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मोदी ने जिनपिंग को दिखाया 1300 साल पुराना पत्थर-सूनामी, भूकंप, चक्रवात, 7 हाथी,लेकिन नहीं हिला कृष्णा बटर बॉल

तमिलनाडु के  ऐतिहासिक शहर महाबलीपुरम में पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग की मुलाकात हुई। इस बीच नरेंद्र मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को महाबलीपुरम के कई सारे दर्शनीय स्थलों के भव्य दर्शन के लिए लेकर गए। इस दौरान मोदी ने शी जिनपिंग  को महाबलीपुरम की दक्षिण भारतीय संस्कृतिक और इसकी समृद्घ विरासत के बारे में जानकारी दी। अब दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद एक फोटो बड़ी तेजी से वायरल होती दिख रही है।

इस वायरल हो रही तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक काफी ज्यादा बड़े आकार के पत्थर के आगे खड़े दिखाई दे रहे हैं। जिसमें देखा जा सकता है दोनों नेता अने हाथ ऊपर कर खड़े हुए हैं। 

बता दें कि यह विशाल आकार वाला पत्थर वैसे बहुत छोटे से एरिया पर टिका हुआ है और खतरनाक तरीके से आगे की तरफ झुका भी हुआ है। पत्थर को देख मानों ऐसा प्रतीत होता है कि जरा सी हलचल क्या हुई यह आगे की तरफ खुद ही लुड़ जाएगा। लेकिन आपको बता दें जैसा आप और हम सोच रहे हैं ऐसा कुछ भी नहीं है जी हां क्योंकि यह पत्थर यहां पर पिछले 1300 साल से ऐसे ही पड़ा हुआ है। 

इतना विशालकाय पत्थर आखिर कैसे टिका

इस बड़े से आकार वाले पत्थर का इस तरह छोटी सी जगह पर टिके रहने के पीछे बड़ा हैरान कर देने वाला रहस्य है। इस अनोखे पत्थर को दिखाने के लिए पीएम मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को वहां दिखाने के लिए लेकर गए थे। इसके आगे दोनों नेताओं ने फोटो भी खिंचवाई जिसके बाद से यह फोटो खूब सुर्खियों में छाई हुई है। और तो और महाबलीपुरम का ये हैरान कर देने वाला इतना बड़ा पत्थर लोगों के  बीच चर्चा में बना हुआ है। वैसे जानकारी के लिए बात दें कि इस पत्थर की कहानी बेहद दिलचस्प है। 

महाबलीपुरम के  एक पहाड़ी इलाके के उपरी भाग पर टिके इस विशालकाय पत्थर को यहां के लोग कृष्णा बटर बॉल के नाम से जानते हैं। दिखने में ऐसा लगता है कि जरा सा कंपन हुआ नहीं और यह विशाल आकार वाला पत्थर सीधा पहाड़ से फिसल जाएगा,लेकिन खास बात यह है कि ये अनोखा और विशालकाय पत्थर पिछले 1300 साल से यहां पर ऐसे का ऐसा ही जैसा की आपको और हम सभी को नजर आ रहा है। बहुत बार ऐसा भी हुआ जब खतरनाक स्तर पर इस पत्थर की आगे की तरफ से झुके होने की वजह से इसे यहां से हटाने की कोशिश की गई लेकिन किसी को इसमें कामयाबी नहीं मिल पाई।

इस विशालकाय पत्थर को न भूकंप हिला पाया, न सुनामी


इस पत्थर को पिछले 1300 साल में इस इलाके में कई बार भूकंप आए, कई बार सुनामी आई, कई बार चक्रवात और दूसरी आपदाएं आईं लेकिन ये पत्थर टस से मस नहीं हुआ। पिछले 1300 साल में यहां की धरती कई बार हिली लेकिन वो इस पत्थर को यहां से नहीं हिला पाई।

कृष्णा बटर बॉल 20 फीट ऊंचा और 5 मीटर चौड़ा है। ये पत्थर 45 डिग्री के कोण पर झुका है। पत्थर के इतने खतरनाक स्तर पर झुके होने के बावजूद इसके नहीं गिरने को स्थानीय लोग दैवीय कृपा मानते हैं कृष्णा बटर बॉल का वजन 250 टन है। यह पत्थर महाबलीपुरम के ये मुख्य दर्शनीय स्थलों मे से एक है। 250 टन वजनी पत्थर प्राकृतिक रूप से यहां ऐसे ही पड़ा है। यहां के लोग इसे कृष्णा बटर बॉल या वानिराई काल कहते हैं। वानिराई काल का मतलब होता है- आकाश के भगवान का पत्थर। इसे स्टोन ऑफ गॉड भी कहते हैं।

वैसे लोगों के लिए ये हैरानी कि बात यह है की  इतना वजनी पत्थर इतने छोटे से कोने पर टिका कैसे है। इसी को देखने यहां दूर-दूर से लोग आते हैं। लोग यहां इसी तरह से फोटो खिंचवाते हैं जिस तरह से पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खिंचवाई है।

सात हाथी मिलकर भी नहीं हटा सके यह पत्‍थर 

वर्ष 1908 में ब्रिटिश शासन के दौरान मद्रास के गवर्नर आर्थर लावले ने इसे हटाने का प्रयास शुरू किया। लावले को डर था कि अगर यह विशालकाय पत्‍थर लुढ़कते हुए कस्‍बे तक पहुंच गया तो कई लोगों की जान जा सकती है। इससे निपटने के लिए गवर्नर लावले ने सात हाथियों की मदद से इसे हटाने का प्रयास शुरू किया लेकिन कड़ी मशक्‍कत के बाद भी यह पत्‍थर टस से मस नहीं हुआ। आखिरकार गवर्नर लावले को अपनी हार माननी पड़ी। अब यह पत्‍थर स्‍थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। 

इस विशालकाय पत्थर का नाम कृष्णा बटर बॉल क्यों रखा गया ?

इस पत्थर के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। यहाँ के लोगों का कहना है की  भगवान कृष्ण के चुराए गए माखन का पहाड़ है।  भगवान कृष्ण अपनी मां के मटके से माखन चुरा लेते थे।  स्थानीय हिंदू कहते हैं कि ये उसी माखन का ढेर है, जो सूख चुका है।  कुछ लोग इसे स्वर्ग से गिरा पत्थर मानते हैं।  स्थानीय लोग मानते हैं कि स्वर्ग का पत्थर होने की वजह से ही ये इस खतरनाक तरीके टिके होने के बावजूद नहीं लुढ़क रहा है। 



 इस पत्थर को पहली बार सन 630 से 668 के बीच दक्षिण भारत पर शासन करने वाले पल्‍लव शासक नरसिंह वर्मन ने इसे हटवाने का प्रयास किया। उनका मानना था कि यह पत्‍थर स्‍वर्ग से गिरा है, इसलिए मूर्तिकार इसे छू न सकें। पल्‍लव शासक का यह प्रयास सफल नहीं हो पाया।  



यह पत्थर 4 फीट के बेस पर यह 250 टन का पत्‍थर कैसे टिका हुआ है। कुछ लोगों का यह दावा है कि पत्‍थर के न लुढ़कने की वजह घर्षण और गुरुत्‍वाकर्षण है। उनका कहना है कि घर्षण जहां इस पत्‍थर को नीचे फिसलने से रोक रहा है, वहीं गुरुत्‍कार्षण का केंद्र इस पत्‍थर को 4 फीट के बेस पर टिके रहने में मदद कर रहा है।