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श्रीनगर में शहीदों के कब्रिस्तान में आधिकारिक कार्यक्रम से दूर रहे राज्यपाल मलिक

श्रीनगर/जम्मू : जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक शनिवार को शहीदों की याद में आयोजित एक आधिकारिक कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके और उनकी ओर से उनके सलाहकार ने इन शहीदों की कब्रों पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। 

यह कार्यक्रम सन 1931 में आज ही के दिन डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह की सेना की गोलीबारी में शहीद हुए लोगों की स्मृति में आयोजित किया गया था। 

मलिक के पूर्ववर्ती एन एन वोहरा भी पिछले साल आधिकारिक कार्यक्रम में नहीं पहुंचे थे लेकिन 2017 में उन्होंने इन शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी।

राज्यपाल मलिक ने शुक्रवार को अपने संदेश में कहा कि जम्मू कश्मीर को अपने बहुलवादी संस्कृति और समरसता के लिए जाना जाता है। उन्होंने राज्य में शांति और समृद्धि के लिए एकता और बंधुत्व पर बल दिया।

 

राज्यपाल मलिक के सलाहकार खुर्शीद अहमद गनई ने इन 22 शहीदों की कब्रों पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। दरअसल, ये लोग महाराजा हरि सिंह के निरकुंश शासन का विरोध करने के दौरान शहीद हो गए थे। 

इस अवसर पर नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी के वरिष्ठ नेता एआर वेरी और कांग्रेस के नेता पीरजादा सईद भी मौजूद थे। राज्य के अलगाववादियों ने इस दिन की स्मृति में बंद का आह्वान किया है। 

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नरमपंथी धड़े के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक समेत अलगाववादी नेताओं को कब्रिस्तान जाने से रोकने के लिये नजरबंद कर दिया गया था। अलगाववादियों ने इस मौके पर बंद का आह्वान किया था। अधिकारियों ने कहा कि पुराने शहर में एहतियात के तौर पर लोगों की आवाजाही पर पाबंदी लगा दी गई। 

उन्होंने कहा कि घाटी में आम जनजीवन बंद की वजह से प्रभावित रहा और दुकानें व कारोबारी प्रतिष्ठान बंद रहे। अधिकारियों ने कहा कि एहतियाती कदम के तौर पर अमरनाथ यात्रा को भी शनिवार को एक दिन के लिये रोक दिया गया था। 

वहीं जम्मू में विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व कर रहे कुछ संगठनों ने 13 जुलाई को ‘काला दिवस’ मनाया और कहा कि 1931 में इसी दिन कश्मीर घाटी में समुदाय को ‘अत्याचार’ का सामना करना पड़ा। 

संगठन के सदस्यों ने यहां राजभवन के बाहर प्रदर्शन किया जबकि जम्मू कश्मीर में शहीदी दिवस मनाया गया।

 

ऑल स्टेट कश्मीरी पंडित कॉन्फ्रेंस (एएसकेपीसी) के महासचिव टी के भट ने संवाददाताओं को बताया कि 13 जुलाई को राजनीतिक दलों और सरकार द्वारा शहीदी दिवस मनाया जाना, ‘विस्थापित (कश्मीरी पंडित) समुदाय के जख्मों पर नमक डालने जैसा है।’