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एल्गार परिषद मामला: 16 आरोपियों में से एक की मौत, दो जमानत पर रिहा, 13 जेल में बंद

एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में अगले तीन महीने में आरोप तय करने संबंधी उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद अब इस बात पर ध्यान केंद्रित हो गया है कि मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपियों से जुड़ी स्थिति क्या है।

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) मामले की जांच कर रहा है। इस मामले में 16 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें से फादर स्टेन स्वामी की न्यायिक हिरासत के दौरान पिछले साल यहां एक निजी अस्पताल में मौत हो गई थी, जबकि तेलुगु कवि वरवर राव चिकित्सकीय जमानत पर जेल से बाहर हैं। केवल एक आरोपी सुधा भारद्वाज को नियमित जमानत पर रिहा किया गया है। सुधा को पिछले साल दिसंबर में बंबई उच्च न्यायालय ने जमानत दी थी। इसके अलावा 13 अन्य आरोपी विभिन्न जेलों में बंद हैं।

एनआईए ने अपने मसौदा आरोपों में आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप लगाए जाने का अनुरोध किया है। अदालत ने अभी इस मामले में आरोप तय नहीं किए हैं। आरोप तय होने के बाद ही सुनवाई शुरू होगी।

यह मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन में कथित भड़काऊ भाषण देने से संबंधित है, जिसके बारे में पुलिस ने दावा किया है कि इसके कारण अगले दिन पश्चिमी महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई। पुणे पुलिस ने यह भी दावा किया था कि सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन था। बाद में एनआईए ने मामले की जांच अपने हाथ में ले ली।

इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की स्थिति इस प्रकार है:

कार्यकर्ता सुधीर धवले मामले में सबसे पहले गिरफ्तार किए गए लोगों में शामिल हैं। उन्हें जून 2018 में गिरफ्तार किया गया। वह वर्तमान में तलोजा जेल में बंद हैं और उन पर उग्रवादी संगठन के सक्रिय सदस्य होने का आरोप लगाया गया है। एनआईए की एक विशेष अदालत ने इस साल जुलाई में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

कार्यकर्ता रोना विल्सन को जून 2018 में दिल्ली स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया था और वह तब से जेल में हैं। उन्हें कथित तौर पर शहरी माओवादियों के प्रमुख सदस्यों में शामिल बताया गया है। विशेष अदालत ने जुलाई 2022 में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। विल्सन को सितंबर 2021 में अपने पिता के निधन के बाद 30वें दिन के अनुष्ठान में शामिल होने के लिए विशेष एनआईए अदालत ने 14 दिन की अस्थायी जमानत दी थी। उन्होंने 14 दिन की अवधि समाप्त होने पर आत्मसमर्पण कर दिया था।