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भूमि अधिग्रहण कानून: सुनवाई से अलग नहीं होंगे जस्टिस अरुण मिश्रा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को चुनौती देने संबंधी मामले की संविधान पीठ में सुनवाई से अलग नहीं होंगे। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया और कहा, "मैं मामले की सुनवाई से अलग नहीं हट रहा हूं।"

कई किसान संगठनों और व्यक्तियों ने मामले की सुनवाई में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के शामिल होने पर आपत्ति जताई है। उनकी दलील है कि वह पिछले साल फरवरी में शीर्ष अदालत की तरफ से सुनाए गए फैसले में पहले ही अपनी राय रख चुके हैं। 

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी, न्यायमूर्ति विनीत सरण, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट शामिल हैं। संविधान पीठ ने मामले से जुड़े पक्षों से कानूनी प्रश्न सुझाने को कहा है जिन पर अदालत फैसला सुनाएगी। इससे पहले, न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के लिये गठित संविधान पीठ से न्यायमूर्ति मिश्रा को हटाने के प्रयासों को 16 अक्टूबर की निंदा करते हुये कहा था कि यह और कुछ नहीं बल्कि अपनी पसंद की पीठ चुनने का हथकंडा है और अगर इसे स्वीकार कर लिया गया तो यह संस्थान को नष्ट कर देगा।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर पांच सदस्यीय संविधान पीठ से न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा को अलग करने की मांग करने के पक्षकारों के अनुरोध को स्वीकार कर लिया गया तो ‘‘यह इतिहास का सबसे काला अध्याय होगा, क्योंकि न्यायपालिका को नियंत्रित करने के लिये उसपर हमला किया जा रहा है।’’ 

न्यायमूर्ति मिश्रा ने किसानों के एक संगठन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान से कहा था, "यह अपनी पसंद की पीठ चुनने का प्रयास करने के अलावा और कुछ नहीं है। आप अपनी पसंद के व्यक्ति को पीठ में चाहते हैं। अगर हम आपके अनुरोध को स्वीकार कर लेते हैं और सुनवाई से अलग हो जाने के आपके नजरिये को स्वीकार कर लेते हैं तो यह संस्थान को नष्ट कर देगा। यह गंभीर मुद्दा है और इतिहास इसे इस तरह से देखेगा कि वरिष्ठ अधिवक्ता तक इस प्रयास में शामिल थे।"

दीवान ने कहा था कि किसी न्यायाधीश को पक्षपात की किसी भी आशंका को खत्म करना चाहिये, अन्यथा जनता का भरोसा खत्म होगा और सुनवाई से अलग होने का उनका अनुरोध और कुछ नहीं बल्कि संस्थान की ईमानदारी को कायम रखने के संबंध में है। 

उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी प्रार्थना का सरोकार अपनी पसंद के व्यक्ति को पीठ में शामिल कराने से दूर-दूर तक नहीं है और ‘‘वैश्विक सिद्धांत हैं जिन्हें यहां लागू किया जाना है। हम सिर्फ इस ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।’’ न्यायमूर्ति मिश्रा ने 16 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान कहा था कि पीठ से उनके अलग होने की मांग करने वाली याचिका ‘‘प्रायोजित’’ है। 

उन्होंने कहा था, "अगर हम इन प्रयासों के आगे झुक गए तो यह इतिहास का सबसे काला अध्याय होगा। ये ताकतें न्यायालय को किसी खास तरीके से काम करने के लिये मजबूर करने का प्रयास कर रही हैं। इस संस्थान को नियंत्रित करने के लिये हमले किये जा रहे हैं। यह तरीका नहीं हो सकता, यह तरीका नहीं होना चाहिये और यह तरीका नहीं होगा।"

किसी का भी नाम लिये बिना न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा था, "ये ताकतें हैं जो इस न्यायालय को खास तरीके से काम करने के लिये मजबूर करने का प्रयास कर रही हैं, वही मुझे पीठ में बने रहने को मजबूर कर रही हैं। अन्यथा, मैं अलग हो जाता।" उन्होंने कहा था कि न्यायाधीश के तौर पर लोगों के लिये संस्थान की रक्षा करने की जिम्मेदारी को वह जानते हैं और ‘‘इस संस्थान में जो कुछ भी हो रहा है, वह वाकई हैरान करने वाला है।" 

दीवान ने विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुये कहा था कि जब किसी न्यायाधीश के सुनवाई से अलग होने की मांग की जाती है तो उसे अनावश्यक संवेदनशील नहीं होना चाहिए, इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए। हालांकि 2014 में, एक अन्य फैसले में कहा गया था कि मुआवजा स्वीकार करने में देरी करने पर भूमि अधिग्रहण को रद्द किया जा सकता है। 

इसके विपरीत, फरवरी, 2018 में न्यायमूर्ति मिश्रा के एक फैसले में कहा गया था कि पांच साल के भीतर भू स्वामियों द्वारा मुआवजा स्वीकार करने से इंकार करने पर भूमि अधिग्रहण अमान्य नहीं होगा। 

पिछले साल छह मार्च को, शीर्ष अदालत ने कहा था कि इसी मुद्दे पर इसी क्षमता वाली दो अलग-अलग पीठों द्वारा दिए गए फैसलों के औचित्य को एक बड़ी पीठ जांचेगी।