देव गुरू का घर है पुष्कर तीर्थ

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अजमेर से लगभग 11 किमी दूर हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल तीर्थ राज पुष्कर है। यहां पर कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है जिसकी बड़ी महत्वा है। इस मेले में बड़ी तादात में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। पुष्कर को इस क्षेत्र में तीर्थराज का गौरव प्राप्त है, क्योंकि यहां समूचे ब्रह्मांड के रचयिता माने जाने वाले ब्रह्मा जी का निवास है। पुष्कर के महत्व का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। इसके अनुसार एक समय ब्रह्मा जी को यज्ञ करना था।

उसके लिए उपयुक्त स्थान का चयन करने के लिए उन्होंने धरा पर अपने हाथ से एक कमल पुष्प गिराया। वह पुष्प अरावली पहाडिय़ों के मध्य गिरा और लुढ़कते हुए दो स्थानों को स्पर्श करने के बाद तीसरे स्थान पर ठहर गया। जिन तीन स्थानों को पुष्प ने धरा को स्पर्श किया, वहां जलधारा फूट पड़ी और पवित्र सरोवर बन गए। सरोवरों की रचना एक पुष्प से हुई, इसलिए इन्हें पुष्कर कहा गया।

प्रथम सरोवर कनिष्ठ पुष्कर, द्वितीय सरोवर मध्यम पुष्कर कहलाया। जहां पुष्प ने विराम लिया, वहां एक सरोवर बना जिसे ज्येष्ठ पुष्कर कहा गया। ज्येष्ठ पुष्कर ही आज पुष्कर के नाम से विख्यात है। पुष्कर में लगभग चार सौ मंदिर हैं, इसीलिए इसे मंदिर नगरी भी कहा जाता है। महाभारत में पुष्कर राज के बारे में लिखा है कि तीनों लोकों में मृत्यु लोक महान है और मृत्यु लोक में देवताओं का सर्वाधिक प्रिय स्थान पुष्कर है।

चारों धामों की यात्रा करके भी यदि कोई व्यक्ति पुष्कर सरोवर में डुबकी नहीं लगाता तो उसके सारे पुण्य निष्फल हो जाते हैं। यही कारण है कि तीर्थ यात्री चारों धामों की यात्रा के बाद पुष्कर की यात्रा जरूर करते हैं। तीर्थ राज पुष्कर को पृथ्वी का तीसरा नेत्र भी माना जाता है। पुष्कर नगरी में विश्व का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है तो दूसरी तरफ दक्षिण स्थापत्य शैली पर आधारित रामानुज संप्रदाय का विशाल बैकुंठ मंदिर। इनके अलावा सावित्री मंदिर, वराह मंदिर के साथ-साथ अन्य कई मंदिर हैं। पास में ही सनकादि की मूर्तियां हैं तो एक छोटे से मंदिर में नारद जी की मूर्ति।

एक मंदिर में हाथी पर बैठे कुबेर तथा नारद की मूर्तियां हैं। कई आस्थावान लोग पुष्कर परिक्रमा भी करते हैं। सुबह और शाम के समय यहां आरती होती है। वह दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। इतनी विशेषताओं के कारण पुष्कर को तीर्थराज कहने के अलावा देश का पांचवां धाम भी कहा जाता है। पुष्कर सरोवर में कार्तिक पूर्णिमा पर पर्व स्नान का बड़ा महत्व माना गया है, क्योंकि कार्तिक पूर्णिमा पर ही ब्रह्मा जी का वैदिक यज्ञ संपन्न हुआ था। तब यहां सम्पूर्ण देवी-देवता एकत्र हुए थे। उस पावन अवसर पर पर्व स्नान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान विष्णु और कनिष्क पुष्कर के देवता रुद्र हैं।

हिंदुओं के लिए पुष्कर एक पवित्र तीर्थ व महान पवित्र स्थल है। वर्तमान समय में इसकी देख-रेख की व्यवस्था सरकार ने संभाल रखी है, अत: तीर्थस्थल की स्वच्छता बनाए रखने में भी काफी मदद मिली है। यात्रियों की आवास व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है। हर तीर्थयात्री, जो यहां आता है, यहां की पवित्रता और सौंदर्य की मन में एक याद संजोए वापिस जाता है।

(रमेश सर्राफ धमोरा)

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