेगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंडी (हिमाचल) की जनसभा में पहली बार यह स्वीकार किया कि जो काम इस्राइल करता था, वह अब भारत कर रहा है और पाक की सीमा में घुसकर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय सेना के पराक्रम की दुनिया भर में चर्चा है। पाक हमें आजादी के बाद से ही लगातार गहरे घाव दे रहा है। पाक समर्थित आतंकवादी संगठन, उसकी सेना, उसकी खुफिया एजैंसी आईएसआई लगातार भारत के विरुद्ध साजिशें रचते आ रहे हैं, हम यह भी जानते हैं कि वह एक ऐसा पड़ोसी है जो कभी बाज नहीं आने वाला।
पठानकोट और उड़ी हमले में जवानों की शहादत के बाद पाक को मुंहतोड़ जवाब देने की जनभावनाएं प्रबल हो उठी थीं और मोदी सरकार ने जनभावनाओं के अनुरूप सर्जिकल स्ट्राइल किया तो देश सेना की जय-जयकार के उदï्घोष से गूंज उठा। इस्राइल का अनुसरण हमें बहुत पहले करना चाहिए था।
हम युद्ध जीतते रहे लेकिन वार्ता की मेज पर हारते रहे। भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल मुस्लिम वोटों के चक्कर में इस्राइल से संबंधों को नजरंदाज करते रहे। इस्राइल के साथ सहयोग हमेशा से था लेकिन वह छिपे शब्दों में होता था लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सारे वोट बैंक के मिथक तोड़ते हुए इस्राइल से संबंधों को उजागर भी किया।
अरब देशों से भारत के संबंध काफी मधुर रहे हैं लेकिन भारतीय जनता पार्टी जनसंघ के समय से ही इस्राइल की हिमायती रही है। भारत ने 15 सितम्बर 1950 को इस्राइल को मान्यता दी थी। इसके अगले वर्ष इस्राइल ने मुम्बई में दूतावास खोला था। तब से दोनों देशों में व्यापार की नींव पड़ी। 1962 में चीन युद्ध और बाद में 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान भी भारत को इस्राइल से मदद मिली। कारगिल युद्ध के दौरान भी इस्राइल ने भारत को गोला बारूद दिया। भारत ने उससे ही मानव रहित विमान खरीदे। सन् 2000 में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण अडवानी ने और 2014 में राजनाथ ङ्क्षसह ने भी इस्राइल की यात्रा कर यही संकेत दिया था कि भाजपा नीत सरकार इस्राइल से संबंध चाहती है। राष्टï्रपति प्रणव मुखर्जी पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने इस्राइल का दौरा किया। भारत की विदेश नीति में बदलाव पहले से ही आ रहा था, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे स्पष्ट कर दिया। कांग्रेस सरकारों के दौरान भी इस्राइल से हथियार खरीदे गए लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की खातिर सब कुछ अंधेरे में रखा गया। पाक प्रायोजित आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक न एक दिन तो भारत को इस्राइल का अनुसरण करना ही पड़ेगा। यह काम जितनी जल्दी हो सके अच्छा है।

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