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Prophet remark case : जानिए ! नुपुर शर्मा केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा

उच्चतम न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी से निलंबित नेता नुपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद के बारे में विवादित टिप्पणी को लेकर उन्हें शुक्रवार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि उनकी (नुपुर की) ‘अनियंत्रित जुबान’ ने पूरे देश को आग में झोंक दिया। शीर्ष न्यायालय ने यह भी कहा कि ‘‘देश में जो कुछ हो रहा है उसके लिए शर्मा अकेले जिम्मेदार हैं।’’

न्यायालय ने शर्मा की विवादित टिप्पणी को लेकर विभिन्न राज्यों में दर्ज प्राथमिकियों को एक साथ जोड़ने संबंधी उनकी अर्जी स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने (शर्मा ने) पैगंबर मोहम्मद के बारे में टिप्पणी या तो सस्ता प्रचार पाने के लिए या किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत या किसी घृणित गतिविधि के तहत की।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की अवकाशकालीन पीठ ने कहा, ‘‘उनका (शर्मा का) अपनी जुबान पर काबू नहीं है और उन्होंने टेलीविजन चैनल पर गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए हैं तथा पूरे देश को आग में झोंक दिया है। लेकिन फिर भी वह 10 साल से वकील होने का दावा करती हैं। उन्हें अपनी टिप्पणियों के लिए तुरंत पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए थी।’’

टेलीविजन पर प्रसारित एक बहस के दौरान पैगंबर के बारे में की गई शर्मा की टिप्पणी के विरोध में देशभर में प्रदर्शन हुए थे और कई खाड़ी देशों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। भाजपा ने बाद में शर्मा को पार्टी से निलंबित कर दिया था।

शीर्ष न्यायालय ने कहा, ‘‘ये बयान बहुत व्यथित करने वाले हैं और इनसे अहंकार की बू आती है। इस प्रकार के बयान देने का उनका क्या मतलब है? इन बयानों के कारण देश में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुईं... ये लोग धार्मिक नहीं हैं। वे अन्य धर्मों का सम्मान नहीं करते। ये टिप्पणियां या तो सस्ता प्रचार पाने के लिए की गईं अथवा किसी राजनीतिक एजेंडे या घृणित गतिविधि के तहत की गईं।’’

भाजपा की निलंबित नेता के खिलाफ न्यायालय की यह टिप्पणी राजस्थान के उदयपुर में एक दर्जी की दो लोगों द्वारा बर्बर हत्या किये जाने की पृष्ठभूमि में आई है।

पीठ ने पैगंबर के बारे में टिप्पणी करने को लेकर विभिन्न राज्यों में दर्ज प्राथमिकियों को एक साथ जोड़ने की शर्मा की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और उन्हें याचिका वापस लेने की अनुमति दी।

पीठ ने कहा, ‘‘उन्हें (शर्मा को) खतरा है या वह खतरा बन गई हैं? जिस तरह से उन्होंने देशभर में लोगों की भावनाओं को भड़काया है... देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए केवल यह महिला जिम्मेदार है।’’

न्यायालय ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब शर्मा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने पीठ से कहा कि उनकी मुवक्किल को जान का खतरा है।

पीठ ने आगे कहा, ‘‘जिस तरह से उन्होंने (शर्मा ने) देश में भावानाएं भड़काई हैं, उसी की चलते देश में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुई हैं। देश में जो कुछ हो रहा है वह केवल इस महिला के कारण हो रहा है। हमने (टेलीविजन पर हुई) बहस देखी है।’’

शर्मा को शीर्ष न्यायालय की फटकार के बाद कांग्रेस ने कहा कि सत्तारूढ़ दल को शर्म से सिर झुका लेना चाहिए। कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने एक बयान में कहा कि न्यायालय ने बहुत ही महत्वपूर्ण और दूरगामी टिप्पणियां की हैं, जिनसे ‘‘विध्वंसक विभाजनकारी विचारधाराओं से लड़ने’’ के पार्टी (कांग्रेस) के संकल्प को बल मिला है।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने शर्मा की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की और कहा कि (देश में) कानून का राज स्थापित होना चाहिए।

भाजपा की निलंबित नेता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने दलील दी कि शर्मा ने अपनी टिप्पणियों के लिए वास्तव में माफी मांगी है और न्यायालय के ऐसे कई फैसले हैं, जिनमें कहा गया है कि एक घटना के लिए दो अलग-अलग प्राथमिकियां नहीं होनी चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘उन्होंने बहुत देर से माफी मांगी और वह भी यह कहते हुए मांगी कि यदि धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, वगैरह-वगैरह। उन्हें तत्काल टीवी पर आकर देश से माफी मांगनी चाहिए थी।’’

न्यायालय ने कहा कि उनकी याचिका से अहंकार की बू आती है और लगता है कि वह देश के मजिस्ट्रेट को अपने सामने बहुत तुच्छ समझती हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘जब कोई प्राथमिकी दर्ज होती है और आपकी गिरफ्तारी नहीं होती है, यह प्रदर्शित करता है कि आपकी सांठगांठ है। वह सोचती हैं कि उनकी मदद करने के लिए उनके पास सत्ता है और इसलिए गैर-जिम्मेदाराना बयान देती हैं।’’

सिंह ने कहा कि शर्मा एक राजनीतिक दल की प्रवक्ता थीं और उनकी अनजाने में की गई टिप्पणी एक बहस के संबंध में थी।

पीठ ने कहा, ‘‘यदि आप किसी राजनीतिक दल की प्रवक्ता हैं, तो आपको इस तरह की बातें करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता।’’ न्यायालय ने कहा, ‘‘अगर बहस का दुरूपयोग किया गया था, तो उन्हें सबसे पहले प्रस्तोता (एंकर) के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करानी चाहिए थी।’’

सिंह ने कहा कि उन्होंने बहस में हिस्सा लेने वाले अन्य व्यक्तियों द्वारा शुरू की गई बहस पर प्रतिक्रिया दी थी और बहस की लिखित प्रति का उल्लेख किया।

पीठ ने कहा, ‘‘टीवी पर बहस किसलिए हुई थी? क्या इसके पीछे कोई एजेंडा था और उन्होंने अदालत में विचाराधीन विषय क्यों चुना?’’

सिंह ने शीर्ष न्यायालय के विभिन्न फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि एक ही ‘कॉज ऑफ ऐक्शन’ (किसी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कानून में एक स्वीकार्य वजह) पर दूसरी प्राथमिकी दर्ज नहीं हो सकती। इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यदि कोई दूसरी प्राथमिकी दर्ज है, तो वह उच्च न्यायालय के पास भेजी जा सकती हैं।

सिंह ने तब अर्नब गोस्वामी मामले का हवाला दिया और कहा कि कानून शीर्ष न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया है।

पीठ ने कहा, ‘‘किसी पत्रकार द्वारा किसी विशेष मुद्दे पर अपना अधिकार व्यक्त करने का मामला एक राजनीतिक दल की ऐसी प्रवक्ता के मामले से अलग है, जो परिणामों के बारे में सोचे बिना गैर-जिम्मेदाराना बयानों से दूसरों को निशाना बना रही हैं।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘हां, लोकतंत्र में हर किसी को भी बोलने का अधिकार है। लोकतंत्र में घास को भी उगने का अधिकार है और गदहे को उसे (घास को) खाने का भी अधिकार है।’’

सिंह ने कहा कि शर्मा दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही जांच में शामिल हुई हैं और वह इससे भाग नहीं रहीं।

पीठ ने कहा, ‘‘अभी तक की जांच में क्या हुआ है? दिल्ली पुलिस ने अब तक क्या किया है? हमारा मुंह न खुलवाएं? उन्होंने आपके लिए लाल कालीन बिछाया होगा।’’

लगभग 30 मिनट की सुनवाई के बाद पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।

वाम दलों ने शीर्ष न्यायालय की टिप्पणियों को लेकर सरकार पर भी निशाना साधा।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने एक ट्वीट में कहा, ‘‘हमें उम्मीद है कि शब्दों से परे, अगर उच्चतम न्यायालय के अनुसार, शर्मा नफरत की बढ़ती घटनाओं और हिंसा के हालिया निंदनीय कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’’

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन अगर कानून के दायरे में शर्मा और उनके जैसे अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है, तो गलत संदेश जाएगा। हम पाएंगे कि आरएसएस/भाजपा की नफरत की ‘फैक्टरी’ और कटु ‘टीवी डिबेट’ से उत्पन्न उनके जैसे और भी कई लोग पनप रहे हैं।’’

भाकपा सांसद बिनॉय विश्वम ने ट्वीट किया, ‘‘नुपुर शर्मा के लिए लाल कालीन बिछाना तथा तीस्ता और श्रीकुमार के लिए जेल की कोठरी! शीर्ष न्यायालय की टिप्पणियों से मोदी सरकार को सतर्क रहना चाहिए। कट्टरता से प्रेरित गैर-जिम्मेदारी किसी प्रवक्ता की पहचान नहीं होनी चाहिए।’’

इस बीच, प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमण के समक्ष एक पत्र याचिका दायर कर शर्मा के खिलाफ की गयी उच्चतम न्यायालय की पीठ की कड़ी टिप्पणियों को वापस लेने का अनुरोध किया गया है।

पत्र याचिका को जनहित याचिका के तौर पर स्वीकार करने का अनुरोध करते हुए कहा गया है कि सुनवाई के दौरान (शर्मा के खिलाफ) की गयी कड़ी टिप्पणियों को ‘अवांछित’ घोषित किया जाए।