जम्मू : शनिवार को सुंजवान में हुए आर्मी कैंप में हुए हमले की शुरुआती जांच में जो तथ्य सामने आए हैं उससे यही साबित होता है कि इस हमले में शामिल आतंकवादियों ने आर्मी कैंप के पिछवाड़े में बने एक मकान से छलांग लगाकर सैन्य क्षेत्र में प्रवेश किया। दरअसल, जिस जगह पर सुंजवां आर्मी कैंप के रिहायशी फ्लैट बने हैं, उसी के सटे कई अवैध मकान भी बना लिए गए हैं। इन मकानों और सैन्य स्टेशन की कांटेदार तार वाली दीवार के बीच भी कोई फासला नहीं बचा है।

अवैध तरीके से बनाए गए मकान और कांटेदार तार वाली दीवार एक-दूसरे से सटे हुए हैं। कई जगहों पर मकान दीवार से ऊंचे हैं जहां से आसानी से कूदकर दूसरी जगह पहुंचा जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक जैश से ताल्लुक रखने वाले हथियारबंद उग्रवादी ने अंधेरे का फायदा उठाते हुए दीवार से कूद गए और उन्होंने वहीं से ग्रेनेड फेंक कर सीधे रिहाइशी घरों पर हमला बोल। जम्मू के सैन्य स्टेशन पर हुए आतंकी हमले के लिए ये मकान जिम्मेदार हैं जिन्हें वर्क्स ऑफ डिफेंस एक्ट 1903 की धारा 7 का उल्लंघन करके बनाए गए। इस नियम के तहत सेना क्षेत्र से सटे सौ मीटर की दूरी तक कोई भी निर्माण कार्य नहीं कराया जा। यहां तक की पहले से बने मकानों की मरम्मत करने के लिए भी संबंधित जनरल ऑफिसर कमांडिंग की इजाजत लेना जरूरी। इस कानून के तहत 100 मीटर की दूरी तक कोई निर्माण कार्य करना तो दूर आप निर्माण सामग्री जैसे रेत बजरी आदि भी नहीं रख सकते, लेकिन जम्मू के सुंजवां सैन्य स्टेशन की कांटेदार तार के साथ भूमाफियाओं का कब्जा।

भूमाफिया अति संवेदनशील कांटेदार तार वाली दीवार के साथ सटी जमीन को चार लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से प्लॉट बेच रहे हैं जो न केवल गैरकानूनी है बल्कि देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक भी। आज तक संवाददाता ने जब इस क्षेत्र का दौरा किया तो पाया कि भूमाफिया सरेआम इस संवेदनशील जमीन का सौदा कर रहे हैं। सेना क्षेत्र की दीवार के साथ दर्जनों मकान या तो बन रहे हैं या हाल ही में बने। इस अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन चुप्पी साधे हुए। सूत्रों की माने तो 12 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले सुंजवां सैन्य स्टेशन के आस-पास कई एकड़ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे किए गए हैं जो सुरक्षा की दृष्टि से बेहद खतरनाक है। सूत्रों के मुताबिक जिस क्षेत्र से आतंकी हमला हुआ, वहां रात के समय संदिग्ध गतिविधियां देखी गई। लेकिन पुलिस ने उनको नजरंदाज किया। हमले में शामिल आतंकियों के पनाहगार और मददगार अभी भी सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से दूर हैं, जबकि अब यह सामने आ चुका है कि बिना स्थानीय मदद से यह हमला संभव नहीं।

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