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गलवान झड़प के 1 साल बाद LAC के पास डटे हुए है चीनी सैनिक, भारत ने मुकाबला करने के लिए की खास तैयारी

पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी की झड़प के एक साल बाद भी चीनी सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास डेरा डाले हुए हैं। इस बीच भारत ने भी लंबी अवधि की सोच के साथ उसका मुकाबला करने के लिए खास तैयारी की है। विवाद वाले बिंदुओं पर सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारतीय और चीनी सैन्य प्रतिनिधियों के बीच 11 दौर की बातचीत हुई है। बातचीत में दोनों देश इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने पर सहमत हो गए हैं।

भारतीय सेना ने पिछले एक साल में लद्दाख में चीन के साथ किसी भी संभावित लड़ाई का सामना करने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होने पर ध्यान केंद्रित किया है। भारत ने सैन्य बुनियादी ढांचे को बढ़ाया है और जवानों की तैनाती 50,000 से 60,000 सैनिकों तक बढ़ा दी है। यही नहीं, भारत ने तेजी से सुरक्षाबल जुटाने के लिए कनेक्टिविटी में सुधार के लिए बेहतर सड़कों के निर्माण कार्य पर भी जोर दिया है। पिछले एक साल से लद्दाख में जमीन पर 50,000 से अधिक सैनिकों की तैनाती के साथ सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर है। इस दौरान भारतीय जवान कड़ाके की सर्दी के बावजूद भी उन स्थानों पर डटे रहे, जहां तापमान शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता है।

पिछले महीने, भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे ने कहा था कि चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की गतिविधियों पर नजर रखते हुए सेना एलएसी पर हाई अलर्ट पर है। नरवणे ने कहा कि भारत चाहता है कि अप्रैल 2020 की यथास्थिति बहाल हो। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने चीन को स्पष्ट कर दिया है कि तनाव कम करने पर तभी विचार किया जाएगा, जब दोनों पक्षों की आपसी संतुष्टि के लिए अग्रिम स्थानों से सैनिकों की वापसी का काम पूरा हो जाए।

उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक हाई अलर्ट पर हैं और पैंगोंग नदी से हटने के बाद से तैनाती कम नहीं हुई है। सेना प्रमुख ने कहा कि चीन ने पूर्वी लद्दाख में लगभग 50,000 से 60,000 सैनिकों को तत्काल अंदर के स्थानों पर तैनात किया है, इसलिए भारत ने भी इसी तरह की तैनाती की है। समाधान खोजने के लिए कोर कमांडर स्तर पर 11 दौर की सैन्य वार्ता के बाद भी पैंगोंग में सैनिकों की पीछे हटने के बावजूद पूरी तरह से सैनिकों की वापसी को लेकर कोई सफलता नहीं मिली है। हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और 900 वर्ग किलोमीटर के देपसांग मैदानों जैसे अन्य विवाद वाले क्षेत्रों में सीमा विवादों को सुलझाने के लिए भारतीय और चीनी सेनाएं मिल चुकी हैं।

नरवणे ने यह भी कहा कि हम वर्तमान में हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और देपसांग जैसे अन्य विवाद वाले बिंदुओं पर बकाया समस्याओं को हल करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पैंगोंग झील क्षेत्र में सैनिकों के पीछे हटने से संबंधित समझौते के दौरान भारत का रुख वही रहा है कि अप्रैल 2020 की यथास्थिति को बहाल किया जाना चाहिए।

सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच विश्वास का स्तर कम है, लेकिन उन्होंने कहा कि विश्वास की कमी बातचीत की प्रक्रिया में बाधा नहीं बननी चाहिए। पिछले साल 15 जून को गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच खूनी संघर्ष में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। इस झड़प में चीन ने अपने चार सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की थी। हालांकि कई रिपोर्ट्स में चीन के अधिक सैनिक मारे जाने की खबरें सामने आई हैं।

पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में भारत के शहीद हुए 20 सैनिकों में कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू भी शामिल थे। सैनिकों ने अब यहां सिर्फ 1.5 किमी की दूरी पर खासतौर पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। संघर्ष के बाद, पेट्रोल प्वाइंट 14 नो पेट्रोल जोन बन गया और दोनों पक्षों 1.5 किमी पीछे हटे हैं, जिसके बाद यह क्षेत्र बफर जोन में बदल गया है।

भारत ने पेट्रोल प्वाइंट 14 के पास चीन की निगरानी चौकी पर आपत्ति जताई थी, जिसके कारण झड़प हुई थी। इस झड़प से युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। पिछले साल अगस्त के अंत तक पैंगोंग झील का क्षेत्र एक युद्ध क्षेत्र में बदल गया था, क्योंकि भारत ने झील के दक्षिणी किनारे पर चीन की यथास्थिति को बदलने के इरादों को देखते हुए कैलाश रेंज में प्रमुख पर्वत शिखर पर अपना कब्जा सुनिश्चित कर लिया था।

वर्तमान में पेट्रोल प्वाइंट 14 तक कोई गश्त नहीं की जा रही है। चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विभिन्न निगरानी विधियों के माध्यम से कड़ी निगरानी रखना आवश्यक है, क्योंकि वे बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो विवादास्पद बिंदु से बहुत दूर नहीं हैं। इसके अलावा, चीन अपनी निगरानी क्षमताओं को भी बढ़ा रहा है। सूत्रों ने कहा कि इसने पठारी संचालन क्षमताओं के साथ एक मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) विकसित किया है और इसे कैलाश पर्वत श्रृंखला में भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात करने की योजना बनाई है। चीन ने एलएसी के तीन क्षेत्रों - पश्चिमी (लद्दाख), मध्य (उत्तराखंड, हिमाचल) और पूर्वी (सिक्किम, अरुणाचल) में सैनिकों, तोपखाने और अन्य युद्धक सामग्री को भी बढ़ाया है।