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शुजात बुखारी के बेटे का भावुक लेख, कश्मीरी भाषा को आगे ले जाना चाहते थे

श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर में रमजान के मौके पर इफ्तार पार्टी में शामिल होने जा रहे राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की आंतकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उनकी हत्या ने पूरे देश को शौक में डुबा दिया। पत्रकार की हत्या के बाद घाटी में एक बार फिर बिगड़ते हालातों का माहौल उभर कर आया। जिसके बाद राज्य सरकार में शामिल बीजेपी-पीडीपी का संबंध टूटा और सरकार टूट गई। अब राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया है।

तमहीद ने लिखा है कि 14 जून का दिन मेरे और मेरे परिवार के लिए काफी डरावना दिन था, जब मैं पीसीआर से श्रीनगर पहुंचा तो मैंने किसी के मुंह से सुना कि वो नहीं रहे। ये सुनते ही मेरे पैर कांपने लगे और मेरे दिमाग में कई तरह के ख्यालात आने लगे। मैं सोच रहा था कि क्या पता अभी भी वह ऑपरेशन थियेटर में हो? क्या पता वो अभी भी जिंदा हों? मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई मेरे पिता के साथ क्यों इस तरह करेगा? जैसे ही पिता का शव आया तो वहां पर काफी भीड़ एकत्रित होने लगी।

मेरे पिता हमेशा से ही अपने सिद्धातों पर चलते थे, उनके चारों ओर उनसे नफरत करने वाले हजारों लोग थे लेकिन फिर भी उन्होंने उनके खिलाफ कोई शब्द नहीं कहा। मेरे पिता किसी का बुरा नहीं सोचते थे, बल्कि वह अपने ऑफिस के स्टाफ को भी परिवार का हिस्सा मानते थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी घाटी में शांति के लिए काम किया था। वह कश्मीरी भाषा को आगे ले जाना चाहते थे। शुजात बुखारी के बेटे ने लिखा कि 1990 में आतंकियों और सेना के बीच मुठभेड़ के दौरान पिता के दो कजिन की मौत हो थी। हमारे परिवार में कश्मीर मुद्दे के कारण ये तीसरी मौत है। बेटे ने लिखा कि इस निर्दयी दुनिया के लिए मेरे पिता फिट नहीं थे। भगवान को उनके जैसी पवित्र आत्मा की ऊपर जरूरत थी, इसलिए उन्हें अपने पास बुला लिया।

आतंकी ने शुजात बुखारी को मारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते थे और इसीलिए उन पर ताबड़तोड़ 15 गोलियां दागी गई थीं। तीन बाइक सवार आतंकियों ने शुजात बुखारी की गोली मारकर हत्‍या कर दी थी।

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