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हरियाणा : प्रदर्शनकारी किसान नेताओं पर हत्या के प्रयास और दंगा करने के आरोप में मामला दर्ज

हरियाणा पुलिस ने भारतीय किसान संघ (बीकेयू) की प्रदेश इकाई के प्रमुख गुरनाम सिंह चारूणी और अन्य किसानों पर ‘दिल्ली चलो’ मार्च के दौरान हत्या का प्रयास, दंगे करने, सरकारी ड्यूटी में बाधा पैदा करने और अन्य आरोपों के तहत मामला दर्ज किया है। अधिकारियों ने शनिवार को यह जानकारी दी। 

पराव पुलिस थाने में हेड कांस्टेबल प्रदीप कुमार की शिकायत पर 26 नवंबर को धारा 307(हत्या का प्रयास), 147(दंगा करने), 149(गैरकानूनी तरीके से एकत्र होने), 186(लोकसेवकों के सरकारी काम में बाधा पहुंचाना)और 269(बीमारी का संक्रमण फैलाने जैसे लापरवाही भरे काम कर दूसरों के जीवन को खतरे में डालना) के तहत मामला दर्ज किया गया क्योंकि सैकड़ों किसान दिल्ली जाने के लिए अंबाला छावनी के पास जीटी रोड पर जमा हो गए थे। प्राथमिकी में चारुणी और कई अन्य अज्ञात किसानों को नामजद किया गया है। 

प्राथमिकी में कहा गया है कि घटनास्थल पर पुलिस टीम का नेतृत्व कर रहे पुलिस उपाधीक्षक राम कुमार ने चारुणी को आगे बढ़ने से रोका लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसमें कहा गया है कि चारुणी और अन्य किसानों ने अपने ट्रैक्टरों की मदद से पुलिस के बैरिकेड तोड़ दिए। एफआईआर के अनुसार, कुछ पुलिस अधिकारी बचकर वहां से निकले अन्यथा वे दिल्ली की ओर बढ़ रहे ट्रैक्टरों से कुचले जा सकते थे। 

इन लोगों पर कोविड-19 महामारी से संबंधित दिशानिर्देशों के उल्लंघन का भी आरोप है। पुलिस बैरियर तोड़ने व अन्य आरोपों में पंजाब के कुछ किसानों के खिलाफ पानीपत में भी मामला दर्ज किया गया है। सेक्टर 29 स्थित पानीपत के सेक्टर 29 पुलिस थाने के प्रभारी राजवीर सिंह ने फोन पर कहा, ‘‘भादंसं की धारा 188 (लोकसेवक द्वारा दिए गए आदेश की अवज्ञा करना), आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और अन्य प्रावधानों के तहत एक मामला दर्ज किया गया है।” 

दो दिन पहले हरियाणा के पुलिस प्रमुख मनोज यादव ने कहा था कि उनके बल ने ‘‘काफी धैर्य’’ से काम लिया। प्रदर्शनकारियों ने कई स्थानों पर पथराव किया। डीजीपी ने बयान जारी कर कहा था कि पूरे प्रकरण में न केवल काफी संख्या में पुलिसकर्मी जख्मी हुए बल्कि पुलिस के और निजी वाहनों को क्षति भी पहुंची। 

प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए हरियाणा के कई हिस्सों में सीआरपीसी की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगा दी गई है। किसान नये कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि नये कानून से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।