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सभी धर्मो के लिए तलाक का एक समान आधार निर्धारित करने की याचिका पर सुनवाई करेगा SC

सुप्रीम कोर्ट संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधियों की भावना के अनुरूप देश के सभी धर्मो के लिए तलाक और गुजारा भत्ते का एक समान आधार लागू करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए बुधवार को सहमत हो गया है। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे,न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने मौखिक ही कहा कि वह विवाह विच्छेद से संबंधित कानूनों पर विचार करने और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 44 की भावना को ध्यान में रखते हुए तलाक के समान आधारों के बारे में तीन महीने के भीतर सुझाव देने का विधि आयोग को निर्देश देने के अनुरोध पर गौर कर सकता है।  

सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ इस याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी करके उससे जवाब मांगा हे। वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाककर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद से सवाल किया कि क्या वह चाहती हैं कि सारे व्यक्तिगत कानून खत्म किये जायें? इस पर आनंद ने कहा कि नहीं, वह ऐसा नहीं कह रही हैं। 

पीठ ने कहा कि क्या वह कोर्ट से ऐसा कुछ कहने का अनुरोध कर रही है जो व्यक्तिगत कानूनों में जाने और उन्हें खत्म करने जैसा है। पीठ ने कहा कि सरकार को जनता की नब्ज की पहचान होनी चाहिए लेकिन क्या इस तरह से कोर्ट  व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप करता है? पीठ ने आनंद से सवाल किया, ‘‘क्या हम व्यक्तिगत कानूनों में व्याप्त भिन्नताओं को खत्म किये बगैर भेदभाव की प्रथा हटा सकते हैं?’’  

पीठ ने तीन तलाक मामले का जिक्र किया और कहा कि संसद ने इस संबंध में कानून बनाया है। इस पर आनंद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक की प्रथा को भेदभाव पूर्ण पाया और उसे निरस्त कर दिया था। बीजेपी नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस याचिका में तलाक से संबंधित कानूनों में व्याप्त विसंगियां दूर करने और धर्म, जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर बिना किसी प्रकार के पक्षपात के सभी नागरिकों के लिये इस बारे में एक समान कानून बनाने का निर्देश केंद्र को देने का अनुरोध किया है। 

याचिका में कहा गया है कि कोर्ट यह घोषणा करे कि तलाक के पक्षपातपूर्ण आधार अनुच्छेद 14, 15, 21 का उल्लंघन करते हैं और सभी नागरिकों के लिए एक समान तलाक के आधार तैयार करे। याचिका में कहा गया है कि वैकल्पिक रूप में कोर्ट विधि आयोग को तलाक से संबंधित विभिन्न कानूनों पर विचार करके अनुच्छेद 14, 15, 21 और 44 के अनुरूप ‘तलाक के एक समान आधार’ के बारे में तीन महीने के भीतर अपने सुझाव देने का निर्देश दे।

याचिका के अनुसार हिन्दू, बौद्ध, सिख और जैन समुदाय के लोगों को हिन्दू विवाह कानून, 1955 के तहत विवाह विच्छेद करना होता है जबकि मुसलमानों, ईसाईयों और पारसी समुदाय के लिए उनके अपने पर्सनल कानून हैं। अलग अलग धर्म के जोड़ों को विशेष विवाह कानून, 1956 के तहत तलाक लेना होता है। यही नहीं, अगर जीवन साथी विदेशी नागरिक है तो ऐसे व्यक्ति को विदेशी नागरिक विवाद कानून 1969 के तहत तलाक लेना होता है। 

याचिका में कहा गया है कि हिन्दू, ईसाई और पारसी समुदाय में व्यभिचार विवाह विच्छेद का आधार है लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए ऐसा नहीं है। हिन्दू और ईसाई समुदाय में असाध्य कुष्ठ रोग तलाक का आधार है लेकिन पारसी समुदाय में ऐसा नहीं है। इसी तरह, हिन्दू और मुस्लिम समुदाय में नपुंसकता तलाक का आधार है लेकिन ईसाई और पारसी समुदाय में ऐसा नहीं है। हिन्दुओं में नाबालिग से विवाह तलाक का आधार है जबकि ईसाई, पारसी और मुस्लिम समुदाय में इस आधार पर तलाक का प्रावधान नहीं है।