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संविधान दिवस पर बोले ओम बिरला- कर्तव्यों से विमुख होकर सिर्फ अधिकारों की बात करने से असंतुलन पैदा होगा

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने "अनुशासन" को मौलिक अधिकारों द्वारा प्रदान की गई स्वतंत्रता और शक्तियों के प्रयोग की एक जरूरी शर्त देते हुए मंगलवार को कहा कि कर्तव्यों से विमुख होकर सिर्फ अधिकारों की बात करने से एक प्रकार का असंतुलन पैदा होगा। 

संविधान को अंगीकार करने की 70वीं वर्षगांठ पर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा, "संविधान ने जहां एक तरफ मौलिक अधिकारों के रूप में हमें पर्याप्त स्वतंत्रता और शक्तियां दी गई हैं, वहीं दूसरी तरफ संतुलन बनाते हुए मौलिक कर्तव्यों का निर्देश करने के लिये अनुशासित भी किया।" 

उन्होंने कहा, "यह अनुशासन मौलिक अधिकारों द्वारा दी गई आजादी और शक्तियों के प्रयोग की एक जरूरी शर्त है।" लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संविधान के मौलिक कर्तव्यों को देखें तो स्पष्ट होता है कि उसमें मानवीय जीवन के हर पहलु को अनुशासित करने की परिकल्पना है। ऐसे में देशवासियों से अपेक्षा की जाती है कि हम संविधान का पालन करे तथा उसके आदर्शों एवं संस्थाओं का आदर करें। 

नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का आस्थापूर्वक करें पालन : उपराष्ट्रपति नायडू

बिरला ने कहा कि मौलिक कर्तव्यों के पालन से राष्ट्र की अधिकांश समस्याओं का समाधान हो सकता है..चाहे वन एवं पर्यावरण संरक्षण की बात हो, स्वच्छता की बात हो, या फिर जलवायु परिवर्तन की या प्रदूषण संकट की बात हो । लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संविधान में उल्लेख किये गए कर्तव्य हमें उन आदर्शो एवं मूल्यों की याद दिलाते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हमें प्रेरित किया है, देश की सम्प्रभुता को बनाये रखने का दर्शन दिया। 

बिरला ने कहा, "लेकिन कर्तव्य से विमुख होकर सिर्फ अधिकारों की बात करने से एक प्रकार का असंतुलन पैदा होता है। इस असंतुलन के कारण देश के विकास में बाधाएं आती हैं और विकास की गति धीमी पड़ जाती है।" उन्होंने कहा, "आज संसद के दोनों सदनों के सभी दलों के प्रतिनिधि उपस्थित हैं। मेरा आप सभी से निवेदन है कि आप इस बात पर आम राय बनाएं कि इस अनुच्छेद (मौलिक कर्तव्य) का पालन सिर्फ विवेकाधीन न रह जाए।"

 लोकसभा अध्यक्ष की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब एक दिन पहले ही लोकसभा की कार्यवाही विपक्ष के भारी हंगामे के कारण बाधित हुई और धक्कामुक्की की स्थित उत्पन्न हुई थी। बिरला ने कहा, "अब समय आ गया है कि हम सभी सांसद देश के सामने एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करें जहां अधिकारों के साथ साथ हम अपने कर्तव्यों का स्मरण स्वयं भी करें और दूसरों को भी कराएं।"

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान बस कुछ कानूनों एवं नियमों की एक लिखित किताब नहीं है बल्कि यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना और आदर्शो एवं सामूहिक सपनों एवं आशाओं का प्रतिबिंब है। इसलिये हमें संविधान को अपना पद प्रदर्शक बनाये रखना है।