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ब्लू इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए मोदी कैबिनेट ने 'डीप सी मिशन' को दी मंजूरी

मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में कई महत्वकांशी परियोजनाओं और मिशन को सामने रखा है जो आने वाले समय में देश के लिए काफी लाभकारी साबित हो सकती है। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि तकनीक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी भारत लगातार तरक्की कर रहा है और बहुमुखी विकास के लिए कई अहम् कदम उठाये जा रहे है।आज प्रौद्योगिकी क्षेत्र में मोदी कैबिनेट ने एक नए और अहम मिशन को अनुमति दी है।  

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जानकारी देते हुए बताया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘गहरे समुद्र मिशन’ को बुधवार को अनुमति प्रदान कर दी, जिससे समुद्री संसाधनों की खोज और समुद्री प्रौद्योगिकी के विकास में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता की हुई आर्थिक मामलों संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को अनुमति दी गई। 

बैठक के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संवाददाताओं को बताया कि गहरे समुद्र के तले एक अलग ही दुनिया है। पृथ्वी का 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्र है । उसके बारे में अभी बहुत अध्ययन नहीं हुआ है । उन्होंने बताया कि सीसीईए ने ‘‘गहरे समुद्र संबंधी मिशन’’ को मंजूरी प्रदान कर दी है । इससे एक तरफ ब्लू इकोनॉमी (महासागर आधारित अर्थव्यवस्था) को मजबूती मिलेगी वहीं समुद्री संसाधनों की खोज और समुद्री प्रौद्योगिकी के विकास में मदद मिलेगी । 

एक सरकारी बयान के अनुसार, इस अभियान को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए पांच वर्ष की अवधि की अनुमानित लागत 4,077 करोड़ रुपए होगी। तीन वर्षों (2021-2024) के लिए पहले चरण की अनुमानित लागत 2823.4 करोड़ रुपये होगी। इसमें कहा गया है कि गहरे समुद्र परियोजना भारत सरकार की नीली अर्थव्यवस्था पहल का समर्थन करने के लिए एक मिशन आधारित परियोजना होगी। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओइएस) इस बहु-संस्थागत महत्वाकांक्षी अभियान को लागू करने वाला नोडल मंत्रालय होगा। 

जावड़ेकर ने बताया कि समुद्र में 6000 मीटर नीचे कई प्रकार के खनिज हैं । इन खनिजों के बारे में अध्ययन नहीं हुआ है। इस मिशन के तहत खनिजों के बारे में अध्ययन एवं सर्वेक्षण का काम किया जायेगा । इस मिशन के तहत गहरे समुद्र में खनन और मानवयुक्त पनडुब्बी के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास किया जायेगा । इसमें तीन लोगों को समुद्र में 6,000 मीटर की गहराई तक ले जाने के लिए वैज्ञानिक सेंसर और उपकरणों के साथ एक मानवयुक्त पनडुब्बी विकसित की जाएगी। बहुत कम देशों ने यह क्षमता हासिल की है। 

मध्य हिंद महासागर में 6,000 मीटर गहराई से पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स के खनन के लिए एक एकीकृत खनन प्रणाली भी विकसित की जाएगी। बयान के अनुसार, इससे भविष्य में संयुक्त राष्ट्र के संगठन इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी के द्वारा वाणिज्यिक खनन कोड तैयार किए जाने की स्थिति में, खनिजों के अन्वेषण अध्ययन से निकट भविष्य में वाणिज्यिक दोहन का मार्ग प्रशस्त होगा। 

उन्होंने बताया कि इसके अलावा जलवायु परिवर्तन एवं समुद्र के जलस्तर के बढ़ने सहित गहरे समुद्र में होने वाले परिवर्तनों के बारे में भी अध्ययन किया जायेगा । इसके तहत मौसम से लेकर महत्वपूर्ण जलवायु परिवर्तनों के भविष्यगत अनुमानों को समझने और उसी के अनुरूप सहायता प्रदान करने वाले अवलोकन और मॉडल के एक समूह का विकास किया जाएगा। मंत्री ने बताया कि गहरे समुद्र संबंधी मिशन के तहत जैव विविधता के बारे में भी अध्ययन किया जायेगा । 

उन्होंने बताया कि इसके तहत समुद्रीय जीव विज्ञान के बारे में जानकारी जुटाने के लिये उन्नत समुद्री स्टेशन (एडवांस मरीन स्टेशन) की स्थापना की जायेगी । इसके अलावा ताप ऊर्जा का अध्ययन किया जायेगा । इसके तहत अपतटीय महासागर ताप ऊर्जा रूपांतरण (ओटीईसी) विलवणीकरण संयंत्र के लिए अध्ययन और विस्तृत इंजीनियरिंग डिजाइन की अवधारणा का प्रस्ताव किया गया है । 

जावड़ेकर ने बताया कि इस बारे में अभी दुनिया के पांच देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, चीन के पास ही प्रौद्योगिकी हैं। ऐसी प्रौद्योगिकी मुक्त रूप से उपलब्ध नहीं है । ऐसे में इस मिशन से स्वयं प्रौद्योगिकी का विकास करने का मार्ग भी प्रशस्त होगा । बयान के अनुसार, इससे रोजगार के अवसर पैदा करने के अलावा विशेष उपकरणों, जहाजों के डिजाइन, विकास और निर्माण और आवश्यक बुनियादी ढांचे की स्थापना से भारतीय उद्योग, विशेष रूप से एमएसएमई और स्टार्ट-अप के विकास को गति मिलने की उम्मीद है। 

भारत की 7,517 किमी लंबी तटरेखा नौ तटीय राज्यों से गुजरती है और इसमें 1,382 द्वीप हैं। फरवरी 2019 में प्रतिपादित किए गए भारत सरकार के 2030 तक के नए भारत के विकास की अवधारणा के दस प्रमुख आयामों में से नील अर्थव्यवस्था भी एक प्रमुख आयाम है।