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SC ने मुजफ्फरपुर आश्रय गृह की आठ लड़कियों को उनके परिवार को सौंपने की दी इजाजत

उच्चतम न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के आरोपों की वजह से चर्चा में आये बिहार के मुजफ्फरपुर के एक आश्रय गृह की 44 में से आठ लड़कियों को सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उनके परिवारों को सौंपने की बृहस्पतिवार को अनुमति दे दी। 

न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति एम एम शांतानागौडार और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने टिस की कार्य परियोजना ‘कोशिश’ द्वारा पहचान की गयी इन आठ लड़कियां को सभी आवश्यक वित्तीय और मेडिकल सहायता उपलब्ध कराने का बिहार सरकार को निर्देश दिया।

 

टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज (टिस) ने बिहार में संचालित आश्रय गृहों का सोशल आडिट करके अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को दी थी। टिस की रिपोर्ट से ही यह तथ्य सामने आया बिहार के मुजफ्फरपुर में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा संचालित इस आश्रय गृह में अनेक लड़कियों का कथित रूप से यौन उत्पीड़न किया गया। 

पीठ ने टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज (टिस) को शेष 36 लड़कियों के मामले में स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। 

पीठ ने राज्य सरकार को इस तरह की पीड़ितों को योजना के तहत देय क्षतिपूर्ति का आकलन करने और इस संबंध में आठ सप्ताह में न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देने का भी निर्देश दिया। 

टिस द्वारा अपनी कार्य परियोजना ‘कोशिश’ की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश रिपोर्ट के अवलोकन के बाद शीर्ष अदालत ने यह निर्णय दिया। ‘कोशिश’ की इस रिपोर्ट में कहा गया था कि आठ लड़कियों को उनके परिवारों को सौंपा जा सकता है। ये लड़कियां पूरी तरह स्वस्थ हैं। 

टिस की ओर से अधिवक्ता वृन्दा ग्रोवर ने कहा कि यौन उत्पीड़न का मामला सुर्खियों में आने के बाद से ये 44 लड़कियां चार अलग अलग आश्रय गृहों में रह रही हैं। 

उन्होंने कहा कि कुछ लड़कियों को उनके परिवार वापस लेने के लिये तैयार हैं जबकि कुछ अन्य लड़कियां विशेष जरूरत वाली बच्चियां हैं। उन्होंने कहा कि एक लड़की अपने परिवार का पता बताने में असमर्थ है लेकिन उसने उस इलाके का विवरण दिया है जहां उसका परिवार रहता है। 

न्यायालय इस मामले में बिहार सरकार के एक आवेदन पर विचार कर रहा था। इसमें राज्य सरकार ने मुजफ्फरपुर आश्रय गृह की 44 लड़कियों के पुनर्वास और उन्हें उनके परिवारां को सौंपने की प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति मांगी थी। ये लड़कियां इस समय अलग अलग आश्रय गृहों में रह रही हैं। 

शीर्ष अदालत ने इस साल जुलाई में कोशिश को इन बच्चियों और उनके परिवार के सदस्यों से बात करने की अनुमति प्रदान की थी ताकि यह पता चल सके कि क्या वे अपने बच्चों को लेने के लिये तैयार हैं। 

बिहार सरकार की ओर से पेश वकील ने इससे पहले न्यायालय से कहा था कि मुजफ्फरपुर आश्रय गृह के बच्चों को अलग अलग बच्चों की देखभाल करने वाली संस्थाओं में रखा गया है और इनमें से कुछ लड़कियों के व्यवहार में आक्रामकता नजर आने लगी है और वे खुद को नुकसान पहुंचाने का भी प्रयास कर रही हैं। 

शीर्ष अदालत ने जून महीने में केन्द्रीय जांच ब्यूरो को इस मामले की जांच पूरी करने के लिये तीन महीने का वक्त दिया था। जांच ब्यूरो को इस दौरान संदिग्ध हत्या के मामलों की भी जांच पूरी करनी थी। न्यायालय ने जांच ब्यूरो को अपनी जांच का दायरा बढ़ाने और इस अपराध में ‘बाहरी लोगों’ के शामिल होने की जांच का पता लगाने का भी निर्देश दिया था। 

यही नहीं, शीर्ष अदालत ने इस मामले में अप्राकृतिक यौनाचार के आरोपों की भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत जांच करने के लिये भी कहा था। 

इस मामले में सीबीआई ने आश्रय गृह में रहने वाली लड़कियों का कथित यौन शोषण और उनसे शारीरिक हिंसा के आरोपों में 21 व्यक्तियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया है। इन सभी पर दिल्ली की अदालत में मुकदमा चल रहा है। 

शीर्ष अदालत ने इस साल फरवरी में इस मामले को बिहार से दिल्ली में साकेत अदालत परिसर में स्थित बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण कानून (पोक्सो) के तहत मुकदमों की सुनवाई करने वाली अदालत में स्थानांतरण कर दिया था।