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नीतीश, ममता या KCR... विपक्ष की उम्मीदें हैं अपार, पर एकता की राह में मुश्किलें भी हैं हजार

कहानी की शुरुआत नीतीश कुमार द्वारा 2024 में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के साथ हुई। लेकिन एक महीने से भी कम समय में इस कहानी में इतने ट्विस्ट एंड टर्न्स आ गए कि बॉलीवुड की एक अच्छी स्क्रिप्ट भी फेल हो जाती है। नीतीश कुमार से लेकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और अब टीआरएस प्रमुख केसीआर तक, सभी एकजुट विपक्ष के इस राग में अपनी-अपनी धुन बजा रहे हैं। एक कांग्रेस है जो अपने लिए कम भूमिका स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यह बात जयराम रमेश के हालिया बयान से भी स्पष्ट हो गई है। ऐसे में राजनीति के सबसे बड़े 'फेसऑफ' के लिए संयुक्त विपक्ष के गठन की राह कितनी आसान होगी, यह सबसे बड़ा सवाल है।
अब कांग्रेस क्या करेगी?
गौरतलब है कि बिहार में सहयोगी दल बदलने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 'मिशन 2024' पर निकल चुके हैं। इसके तहत उन्होंने दिल्ली में एक के बाद एक कई विपक्षी नेताओं से मुलाकात की। इसमें आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के राहुल गांधी, हरियाणा के ओम प्रकाश चौटाला और दक्षिण के कई अन्य नेताओं के नाम शामिल हैं। जब उनकी बैठकें अभी चल रही थीं, तब कांग्रेस के भीतर से एकजुट विपक्ष में पार्टी की बड़ी भूमिका के लिए आवाजें उठने लगीं। इससे पहले बिहार कांग्रेस के नेता ने कहा कि देश की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते यह पीएम पद की स्वाभाविक दावेदार है। सोमवार को वरिष्ठ जयराम रमेश पहले ही कह चुके हैं कि कांग्रेस खुद को कमजोर नहीं होने देगी। यानी संदेश साफ है कि अगर एकजुट विपक्ष बनता है तो वह अपने चेहरे का सबसे बड़ा दावेदार होगा।
केसीआर ने बढ़ाया तनाव
नरेंद्र मोदी से मुकाबला करने के लिए संयुक्त विपक्ष का रूप तय करने की कोशिश की जा रही है। इस बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री और टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव के ऐलान ने इसे एक नया रंग दे दिया है। केसीआर ने घोषणा की है कि वह जल्द ही एक राष्ट्रीय पार्टी की घोषणा करने वाले हैं। उनकी तैयारी राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी और कांग्रेस को विकल्प देने की है। ऐसे में यह लगभग साफ है कि वह कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे। ऐसे में कांग्रेस का चेहरा एकजुट विपक्ष होगा, दूसरा तीसरा मोर्चा होगा या चौथा मोर्चा होगा, इस बारे में कुछ भी स्पष्ट रूप से कहना मुश्किल है।
क्या ममता-कांग्रेस के बीच होगी बात?
हालांकि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा कर सकती है, लेकिन वह राज्य स्तर पर अपनी कमजोरी से अच्छी तरह वाकिफ है। ऐसे में तमिलनाडु में डीएमके, बिहार में जदयू और राजद, महाराष्ट्र में एनसीपी और उद्धव ठाकरे के साथ झारखंड में भी झामुमो की मजबूरी है। वहीं ममता के साथ भी कुछ ऐसी ही मजबूरियां हैं। वह अच्छी तरह जानते हैं कि बंगाल के बाहर अपना जादू चलाना मुश्किल है। ऐसे में वह नीतीश, हेमंत सोरेन और अखिलेश के साथ जाने से नहीं हिचकिचाएंगी। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि बंगाल में कांग्रेस उनके साथ गठबंधन कर पाएगी या नहीं। यहां कांग्रेस खुद को ममता से ज्यादा वामपंथियों के साथ जाने में सहज मानेगी। ऐसे में संभव है कि ममता गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे का रास्ता अपनाएं।